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जलवायु परिवर्तन (Climate Change): प्रमुख वैश्विक सम्मेलन, नीतियां एवं समझौते (UNFCCC, COP, पेरिस समझौता) | UPSC, PSC, SSC, Railway, Banking

1 min read 292 views 03 Sep 2026 General Science ExamWise शैक्षणिक टीम द्वारा जाँचा गया
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों, UNFCCC, क्योटो प्रोटोकॉल, पेरिस समझौते (COP21) तथा नवीनतम COP सम्मेलनों के निर्णयों का सभी प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु विस्तृत प्रामाणिक नोट्स।
Key Points
  • UNFCCC की स्थापना वर्ष 1992 के रियो पृथ्वी सम्मेलन में हुई थी और यह 21 मार्च 1994 से प्रभावी हुई; इसका सचिवालय बॉन (जर्मनी) में स्थित है।
  • क्योटो प्रोटोकॉल (1997) विकसित देशों के लिए ग्रीनहाउस गैसों में कटौती करने हेतु एक कानूनी रूप से बाध्यकारी 'टॉप-डाउन' समझौता था।
  • पेरिस समझौते के तहत प्रत्येक देश अपनी राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुसार स्वैच्छिक जलवायु लक्ष्य 'राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान' (NDC) के रूप में घोषित करता है।
  • कानकुन सम्मेलन (COP16) के तहत विकासशील देशों की मदद के लिए 'हरित जलवायु कोष' (GCF) की स्थापना की गई, जिसका मुख्यालय सोंगडो (दक्षिण कोरिया) में है।
  • भारत ने ग्लासगो सम्मेलन (COP26) में वर्ष 2070 तक 'नेट-ज़ीरो' (शुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन) प्राप्त करने तथा 2030 तक 500 GW गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का 'पंचामृत' संकल्प लिया।
  • मिस्र में आयोजित COP27 सम्मेलन की सबसे मुख्य उपलब्धि जलवायु प्रभावित गरीब देशों की मदद के लिए 'हानि और क्षति कोष' (Loss and Damage Fund) की स्थापना करना था।
  • दुबई में आयोजित COP28 सम्मेलन के दौरान 'ग्लोबल स्टॉकटेक' के तहत वैश्विक स्तर पर ऊर्जा प्रणालियों में जीवाश्म ईंधनों (Fossil Fuels) से चरणबद्ध रूप से दूरी बनाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया।
  • जलवायु परिवर्तन प्रदर्शन सूचकांक (CCPI) जर्मनवॉच संस्था द्वारा जारी किया जाता है, जिसमें भारत निरंतर बेहतर प्रदर्शन करते हुए शीर्ष 10 देशों में शामिल है।

वैश्विक जलवायु परिवर्तन कूटनीति: पृष्ठभूमि

औद्योगिक क्रांति के बाद से पृथ्वी के बढ़ते तापमान और चरम मौसमी घटनाओं से निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर विभिन्न नीतिगत सम्मेलनों और बहुपक्षीय समझौतों की शुरुआत की गई। इन सम्मेलनों का मुख्य उद्देश्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करना, वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित करना तथा विकासशील देशों को पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करना है। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC), राज्य लोक सेवा आयोगों (जैसे RPSC RAS), SSC, रेलवे और बैंकिंग जैसी सभी प्रमुख प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए इन समझौतों का ऐतिहासिक और समसामयिक डेटा अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

UNFCCC (यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज)

जलवायु परिवर्तन की दिशा में पहला सबसे बड़ा वैश्विक प्रयास वर्ष 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरियो शहर में आयोजित 'पृथ्वी सम्मेलन' (Earth Summit / रियो सम्मेलन) के दौरान किया गया था। इसी सम्मेलन से 'UNFCCC' की रूपरेखा तैयार हुई।

  • स्थापना एवं प्रभाव: इस अंतर्राष्ट्रीय संधि पर हस्ताक्षर वर्ष 1992 में शुरू हुए और यह आधिकारिक रूप से 21 मार्च 1994 को प्रभावी हुई।
  • सचिवालय (Headquarters): इसका सचिवालय बॉन, जर्मनी में स्थित है।
  • मुख्य उद्देश्य: वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता को एक ऐसे स्तर पर स्थिर करना, जिससे जलवायु प्रणाली के साथ मानव निर्मित हानिकारक हस्तक्षेपों को रोका जा सके।
  • बाध्यकारिता: यह मूल रूप से एक गैर-बाध्यकारी (Non-binding) संधि है, जिसने भविष्य के समझौतों (जैसे क्योटो प्रोटोकॉल, पेरिस समझौता) के लिए एक कानूनी ढांचा प्रदान किया।

COP (कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज):

यह UNFCCC का सर्वोच्च निर्णय लेने वाला निकाय (Supreme Decision-making Body) है। इसके सदस्य देशों की बैठक प्रतिवर्ष आयोजित की जाती है, जिसे 'COP' कहा जाता है। प्रथम बैठक COP-1 वर्ष 1995 में बर्लिन, जर्मनी में आयोजित की गई थी।

ऐतिहासिक जलवायु समझौते: क्योटो से पेरिस तक

UNFCCC के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए समय-समय पर देशों के लिए बाध्यकारी और स्वैच्छिक उत्सर्जन मानक तय किए गए, जिनमें दो सबसे प्रमुख मील के पत्थर हैं:

विशिष्ट विशेषता क्योटो प्रोटोकॉल (Kyoto Protocol - 1997) पेरिस समझौता (Paris Agreement - 2015 / COP21)
अपनाने का वर्ष व स्थान 1997 में क्योटो (जापान) में अपनाया गया; वर्ष 2005 से प्रभावी हुआ। 2015 में पेरिस (फ्रांस) में आयोजित COP-21 के दौरान अपनाया गया; वर्ष 2016 से प्रभावी।
मूल दृष्टिकोण 'ऊपर से नीचे' (Top-Down Approach): विकसित देशों पर उत्सर्जन में कटौती के कानूनी लक्ष्य ऊपर से थोपे गए थे। 'नीचे से ऊपर' (Bottom-Up Approach): सभी देश अपनी क्षमतानुसार स्वैच्छिक लक्ष्य स्वयं तय करते हैं।
कानूनी प्रकृति केवल औद्योगिक रूप से विकसित देशों (Annex-B) के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी था। उत्सर्जन लक्ष्य कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं हैं, परंतु लक्ष्यों की नियमित रिपोर्टिंग और समीक्षा करना बाध्यकारी है।
मुख्य उद्देश्य 6 प्रमुख ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को वर्ष 1990 के स्तर से औसतन 5.2% कम करना। वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर से $2^\circ\text{C}$ (अधिमानतः $1.5^\circ\text{C}$) से नीचे रखना।
सहभागिता का दायरा केवल विकसित देशों के लिए बाध्यकारी लक्ष्य; विकासशील देश (भारत, चीन) जिम्मेदारियों से मुक्त थे। सार्वभौमिक भागीदारी: विकसित और विकासशील दोनों देशों को पर्यावरण लक्ष्यों में शामिल किया गया है।

पेरिस समझौते का मुख्य स्तंभ: NDC (राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान)

पेरिस समझौते के तहत प्रत्येक देश को जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए अपनी राष्ट्रीय कार्ययोजना तैयार करनी होती है, जिसे Nationally Determined Contributions (NDC) कहा जाता है। प्रत्येक सदस्य देश को हर 5 वर्ष में अपने NDC लक्ष्यों को अपग्रेड करना अनिवार्य है।

जलवायु कूटनीति के अन्य महत्वपूर्ण मील के पत्थर (प्रमुख COP सम्मेलन)

  • COP-11 (मॉन्ट्रियल, 2005): क्योटो प्रोटोकॉल के प्रभावी होने के बाद यह इसकी पहली बैठक (CMP-1) थी।
  • COP-13 (बाली, 2007): 'बाली रोड मैप' को अपनाया गया, जिसने क्योटो प्रोटोकॉल के बाद (वर्ष 2012 के बाद) के वैश्विक एजेंडे की नींव रखी।
  • COP-15 (कोपेनहेगन, 2009): विकसित देशों द्वारा वर्ष 2020 तक विकासशील देशों के लिए प्रतिवर्ष 100 बिलियन डॉलर की जलवायु निधि (Climate Finance) जुटाने का पहला अनौपचारिक वादा किया गया।
  • COP-16 (कानकुन, 2010): विकासशील देशों में हरित तकनीकों को बढ़ावा देने के लिए आधिकारिक तौर पर हरित जलवायु कोष (Green Climate Fund - GCF) की स्थापना की गई, जिसका मुख्यालय सोंगडो (दक्षिण कोरिया) में है।
  • COP-19 (वारसॉ, 2013): 'लॉस एंड डैमेज' (Loss and Damage) तंत्र की स्थापना की नींव रखी गई, ताकि जलवायु आपदाओं से प्रभावित गरीब देशों को मुआवजा मिल सके।

हालिया सम्मेलन और भारत के नीतिगत संकल्प (नवीनतम डेटा)

1. COP-26 (ग्लासगो, स्कॉटलैंड - 2021) — भारत का 'पंचामृत' संकल्प

इस सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री ने वैश्विक मंच पर भारत की प्रतिबद्धता प्रदर्शित करने के लिए पांच ऐतिहासिक लक्ष्यों की घोषणा की, जिन्हें 'पंचामृत' (Panchamrit) कहा गया:

  1. भारत वर्ष 2030 तक अपनी गैर-जीवाश्म ईंधन (Non-fossil fuel) आधारित ऊर्जा क्षमता को बढ़ाकर 500 गीगावाट (GW) तक पहुँचाएगा।
  2. भारत वर्ष 2030 तक अपनी कुल ऊर्जा आवश्यकताओं का 50% हिस्सा नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) जैसे सौर व पवन ऊर्जा से पूरा करेगा।
  3. भारत अब से वर्ष 2030 तक के कुल अनुमानित कार्बन उत्सर्जन में 1 बिलियन टन (1 अरब टन) की कमी करेगा।
  4. भारत वर्ष 2030 तक अपनी अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता (Carbon Intensity) को 45% से अधिक कम करेगा।
  5. भारत वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो (Net-Zero Emissions) अर्थात् पूर्ण शुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल कर लेगा।

2. COP-27 (शर्म अल-शेख, मिस्र - 2022)

  • मुख्य उपलब्धि: जलवायु आपदाओं से तबाह होने वाले अत्यंत कमजोर और गरीब विकासशील देशों की आर्थिक मदद के लिए ऐतिहासिक 'हानि और क्षति कोष' (Loss and Damage Fund) को आधिकारिक रूप से स्थापित करने की मंजूरी दी गई।
  • भारत ने इस सम्मेलन में अपनी दीर्घकालिक कम-उत्सर्जन विकास रणनीति (LT-LEDS) दस्तावेज़ प्रस्तुत किया।

3. COP-28 (दुबई, यूएई - 2023) — 'ग्लोबल स्टॉकटेक'

  • ग्लोबल स्टॉकटेक (Global Stocktake): पेरिस समझौते के बाद पहली बार दुनिया के देशों की पर्यावरण प्रगति की व्यापक समीक्षा की गई। इसके तहत आधिकारिक तौर पर वैश्विक ऊर्जा प्रणालियों से जीवाश्म ईंधनों (Fossil Fuels - कोयला, तेल, गैस) से दूरी बनाने (Transitioning Away) का ऐतिहासिक आह्वान किया गया।
  • लॉस एंड डैमेज फंड का क्रियान्वयन: संयुक्त अरब अमीरात और जर्मनी सहित कई देशों ने इस कोष के संचालन के लिए प्रारंभिक वित्तीय योगदान की घोषणा की (इस फंड को विश्व बैंक द्वारा अस्थायी रूप से प्रबंधित किया जा रहा है)।
  • वैश्विक नवीकरणीय ऊर्जा प्रतिज्ञा: वर्ष 2030 तक वैश्विक स्तर पर नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को तिगुना (3x) करने का संकल्प लिया गया।

जलवायु परिवर्तन से संबंधित महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सूचकांक

  • जलवायु परिवर्तन प्रदर्शन सूचकांक (Climate Change Performance Index - CCPI): यह 'जर्मनवॉच' और क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क द्वारा प्रतिवर्ष जारी किया जाता है। यह देशों को चार श्रेणियों (GHG उत्सर्जन, नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा उपयोग और जलवायु नीति) में मापता है। हालिया रिपोर्टों में भारत वैश्विक स्तर पर **शीर्ष 10 देशों** में अपनी स्थिति बनाए हुए है (विशेष तथ्य: सूचकांक में पहले तीन स्थान खाली रखे जाते हैं क्योंकि कोई भी देश $1.5^\circ\text{C}$ के मानक को पूरा नहीं कर पाया है)।
  • IPCC (इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज): यह संयुक्त राष्ट्र का एक वैज्ञानिक निकाय है जिसकी स्थापना वर्ष 1988 में WMO और UNEP द्वारा की गई थी। यह जलवायु परिवर्तन पर प्रामाणिक 'मूल्यांकन रिपोर्ट' (Assessment Reports - AR6/AR7) जारी करता है, जो वैश्विक पर्यावरण नीतियों का मुख्य आधार बनती हैं। इसका मुख्यालय जेनेवा, स्विट्जरलैंड में है।
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