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मौलिक अधिकार एवं मूल कर्तव्य - संपूर्ण विवरण

1 min read 140 views 03 Sep 2026 Indian GK ExamWise शैक्षणिक टीम द्वारा जाँचा गया
भारतीय संविधान के भाग 3 (अनुच्छेद 12-35) में वर्णित 6 मौलिक अधिकार और भाग 4(क) (अनुच्छेद 51क) के तहत 11 मूल कर्तव्यों की विस्तृत एवं परीक्षा-उपयोगी व्याख्या।
Key Points
  • भारतीय संविधान के भाग 3 में कुल 23 अनुच्छेदों के अंतर्गत मौलिक अधिकारों का विस्तृत वर्णन है।
  • 44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा सम्पत्ति के मूल अधिकार को समाप्त कर विधिक अधिकार बनाया गया।
  • डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार) को "संविधान का हृदय तथा आत्मा" कहा है।
  • अनुच्छेद 15, 16, 19, 29 और 30 केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त मौलिक अधिकार हैं।
  • वर्ष 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने 'निजता के अधिकार' को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार का हिस्सा माना है।
  • मूल कर्तव्यों को 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा भाग 4(क) और अनुच्छेद 51(क) में जोड़ा गया था।
  • वर्तमान में 11 मूल कर्तव्य हैं, जिसमें 11वां कर्तव्य 86वें संविधान संशोधन (2002) द्वारा जोड़ा गया था।

मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) — संवैधानिक ढांचा

मौलिक अधिकार वे अधिकार होते हैं, जो व्यक्ति के जीवन तथा चौमुखी विकास के लिए अनिवार्य होने के कारण संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किए जाते हैं। व्यक्ति के इन अधिकारों में राज्य द्वारा भी मनमाने तौर पर हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।

भारतीय संविधान के तृतीय भाग (Part III) में मौलिक अधिकारों के सम्बन्ध में कुल 23 अनुच्छेद (अनुच्छेद 12 से 30 और 32 से 35) शामिल हैं। यह विश्व का सर्वाधिक विस्तृत अधिकार पत्र है।

संविधान द्वारा प्रदत्त मूल मौलिक अधिकार

मूल संविधान के भाग 3 द्वारा नागरिकों को 7 मौलिक अधिकार प्रदान किए गए थे। किन्तु 44वें संवैधानिक संशोधन (1978) के द्वारा सम्पत्ति के अधिकार से सम्बन्धित सभी उपबन्धों को निरस्त करके संविधान के भाग 12 में एक नया अध्याय-4 (अनुच्छेद 300(ए)) जोड़ा गया। अब सम्पत्ति के अधिकार को अन्य मौलिक अधिकारों की भांति संवैधानिक संरक्षण प्राप्त नहीं है।

वर्तमान में भारतीय नागरिकों को केवल 6 मौलिक अधिकार प्राप्त हैं:

  1. समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18)
  2. स्वतन्त्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22)
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 और 24)
  4. धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28)
  5. संस्कृति तथा शिक्षा सम्बन्धी अधिकार (अनुच्छेद 29-30)
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)

1. समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18)

  • कानून के समक्ष समानता (अनुच्छेद 14) — इसके अनुसार भारत के राज्य क्षेत्र में राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता या कानून द्वारा समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।
  • भेदभाव का निषेध (अनुच्छेद 15) — राज्य के द्वारा धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान के आधार पर नागरिकों के प्रति जीवन के किसी भी क्षेत्र में भेदभाव नहीं किया जाएगा।
  • अवसर की समानता (अनुच्छेद 16) — सभी नागरिकों को सरकारी पदों पर नियुक्ति के समान अवसर प्राप्त होंगे। इस सम्बन्ध में केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।
  • अस्पृश्यता का निषेध (अनुच्छेद 17) — अस्पृश्यता (छुआछूत) का अंत किया जाता है और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध है। 1955 के 'अस्पृश्यता अपराध अधिनियम' द्वारा इसे दण्डनीय अपराध घोषित किया गया, जिसे 1989 में 'अनुसूचित जाति व जनजाति निरोधक कानून' नाम दिया गया।
  • उपाधियों का निषेध (अनुच्छेद 18) — सेना अथवा शिक्षा सम्बन्धी उपाधियों के अलावा राज्य अन्य कोई उपाधियाँ प्रदान नहीं कर सकता। भारत का कोई नागरिक बिना राष्ट्रपति की आज्ञा के विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता।

2. स्वतन्त्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22)

मूल संविधान के अनुच्छेद 19 द्वारा नागरिकों को 7 स्वतन्त्रताएं प्रदान की गई थीं, किन्तु 44वें संशोधन द्वारा सम्पत्ति की स्वतन्त्रता समाप्त होने के बाद अब केवल 6 स्वतन्त्रताएं बची हैं:

  1. विचार और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता (19(1)(a)) — भाषण देने, विचार व्यक्त करने और प्रेस व दूरदर्शन की स्वतन्त्रता शामिल है।
  2. अस्त्र-शस्त्र रहित तथा शान्तिपूर्ण सम्मेलन की स्वतन्त्रता
  3. समुदाय और संघ निर्माण की स्वतन्त्रता
  4. अबाध भ्रमण की स्वतन्त्रता — भारत के संपूर्ण राज्य क्षेत्र में बिना किसी प्रतिबन्ध के भ्रमण का अधिकार।
  5. अबाध निवास की स्वतन्त्रता — भारत के किसी भी क्षेत्र में स्थायी या अस्थायी रूप से बसने का अधिकार।
  6. वृत्ति, उपजीविका या कारोबार की स्वतन्त्रता

सुरक्षात्मक संवैधानिक प्रावधान (अनुच्छेद 20-22)

  • अपराध की दोष सिद्धि के विषय में संरक्षण (अनुच्छेद 20) — किसी भी व्यक्ति को उस समय तक अपराधी नहीं ठहराया जा सकता जब तक कि उसने अपराध के समय लागू किसी कानून का उल्लंघन न किया हो।
  • व्यक्तिगत स्वतन्त्रता तथा जीवन की सुरक्षा (अनुच्छेद 21) — किसी व्यक्ति को उसके जीवन तथा दैहिक स्वाधीनता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया को छोड़कर अन्य किसी प्रकार से वंचित नहीं किया जा सकता। 44वें संशोधन (1979) के अनुसार आपातकाल में भी इसे समाप्त या सीमित नहीं किया जा सकता।
  • शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 21(क)) — 86वें संविधान संशोधन (2002) द्वारा इसे जोड़ा गया। इसके तहत राज्य 6 से 14 वर्ष की आयु के बालकों को अनिवार्य व निःशुल्क शिक्षा प्रदान करेगा।
  • बन्दीकरण की अवस्था में संरक्षण (अनुच्छेद 22) — बन्दी बनाए जाने वाले व्यक्ति को कारण जानने, अपनी पसंद के विधिक व्यवसायी से परामर्श करने का अधिकार है। यह शत्रु देश के निवासियों एवं 'निवारक निरोध अधिनियम' के तहत गिरफ्तार व्यक्तियों पर लागू नहीं होता।

3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 और 24)

  • मानव के दुर्व्यापार और बलात् श्रम का प्रतिषेध (अनुच्छेद 23) — इसके द्वारा बेगार तथा इसी प्रकार का अन्य जबरदस्ती लिया हुआ श्रम निषिद्ध ठहराया गया है। हालांकि, राज्य सार्वजनिक उद्देश्य से अनिवार्य श्रम की योजना लागू कर सकता है।
  • बालश्रम का निषेध (अनुच्छेद 24) — 14 वर्ष से कम आयु वाले किसी बच्चे को कारखानों, खानों या अन्य किसी जोखिम भरे काम पर नियुक्त नहीं किया जा सकता।

4. धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28)

  • अंतःकरण की स्वतन्त्रता (अनुच्छेद 25) — सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन रहते हुए सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतन्त्रता तथा किसी भी धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने का अधिकार है।
  • धार्मिक मामलों का प्रबन्ध (अनुच्छेद 26) — प्रत्येक धार्मिक सम्प्रदाय को संस्थाओं की स्थापना, पोषण तथा अपने धार्मिक कार्यों के प्रबन्ध का अधिकार प्राप्त है।
  • धार्मिक व्यय के कर से छूट (अनुच्छेद 27) — किसी भी व्यक्ति को ऐसे कर देने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा, जिसकी आय किसी विशेष धर्म की उन्नति में खर्च की जाती हो।
  • शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा का निषेध (अनुच्छेद 28) — राजकीय निधि से संचालित किसी भी शिक्षण संस्था में कोई धार्मिक शिक्षा प्रदान नहीं की जाएगी।

5. संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार (अनुच्छेद 29-30)

  • अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण (अनुच्छेद 29) — नागरिकों के प्रत्येक वर्ग को अपनी भाषा, लिपि या संस्कृति सुरक्षित रखने का पूर्ण अधिकार है।
  • शिक्षण संस्थाओं की स्थापना का अधिकार (अनुच्छेद 30) — धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षण संस्थाओं की स्थापना तथा उनके प्रशासन का अधिकार होगा।

6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)

मौलिक अधिकारों को क्रियान्वित करने के उद्देश्य से इसे संविधान में स्थान दिया गया है। डॉ. अम्बेडकर ने इसे "संविधान का हृदय तथा आत्मा" कहा था। इसके तहत सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय पांच प्रकार की रिट (Writ) जारी कर सकते हैं:

  1. बन्दी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) — बन्दी को न्यायालय में उपस्थित करने का आदेश। अवैध रूप से बन्दी बनाए जाने पर जारी होता है।
  2. परमादेश (Mandamus) — जब कोई पदाधिकारी अपने सार्वजनिक कर्त्तव्य का निर्वाह नहीं करता, तब न्यायालय द्वारा आदेश जारी किया जाता है।
  3. प्रतिषेध (Prohibition) — सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों द्वारा निम्न न्यायालयों को उनके अधिकार-क्षेत्र से बाहर जाने से रोकने हेतु जारी किया जाता है।
  4. उत्प्रेषण (Certiorari) — किसी विवाद को निम्न न्यायालय से उच्च न्यायालय में भेजने के लिए जारी किया जाता है ताकि न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन न हो।
  5. अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto) — जब कोई व्यक्ति ऐसे पदाधिकारी के रूप में कार्य करने लगता है जिसका उसके पास वैधानिक अधिकार नहीं है, तो न्यायालय उससे योग्यता का आधार पूछता है।

नागरिकता के आधार पर वर्गीकरण (Quick Check)

केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त मूल अधिकार विदेशियों को भी प्राप्त मूल अधिकार
• अनुच्छेद 15 (भेदभाव का प्रतिषेध)
• अनुच्छेद 16 (अवसर की समानता)
• अनुच्छेद 19 (विचार, अभिव्यक्ति, सम्मेलन, संघ, संचरण, निवास व वृत्ति की स्वतंत्रता)
• अनुच्छेद 29 (अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण)
• अनुच्छेद 30 (अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं की स्थापना)
• अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समता)
• अनुच्छेद 20 (अपराधों के लिए दोष-सिद्धि में संरक्षण)
• अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार)
• अनुच्छेद 23, 24 (शोषण के विरुद्ध अधिकार)
• अनुच्छेद 25, 26, 27, 28 (धर्म की स्वतंत्रता)

अनुच्छेद-21: निजता का अधिकार व अन्य अंतर्निहित अधिकार

24 अगस्त, 2017 को सर्वोच्च न्यायालय की 9 सदस्यीय संविधान पीठ ने निजता के अधिकार (Right to Privacy) को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार माना है। मेनका गांधी बनाम भारत संघ वाद (1978) के बाद से न्यायिक सक्रियता द्वारा अनुच्छेद 21 का दायरा व्यापक किया गया है। इसमें निम्नलिखित अधिकार शामिल घोषित किए गए हैं:

  • मानवीय प्रतिष्ठा के साथ जीने का अधिकार, स्वच्छ पर्यावरण में जीने का अधिकार।
  • विदेश यात्रा करने का अधिकार, बन्धुआ मजदूरी के विरुद्ध अधिकार, त्वरित सुनवाई का अधिकार।
  • निशुल्क कानूनी सहायता, महिलाओं के साथ सम्मानपूर्ण व्यवहार, सार्वजनिक फांसी के विरुद्ध अधिकार।
  • जीविका उपार्जन, भोजन, आश्रय, स्वास्थ्य और बिजली (विद्युत) का अधिकार।

मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties)

मूल कर्तव्य नागरिकों के लिए उस 'आचार संहिता' की तरह हैं, जिनका पालन राष्ट्र की स्थायित्व और समृद्धि के लिए आवश्यक है। 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा संविधान में 'मूल कर्तव्य' शीर्षक से एक नया भाग 4 (क) तथा अनुच्छेद 51 (क) जोड़ा गया। मूल रूप से इसमें 10 कर्तव्यों का उल्लेख था। सन् 2002 में 86वें संशोधन द्वारा 11वां मूल कर्तव्य जोड़ा गया।

11 मूल कर्तव्यों की सूची (अनुच्छेद 51क):

  1. संविधान का पालन करें और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज व राष्ट्रगान का आदर करें।
  2. राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखें और उनका पालन करें।
  3. भारत की सम्प्रभुता, एकता और अखण्डता की रक्षा करें और उसे अक्षुण्ण बनाए रखें।
  4. देश की रक्षा करें और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करें।
  5. भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का विकास करें जो धर्म, भाषा, प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो और ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हों।
  6. हमारी समन्वित संस्कृति की गौरवशाली परम्परा का महत्व समझें और उसका संरक्षण करें।
  7. प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव भी हैं, रक्षा करें और उसका संवर्द्धन करें तथा प्राणी मात्र के प्रति दयाभाव रखें।
  8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें।
  9. सार्वजनिक सम्पत्ति को सुरक्षित रखें और हिंसा से दूर रहें।
  10. व्यक्तिगत व सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करें जिससे राष्ट्र निरन्तर बढ़ते हुए प्रगति और उपलब्धि की नवीन ऊंचाइयों को छू सके।
  11. (86वां संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा प्रस्थापित): माता-पिता या अभिभावक का यह कर्तव्य होगा कि वे छः से चौदह वर्ष तक के अपने बच्चों को शिक्षा का अवसर प्रदान करें।
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