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राजपूताना में मराठा व ब्रिटिश प्रवेश - रियासतें एवं संधियाँ

1 min read 196 views 03 Sep 2026 Rajasthan GK ExamWise शैक्षणिक टीम द्वारा जाँचा गया
राजपूताना में मराठा प्रवेश के कारण एवं परिणाम, रियासतों के प्रति ब्रिटिश नीति के तीन चरण तथा राजस्थान की प्रमुख रियासतों — जयपुर, बीकानेर, मेवाड़, मारवाड़, कोटा, अलवर आदि का ब्रिटिश काल का इतिहास एवं संधियाँ।
Key Points
  • पेशवा बाजीराव प्रथम ने 1728 ई. में मालवा पर आक्रमण किया — 1735 तक मालवा मराठों के प्रभुत्व में चला गया
  • राजपूत नरेशों के आपसी झगड़ों में मराठों की मध्यस्थता ने उन्हें राजस्थान में 'शासक निर्माता' बना दिया
  • ब्रिटिश नीति तीन चरणों में — अधीनस्थ पृथक्करण (1818-58), अधीनस्थ एकीकरण (1858-1935), समान संघ-राज्य (1935-47)
  • राजस्थान की प्रथम रियासत करौली ने 9 नवम्बर, 1817 को सहायक संधि की — अंतिम सिरोही ने 1823 में
  • 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश सरकार ने देशी रियासतों को विलय की नीति छोड़कर आधार स्तम्भ बनाया
  • महाराजा गंगासिंह (बीकानेर) 1919 के वर्साय सम्मेलन में पूर्ण सत्ता सम्पन्न प्रतिनिधि बने
  • भरतपुर, करौली, अलवर — 17 मार्च 1948 को मत्स्य संघ में विलय हुए

राजपूताना में मराठा प्रवेश — कारण एवं परिणाम

पेशवा बाजीराव प्रथम एक पराक्रमी तथा महत्वाकांक्षी व्यक्ति था। उसने मुगल साम्राज्य की दुर्बलता का लाभ उठाकर उत्तरी भारत में मराठों की प्रभुता स्थापित करने का निश्चय किया।

  • 1728 ई. में मराठों ने मालवा पर आक्रमण किया और वहाँ के मुगल गवर्नर गिरधर बहादुर को बुरी तरह पराजित किया
  • 1731 ई. में मराठों ने मालवा के प्रमुख नगरों को खूब लूटा
  • सवाई जयसिंह भी मालवा में मराठों के बढ़ते प्रभाव को रोकने में असमर्थ रहे — 1735 तक मालवा मराठों के प्रभुत्व में चला गया

मराठों का राजस्थान पर प्रभाव

  • मालवा में प्रवेश के बाद मराठों को राजस्थान पर आक्रमण करने के लिए एक आसान रास्ता मिल गया
  • जयपुर नरेश सवाई जयसिंह ने बुद्धसिंह को हटाकर दलेलसिंह को बूंदी की गद्दी पर बिठाया — बुद्धसिंह की रानी ने मराठा सरकार होलकर से अपनी सहायता के लिए आमंत्रित किया — परिणामस्वरूप सहायता के बदले बुद्धसिंह पुनः बूंदी की गद्दी पर बैठ गया
  • इसके बाद राजपूत नरेशों के राजपूत-राज्यों के आन्तरिक झगड़ों में मराठों के सहयोग की माँग बढ़ती ही गई
  • मारवाड़ के राजा अभयसिंह की मृत्यु हो जाने पर गद्दी के लिए उसके पुत्र रामसिंह और उसके भाई बख्तसिंह के मध्य संघर्ष छिड़ गया — मराठों की सहायता से बख्तसिंह ने सिंहासन प्राप्त किया
  • इसके पश्चात् भी मारवाड़ की गद्दी के लिए 1773 ई. तक संघर्ष चलता रहा
  • जयपुर नरेश सवाई जयसिंह की मृत्यु के पश्चात् मराठों ने जयपुर राज्य से भारी धन-राशि प्राप्त करने के लिए जयपुर राज्य पर बार-बार धावे बोले

मराठा प्रभाव का सार

राजपूत नरेश अपनी आन्तरिक कलह के कारण मराठों को मध्यस्थता के लिए आमंत्रित करते थे। मध्यस्थता करने के बदले मराठे इन राजपूत नरेशों से धन वसूल करते थे, साथ ही उनके राज्यों की राजनीति में भी हस्तक्षेप कर अपनी प्रभुता स्थापित करते थे। धीरे-धीरे वे राजस्थान के राज्यों में शासक निर्माता बन गए और राजपूत नरेश पूर्णतः उन पर आश्रित हो गये।

रियासतों के प्रति ब्रिटिश नीति

राजस्थान में अंग्रेजों ने बंटवारे और विभाजन की रणनीति अपनाई। उन्होंने राजस्थान को 23 रियासतों/राजवाड़ों और कुशलगढ़ तथा लावा के दो मुखियार ठिकाने बनाकर राजस्थान को टुकड़ों में बाँट दिया। इसके साथ-साथ उन्होंने अजमेर में अपना पॉलिटिकल एजेन्ट नियुक्त किया।

नीतिकालविशेषता
अधीनस्थ पृथक्करण की नीति 1818–58 ई. देशी रियासतों को अपने अधीन बनाया, अधीनस्थ सहयोगियों से ज्यादा कुछ नहीं माना
अधीनस्थ एकीकरण की नीति 1858–1935 ई. 1857 के विद्रोह से सबक लेते हुए देशी रियासतों को ब्रिटिश सत्ता का आधार स्तम्भ बनाया। महारानी विक्टोरिया की नवम्बर 1858 की घोषणा से विलय नीति का परित्याग। लॉर्ड कर्जन (1899-1905) ने परिपत्र जारी किया। लॉर्ड चेम्सफोर्ड (1916-21) के शासनकाल में 1919 में सिंहाकारण समिति और 1921 में नरेंद्र मंडल की स्थापना। लॉर्ड इरविन (1926-31) ने 26 दिसम्बर, 1927 को बटलर कमिटी नियुक्त की
समान संघ-राज्य की नीति 1935–47 ई. 1935 से 1947 के दौरान भारतीय राज्य व देशी रियासतों को शामिल करने का प्रयास — सफल नहीं हो सके

राजस्थानी रियासतें — ब्रिटिश काल

जयपुर

  • 1818 ई. की जयपुर-ब्रिटिश संधि सवाई जगत सिंह के समय में हुई
  • जगत सिंह के कोई पुत्र न होने के कारण मोहन सिंह को नरेश घोषित किया गया, बाद में सवाई जयसिंह (1819-35) को जयपुर नरेश घोषित किया गया
  • सवाई जयसिंह के बाद सवाई रामसिंह (1835-80 ई.) का शासन रहा
  • 1876 ई. में प्रिंस ऑफ वेल्स जयपुर आया — उनकी स्मृति में जयपुर में अल्बर्ट हॉल की स्थापना की गई
  • रामसिंह के बाद माधवसिंह और उनके बाद सवाई मानसिंह जयपुर नरेश बने
  • सवाई मानसिंह के शासनकाल में जयपुर में प्रजामंडल आंदोलन शुरू हुआ — परिणामस्वरूप 1948 ई. में लोकप्रिय मंत्रिमंडल की स्थापना हुई
  • अंततः जयपुर रियासत का भारत संघ में विलय हो गया

बीकानेर

  • 1818 ई. की बीकानेर-ब्रिटिश संधि सूरज सिंह के समय में हुई
  • सूरज सिंह के बाद रतन सिंह, उनके बाद सरदार सिंह और उनके बाद डूंगर सिंह बीकानेर नरेश बने
  • डूंगर सिंह के बाद उनके भाई गंगा सिंह उत्तराधिकारी बने
  • गंगा सिंह की आयु मात्र सात वर्ष होने के कारण बालिग होने तक रियासत का पॉलिटिकल एजेन्ट की मदद से चलाया गया
  • गंगा सिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र शार्दूल सिंह बीकानेर के शासक बने
  • देश के बंटवारे के बाद शार्दूल सिंह ने बीकानेर रियासत का भारत संघ में विलय स्वीकार कर लिया

मेवाड़ (उदयपुर)

  • 1818 ई. की मेवाड़-ब्रिटिश संधि भीम सिंह (1778-1828 ई.) के कार्यकाल में हुई
  • कैप्टन टॉड को मेवाड़ का पॉलिटिकल एजेन्ट नियुक्त किया गया
  • संधि के अनुसार मेवाड़ को 5 वर्ष तक अपनी आय का 1/4 भाग और उसके बाद 3/8 भाग प्रतिवर्ष कम्पनी को देना था
  • भीम सिंह के बाद — जवान सिंह (1828-38 ई.), सरदार सिंह (1838-42 ई.), स्वरूप सिंह (1842-61 ई.), शम्भू सिंह (1861-74 ई.) और सज्जन सिंह (1874-84 ई.) मेवाड़ के शासक बने
  • ब्रिटिश सरकार ने 1897 ई. में फतेह सिंह को 'ऑर्डर ऑफ द क्राउन ऑफ इंडिया' की पदवी प्रदान की
  • फतेह सिंह के बाद भूपाल सिंह 28 जुलाई, 1921 ई. को मेवाड़ के शासक बने
  • देश विभाजन के पश्चात् मेवाड़ रियासत का भारत में विलय हो गया

मारवाड़ (जोधपुर)

  • 6 जनवरी, 1818 ई. की मारवाड़-ब्रिटिश संधि मानसिंह के कार्यकाल में हुई
  • मानसिंह के बाद तख्त सिंह (1843-73 ई.), जसवंत सिंह II (1873-95 ई.) और सरदार सिंह मारवाड़ के शासक बने
  • सरदार सिंह के बाद सुमेर सिंह (1911-18 ई.) और उमेद सिंह मारवाड़ के शासक बने
  • द्वितीय विश्व युद्ध (1939-45 ई.) में उम्मेद सिंह ने जहाँ एक तरफ अंग्रेजों का साथ दिया वहीं दूसरी तरफ तत्कालीन भारतीय राष्ट्रीय नेताओं से भी सम्पर्क बनाए रखा
  • उम्मेद सिंह की मृत्यु के बाद हनुमंत सिंह मारवाड़ के शासक बने
  • इनके शासन काल में मारवाड़ रियासत का भारत में विलय हो गया

टोंक

  • 1817 ई. में टोंक रियासत को अंग्रेजों ने सरदार अमीर खाँ को प्रदान किया
  • 1857 के विद्रोह में टोंक के नवाब वजीर खाँ ने अंग्रेजों का साथ दिया
  • वजीर खाँ के बाद मोहम्मद खाँ, हाफिज इब्राहिम और हाफिज सादत अली खाँ टोंक के नवाब बने
  • 25 मार्च, 1948 ई. को टोंक को संयुक्त राजस्थान में मिला लिया गया

झालावाड़

  • झालावाड़ रियासत की स्थापना झाला मदन सिंह (1837-45 ई.) ने 17 अप्रैल, 1838 ई. में की — इस रियासत की राजधानी पाटन थी
  • मदन सिंह के बाद पुत्र पृथ्वी सिंह (1845-75 ई.) झालावाड़ के शासक बने — 1857 के विद्रोह में उन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया
  • पृथ्वी सिंह के बाद बख्त सिंह II/जालिम सिंह II (1875-99 ई.), भवानी सिंह (1899-1929 ई.), राजेन्द्र सिंह (1929-43 ई.) शासक बने
  • राजेन्द्र सिंह की मृत्यु हो जाने के बाद उनके पुत्र हरिचन्द्र झालावाड़ के शासक बने
  • मार्च, 1948 ई. में संयुक्त राजस्थान में झालावाड़ रियासत को शामिल कर लिया गया

जैसलमेर

  • जैसलमेर-ब्रिटिश संधि मूलराज सिंह के समय में हुई — मूलराज सिंह की मृत्यु के बाद गज सिंह और गज सिंह के बाद रणजीत सिंह जैसलमेर के शासक बने
  • रणजीत सिंह ने 1857 के विद्रोह के दौरान अंग्रेजों का साथ दिया
  • रणजीत सिंह के बाद बैरीसाल सिंह (1863-91 ई.), श्याम सिंह/शालिवाहन (1891-1914 ई.), जवाहर सिंह (1914-49 ई.) और रिघधारी सिंह (1949) जैसलमेर के शासक बने
  • 30 मार्च, 1949 ई. में जैसलमेर का वृहद् राजस्थान में विलय हो गया

अलवर

  • सन् 1815 ई. में बख्तावर सिंह की मृत्यु के बाद बन्ने सिंह (1815-57 ई.) अलवर नरेश बने
  • बन्ने सिंह के बाद उनका पुत्र शिवदान सिंह (1857-74 ई.) अलवर नरेश बना
  • शिवदान सिंह के विलासी होने के कारण उसे हटाकर मंगल सिंह (1874-92 ई.) को अलवर नरेश घोषित किया गया
  • मंगल सिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र जयसिंह (1892-1937 ई.) अलवर नरेश बने
  • जयसिंह ने सामाजिक बुराइयों को दूर करने के उपाय किए तथा अनेक सुधार किए
  • जयसिंह के बाद 19 मई, 1937 ई. को तेज सिंह अलवर नरेश बने
  • 17 मार्च, 1948 ई. को अलवर रियासत का भारत संघ में तथा 17 मार्च, 1948 ई. को 'मत्स्य संघ' में विलय कर लिया गया

सिरोही

  • 1823 ई. की सिरोही-ब्रिटिश संधि उदयभान सिंह के समय में हुई
  • उदयभान सिंह के बाद शिवसिंह (1847-62 ई.), उम्मेद सिंह (1862-75 ई.), केसरी सिंह (1875-1920 ई.) सिरोही के शासक बने
  • केसरी सिंह के शासन काल में सिरोही की तीव्र गति से विकास हुआ
  • केसरी सिंह के बाद स्वरूप रामसिंह (1920-46 ई.) तथा तेज सिंह सिरोही के शासक बने
  • तेज सिंह के समय में सिरोही को संयुक्त राजस्थान में शामिल कर लिया गया

कोटा

  • कोटा-ब्रिटिश संधि उम्मेद सिंह I के समय में 26 दिसम्बर, 1817 को हुई — उम्मेद सिंह के बाद 1819 ई. में किशोर सिंह II कोटा नरेश बना
  • 1 अगस्त, 1838 ई. को कोटा रियासत का दो भागों — कोटा व झालावाड़ में विभाजन हो गया
  • विभाजन के बाद कोटा रियासत का संचालन रामसिंह ने किया
  • रामसिंह के बाद उम्मेद सिंह II (1889-1940 ई.) और भीमसिंह (1940 ई.) कोटा नरेश बने
  • उम्मेद सिंह II के समय में रियासत में प्रजामंडल आंदोलन हुए
  • 25 मार्च, 1948 ई. को कोटा रियासत को संयुक्त राजस्थान में शामिल कर लिया गया

भरतपुर

  • भरतपुर के जाट शासक रणधीर सिंह ने 1815 ई. से 1823 ई. के बीच अंग्रेजों को नेपाल युद्ध, पिंडारियों के दमन और आंग्ल-मराठा युद्ध में मदद की
  • रणधीर सिंह के बाद बलदेव सिंह, बलवंत सिंह, जसवंत सिंह, राम सिंह, किशन सिंह और त्रिजेन्द्र सिंह भरतपुर के शासक बने
  • 17 मार्च, 1948 ई. को भरतपुर को 'मत्स्य संघ' में विलय हो गया

करौली

  • प्रतापमल के बाद करौली राज्य की व्यवस्था के लिए कम्पनी सरकार ने मैक मेसन को नियुक्त किया
  • गद्दी के दावेदार नरसिंह की मृत्यु के बाद करौली को ब्रिटिश राज्य में शामिल कर लिया गया
  • 1854 ई. में प्रतापमल के एक रिश्तेदार मंगलपाल को करौली का शासक घोषित किया गया
  • उसके बाद भंवरपाल, भीमपाल, गणेशपाल करौली के शासक बने
  • अगस्त, 1947 में करौली रियासत का भारत संघ में तथा 17 मार्च, 1948 ई. में 'मत्स्य संघ' में विलय हो गया

बाँसवाड़ा

  • भवानी सिंह (1819-38 ई.) और बहादुर सिंह (1838-44 ई.) के समय उनके अकुशल शासन प्रबंध के कारण बाँसवाड़ा रियासत में कम्पनी सरकार का हस्तक्षेप बराबर बना रहा
  • बहादुर सिंह के बाद लक्ष्मण सिंह (1844-1905 ई.), शम्भू सिंह (1905-13 ई.), पृथ्वी सिंह (1913-44 ई.) तथा चन्द्रवीर सिंह बाँसवाड़ा के शासक बने
  • 1948 ई. में बाँसवाड़ा में लोकप्रिय सरकार की स्थापना की गई तथा 1948 ई. में ही बाँसवाड़ा को संयुक्त राजस्थान में शामिल कर लिया गया

राजस्थान की रियासतें एवं ब्रिटिश संधियाँ

रियासतशासकसंधि की तिथिविशेष विवरण
करौलीमहाराजा हरबक्षपाल सिंह9 नवम्बर, 1817यह राजस्थान की प्रथम रियासत थी जिसने सहायक संधि की
टोंकअमीर खाँ पिंडारी17 नवम्बर, 1817इस संधि के तहत अमीर खाँ पिंडारी को टोंक का नवाब बनाया गया
कोटामहाराव उमेदसिंह-I26 दिसम्बर, 1817कोटा के प्रतिनिधि के रूप में सहायक संधि शिवदान सिंह, लाला हुकुमचंद तथा शेख जीवन राम ने चार्ल्स मैटकॉफ से दिल्ली में संपन्न की
जोधपुरमहाराजा मानसिंह6 जनवरी, 1818आसोपा विशनराम व ब्यास अभयराम ने जोधपुर की ओर से कम्पनी के साथ सहायक संधि की
मेवाड़महाराणा भीमसिंह13 जनवरी, 1818मेवाड़ में भीम सिंह की ओर से ठाकुर अजीत सिंह ने कम्पनी के साथ सहायक संधि सम्पन्न की
बूंदीमहाराव विष्णुसिंहफरवरी, 1818
बीकानेरमहाराजा सूरतसिंह9 मार्च, 1818महाराजा सूरत सिंह के प्रतिनिधि ओझा काशीनाथ ने चार्ल्स मैटकॉफ के साथ संधि सम्पन्न की
किशनगढ़महाराजा कल्याणीसिंह26 मार्च, 1818
जयपुरमहाराजा जगतसिंह-II2 अप्रैल, 1818जयपुर की ओर से ठाकुर रावल बैरीसाल नाथावत ने तथा कम्पनी की ओर से चार्ल्स मैटकॉफ ने संधि पर हस्ताक्षर किए
प्रतापगढ़महारावल सामंत सिंह5 अक्टूबर, 1818
डूंगरपुरमहारावल जसवंत सिंह-II11 दिसम्बर, 1818
जैसलमेरमहारावल मूलराज-II12 दिसम्बर, 1818
बाँसवाड़ामहारावल उम्मेदसिंह25 दिसम्बर, 1818
सिरोहीमहाराजा शिवसिंह11 सितम्बर, 1823अधीनत्व पार्थक्य की नीति के तहत अंतिम संधि सिरोही से सम्पन्न की गई
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