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प्रमुख संवैधानिक व संविधानेत्तर संस्थाएँ

1 min read 121 views 03 Sep 2026 Indian GK ExamWise शैक्षणिक टीम द्वारा जाँचा गया
भारतीय संविधान के तहत आने वाली प्रमुख संवैधानिक संस्थाएँ (महान्यायवादी, कैग, चुनाव आयोग, वित्त आयोग, लोक सेवा आयोग) एवं संविधानेत्तर निकायों (नीति आयोग, अंतर्राज्यीय परिषद) की विस्तृत व्याख्या।
Key Points
  • अनुच्छेद 76 के तहत नियुक्त महान्यायवादी भारत सरकार का प्रथम विधिक सलाहकार होता है, जिसे संसद में बोलने का अधिकार है पर मत देने का नहीं.
  • नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) का कार्यकाल अनुच्छेद 148 के तहत 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक निर्धारित होता है.
  • अनुच्छेद 280 के तहत प्रत्येक 5 वर्ष में राष्ट्रपति द्वारा वित्त आयोग का गठन किया जाता है, जिसका मुख्य कार्य करों के शुद्ध आगमों का केंद्र-राज्य विभाजन है.
  • भारतीय निर्वाचन आयोग (अनुच्छेद 324) अक्टूबर 1993 से निरंतर एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य चुनाव आयुक्तों के साथ तीन-सदस्यीय निकाय के रूप में कार्यरत है.
  • दिनेश गोस्वामी समिति और तारकुण्डे समिति का संबंध देश में चुनावी सुधारों (Election Reforms) से है.
  • योजना आयोग के स्थान पर 1 जनवरी, 2015 को स्थापित 'नीति आयोग' एक संविधानेत्तर थिंक-टैंक निकाय है, जिसके पदेन अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं.
  • 42वें संविधान संशोधन, 1976 द्वारा संविधान में अनुच्छेद 323(क) और 323(ख) जोड़कर प्रशासनिक अधिकरणों (Tribunals) का प्रावधान किया गया.
  • अंतर्राज्यीय परिषद (अनुच्छेद 263) का गठन पहली बार 10 अक्टूबर, 1990 को सरकारी आयोग की सिफारिशों के आधार पर किया गया था.

भाग 1: भारत की संवैधानिक संस्थाएँ (Constitutional Bodies)

भारतीय संविधान में देश की लोकतांत्रिक और प्रशासनिक शासन व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिए अनेक स्वतंत्र व निष्पक्ष संवैधानिक संस्थाओं का प्रावधान किया गया है, जिनका विवरण निम्नानुसार है:

1. भारत का महान्यायवादी (Attorney General — अनुच्छेद 76)

संविधान के अनुच्छेद 76(1) के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के योग्य किसी व्यक्ति को भारत का महान्यायवादी नियुक्त किया जाता है. यह देश का सर्वप्रथम विधिक अधिकारी (Chief Legal Advisor) होता है.

  • मुख्य कार्य: भारत सरकार को विधि सम्बन्धी ऐसे विषयों पर सलाह देना जो राष्ट्रपति द्वारा निर्देशित किए जाएं, तथा उन कर्त्तव्यों का पालन करना जो संविधान द्वारा सौंपे गए हों. उसे भारत के राज्यक्षेत्र के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है.
  • विशेषताएँ: वह संसद या मंत्रिमण्डल का सदस्य नहीं होता, लेकिन वह संसद के किसी भी सदन या समिति की कार्यवाही में भाग ले सकता है और बोल सकता है, परंतु उसे मतदान का अधिकार (Right to Vote) नहीं है. वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त पद धारण करता है. परंपरा के अनुसार, मंत्रिपरिषद के त्यागपत्र देने पर महान्यायवादी भी अपना पद त्याग देता है.

2. नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG — अनुच्छेद 148)

संविधान के अनुच्छेद 148 के अंतर्गत कैग (CAG) पद का प्रावधान है, जो देश की समस्त वित्तीय प्रणाली (केंद्र व राज्य दोनों स्तरों पर) के लेखा परीक्षण (Audit) का प्रधान होता है. इसकी नियुक्ति प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है.

  • पदावधि व निष्कासन: कैग का कार्यकाल पद ग्रहण की तिथि से 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) तक होता है. इसे संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से पारित प्रस्ताव (महाभियोग की भांति) द्वारा ही पदमुक्त किया जा सकता है.
  • शर्तें व कार्य: सेवानिवृत्ति के बाद वह भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन किसी लाभ के पद को धारण नहीं कर सकता. अनुच्छेद 151 के अनुसार कैग अपनी ऑडिट रिपोर्ट केंद्र के संदर्भ में राष्ट्रपति को तथा राज्यों के संदर्भ में संबंधित राज्यपाल को सौंपता है. वर्ष 1976 में एक संगठनात्मक बदलाव द्वारा कैग के कार्यक्षेत्र से 'अकाउंटिंग' (लेखांकन) को अलग कर इसे केवल 'ऑडिटिंग' (लेखा परीक्षा) तक सीमित कर दिया गया.

3. वित्त आयोग (Finance Commission — अनुच्छेद 280)

संविधान के अनुच्छेद 280 में एक अर्ध-न्यायिक निकाय के रूप में वित्त आयोग का प्रावधान है. इसका गठन प्रत्येक 5 वर्ष में राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है, जिसमें एक अध्यक्ष तथा चार अन्य सदस्य होते हैं.

  • योग्यता: वित्त आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की योग्यताओं का निर्धारण संसद द्वारा विधि बनाकर किया जाता है. अध्यक्ष सार्वजनिक जीवन का अनुभवी व्यक्ति होना चाहिए तथा सदस्य वित्तीय मामलों, अर्थशास्त्र व उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बनने की योग्यता रखने वाले होने चाहिए.
  • मुख्य कार्य (अनुच्छेद 281): आयोग राष्ट्रपति को निम्नलिखित विषयों पर अपनी सिफारिशें सौंपता है:
    1. केन्द्र और राज्यों के मध्य करों के शुद्ध आगमों के वितरण व आवंटन के संबंध में.
    2. भारत की संचित निधि में से राज्यों के राजस्व में सहायता अनुदान (Grants-in-aid) को शासित करने वाले सिद्धांतों के संबंध में.
    3. राज्य वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर पंचायतों व नगरपालिकाओं के संसाधनों की पूर्ति हेतु राज्य की संचित निधि के संवर्द्धन के संबंध में.

4. निर्वाचन आयोग (Election Commission — अनुच्छेद 324)

संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने के लिए एक अखिल भारतीय निर्वाचन आयोग की व्यवस्था की गई है. यह राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, संसद (लोकसभा-राज्यसभा) तथा राज्य विधानमण्डलों के चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण करता है.

  • बहु-सदस्यीय ढांचा: मूलतः आयोग एक-सदस्यीय था, परंतु अक्टूबर 1993 से केंद्र सरकार के निर्णय के बाद इसे स्थायी रूप से तीन सदस्यीय (एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त व दो अन्य निर्वाचन आयुक्त) बना दिया गया. सभी के पास समान अधिकार और समान वेतन-भत्ते होते हैं जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर हैं.
  • कार्यकाल व निष्कासन: आयुक्तों का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक होता है. मुख्य निर्वाचन आयुक्त को कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त रखने के लिए उसे पद से उसी रीति से हटाया जा सकता है जिस रीति से सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को (अनुच्छेद 324(5)). अन्य आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर ही राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है.
  • मुख्य कार्य: मतदाता सूचियों का निर्माण करना, चुनाव क्षेत्रों का सीमांकन (प्रत्येक 10 वर्ष बाद होने वाली जनगणना के अनुसार), राजनीतिक दलों को मान्यता देना तथा उन्हें चुनाव चिह्न आवंटित करना, और चुनाव आचार संहिता तैयार करना.

5. लोक सेवा आयोग (Public Service Commission — अनुच्छेद 315)

संविधान के अनुच्छेद 315 के अनुसार संघ के लिए एक संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्य लोक सेवा आयोग (जैसे RPSC) होगा. दो या अधिक राज्यों की सहमति पर संसद कानून द्वारा संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग (JSPSC) का गठन भी कर सकती है.

  • संघ लोक सेवा आयोग (UPSC): इसके अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है. इनका कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक होता है. इनका मुख्य कार्य सिविल सेवाओं में नियुक्तियों के लिए परीक्षाओं का आयोजन करना और अनुशासनात्मक मामलों पर सरकार को सलाह देना है.
  • अखिल भारतीय सेवाएँ (अनुच्छेद 312): राष्ट्रीय स्तर की इन सेवाओं के सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है. वर्तमान में तीन अखिल भारतीय सेवाएँ हैं: भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS), भारतीय पुलिस सेवा (IPS) तथा भारतीय वन सेवा (IFS - जिसे 1966 में शामिल किया गया).

भाग 2: संविधानेत्तर व विधिक निकाय (Non-Constitutional Bodies)

ऐसी संस्थाएँ जिनका उल्लेख मूल संविधान के अनुच्छेदों में नहीं होता, बल्कि उनका गठन कार्यपालिका के एक आदेश द्वारा या संसद के अधिनियम (कानून) द्वारा किया जाता है, संविधानेत्तर संस्थाएँ कहलाती हैं:

1. नीति आयोग (NITI Aayog — राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्थान)

केन्द्रीय मंत्रिमण्डल के एक संकल्प (Executive Resolution) के माध्यम से 15 मार्च, 1950 को स्थापित 'योजना आयोग' को समाप्त करके उसके स्थान पर 1 जनवरी, 2015 को नीति आयोग का गठन किया गया. यह सरकार के 'थिंक टैंक' (Think Tank) के रूप में कार्य करता है तथा देश के विकास में 'बॉटन-अप' (Bottom-up) दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है.

नीति आयोग का संगठनात्मक ढांचा:

  1. अध्यक्ष (Chairperson): भारत का प्रधानमंत्री (पदेन अध्यक्ष होता है).
  2. शासी परिषद (Governing Council): इसमें सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्रशासित प्रदेशों के उप-राज्यपाल/प्रशासक शामिल होते हैं, जो सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को सुदृढ़ करते हैं.
  3. क्षेत्रीय परिषदें (Regional Councils): विशिष्ट क्षेत्रीय मुद्दों के समाधान हेतु प्रधानमंत्री के निर्देश पर निश्चित कार्यकाल के लिए गठित की जाती हैं.
  4. पूर्णकालिक संगठनात्मक ढांचा: इसके अंतर्गत एक उपाध्यक्ष (प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त), पूर्णकालिक सदस्य, अंशकालिक सदस्य (अग्रणी विश्वविद्यालयों व शोध संस्थानों से अधिकतम 2), पदेन सदस्य (केन्द्रीय मंत्रिपरिषद से अधिकतम 4) और एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) शामिल होते हैं.

2. राष्ट्रीय विकास परिषद (National Development Council — NDC)

योजनाओं के निर्माण और उनके कुशल क्रियान्वयन में राज्यों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए 6 अगस्त, 1952 को कार्यपालिका के आदेश द्वारा इसका गठन किया गया था. यह एक संविधानेत्तर निकाय है जिसका अध्यक्ष भारत का प्रधानमंत्री होता है तथा सभी राज्यों के मुख्यमंत्री इसके सदस्य होते हैं. पंचवर्षीय योजनाओं को अंतिम रूप से स्वीकृति देना इसी का मुख्य कार्य था.

3. अंतर्राज्यीय परिषद (Inter-State Council — अनुच्छेद 263)

यद्यपि यह एक संवैधानिक निकाय है (अनुच्छेद 263), परंतु इसका गठन केंद्र और राज्यों के मध्य समन्वय स्थापित करने के लिए सरकारी आयोग की सिफारिश पर पहली बार 10 अक्टूबर, 1990 को राष्ट्रपति के आदेश द्वारा किया गया था.

  • संरचना: इसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है. इसके सदस्यों में सभी राज्यों व विधानसभा वाले केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री, अन्य केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासक तथा प्रधानमंत्री द्वारा मनोनीत छह कैबिनेट स्तर के मंत्री शामिल होते हैं. इसकी बैठक वर्ष में तीन बार आयोजित की जाती है.

4. प्रशासनिक और क्षेत्रीय अधिकरण (Administrative Tribunals)

मूल संविधान में अधिकरणों का प्रावधान नहीं था. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान में एक नया भाग 14 (क) जोड़कर अनुच्छेद 323 'क' (प्रशासनिक अधिकरण) एवं अनुच्छेद 323 'ख' (अन्य विषयों के लिए अधिकरण) के माध्यम से प्रशासनिक अधिकरणों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया गया. संसद द्वारा 1985 में प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम पारित कर केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) की स्थापना की गई, जो लोक सेवकों की भर्ती और सेवा शर्तों से जुड़े विवादों का निपटारा करता है.

5. लोकपाल और लोकायुक्त (Lokpal and Lokayukta)

सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के कुप्रशासन और भ्रष्टाचार के विरुद्ध शिकायतों की जांच के लिए केंद्र स्तर पर 'लोकपाल' और राज्यों के स्तर पर 'लोकायुक्त' संस्था का प्रावधान किया गया है. संसद द्वारा लंबी बहस के बाद 27 दिसंबर, 2011 को लोकसभा द्वारा लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक पारित किया गया था, जिसे बाद में विधिक अमलीजामा पहनाया गया.

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