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मौर्योत्तर काल, संगम युग एवं गुप्त काल

1 min read 126 views 03 Sep 2026 Indian GK ExamWise शैक्षणिक टीम द्वारा जाँचा गया
कक्षा VI-XII NCERT सार संकलन पर आधारित शुंग, सातवाहन, कुषाण वंश, संगम युगीन राजवंश तथा गुप्त कालीन प्रशासन, कला, अर्थव्यवस्था एवं विज्ञान के विस्तृत नोट्स।
Key Points
  • शुंग वंश की स्थापना 185 ई.पू. में पुष्यमित्र शुंग ने की थी, जिन्होंने विदिशा को अपनी राजधानी बनाया और दो अश्वमेध यज्ञ किए.
  • सातवाहन काल में ब्राह्मणों को भूमि दान देने की प्रथा शुरू हुई तथा इस वंश का समाज मातृसत्तात्मक और मुख्य भाषा प्राकृत थी.
  • कुषाण शासक कनिष्क ने 78 ई. में शक-संवत् चलाया तथा इसके दरबार में चरक, अश्वघोष और भारत के आइंस्टीन कहे जाने वाले नागार्जुन थे.
  • चोल साम्राज्य की पुनर्स्थापना 9वीं सदी में विजयालय ने तंजौर को राजधानी बनाकर की तथा राजेन्द्र प्रथम ने 'गंगैकोण्ड चोल' की उपाधि धारण की.
  • गुप्त वंश के वास्तविक संस्थापक चन्द्रगुप्त प्रथम ने 319 ई. में गुप्त संवत् चलाया, जबकि समुद्रगुप्त को 'भारत का नेपोलियन' कहा जाता है.
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय 'विक्रमादित्य' के दरबार में कालिदास और वराहमिहिर जैसे नवरत्न थे तथा चीनी यात्री फाह्यान इसी के काल में भारत आया था.
  • गुप्तकाल में सोने के सिक्कों को 'दीनार' व चाँदी के सिक्कों को 'रूप्यक' कहा जाता था तथा देवगढ़ का दशावतार मंदिर इसी काल की प्रमुख कलाकृति है.

भाग 1: मौर्योत्तर काल — प्रमुख देशी व विदेशी राजवंश

मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत में कई क्षेत्रीय राजवंशों तथा उत्तर-पश्चिम से विदेशी आक्रमणकारियों का उदय हुआ।

1. शुंग, कण्व एवं सातवाहन वंश

  • शुंग वंश (185 ई.पू.) — मौर्य सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने अन्तिम मौर्य शासक वृहद्रथ की हत्या कर शुंग वंश की नींव डाली. इन्होंने अपनी राजधानी विदिशा में स्थापित की. भरहुत स्तूप का निर्माण पुष्यमित्र शुंग ने करवाया तथा अयोध्या अभिलेख के अनुसार इन्होंने दो अश्वमेध यज्ञ किए, जिसके पुरोहित 'महाभाष्य' के रचयिता पतंजलि थे.
  • कण्व वंश (73 ई.पू.) — वासुदेव ने शुंग वंश के अन्तिम शासक देवभूति की हत्या करके इस वंश की नींव डाली. इस वंश में केवल 4 राजा (वासुदेव, भूमिमित्र, नारायण, सुशर्मा) हुए.
  • सातवाहन / आन्ध्र वंश — संस्थापक सिमुक (सिन्धुक/शिपक) ने अन्तिम कण्व नरेश सुशर्मा की हत्या कर साम्राज्य की स्थापना की. इन्होंने अपनी राजधानी प्रतिष्ठान (महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में) स्थापित की.
    • गौतमीपुत्र शातकर्णी — यह इस वंश का महानतम शासक था, जिसे नासिक अभिलेख में 'एकमात्र ब्राह्मण' या 'अद्वितीय ब्राह्मण' कहा गया है.
    • यज्ञश्री शातकर्णी — यह सातवाहन वंश का अंतिम महत्वपूर्ण शासक था, जिसके सिक्कों पर नाव के चित्र अंकित हैं.
    • विशेष तथ्य — ब्राह्मणों को भूमि-अनुदान देने की प्रथा का आरंभ सर्वप्रथम सातवाहन शासकों ने ही किया. इनकी भाषा प्राकृत एवं लिपि ब्राह्मी थी तथा इनका समाज मातृसत्तात्मक था. इन्होंने चाँदी, ताँबे, सीसे, पोटीन और काँसे की मुद्राओं का प्रचलन किया. हॉल ने 'गाथा सप्तशती' तथा गुणाढ्य ने 'बृहत्कथा' नामक पुस्तकों की रचना की.
  • कलिंग का चेदि वंश (खारवेल) — चेदि वंश की स्थापना महामेघवाहन ने की थी. इस वंश का सबसे महान शासक खारवेल था, जिसके बारे में जानकारी उदयगिरि के हाथीगुम्फा अभिलेख से प्राप्त होती है. खारवेल ने भुवनेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया था.

2. भारत में विदेशी राजवंश (इंडो-ग्रीक, शक, पहलव व कुषाण)

  • भारत में इण्डो-ग्रीक राज्य — प्रथम यूनानी आक्रमणकारी डेमेट्रियस प्रथम (183 ई.पू.) था, जिसने सियालकोट (साकल) को राजधानी बनाया. प्रसिद्ध शासक मिनाण्डर को 'एशिया का संरक्षक' कहा गया है. मिनाण्डर एवं नागसेन के बीच वार्तालाप का उल्लेख 'मिलिन्दपन्हो' नामक ग्रंथ में वर्णित है. भारत में सर्वप्रथम लेख उत्कीर्ण सिक्का एवं स्वर्ण सिक्का चलाने का श्रेय यूनानियों को है.
  • शक (सिथियन) — ये मध्य एशिया के निवासी थे जो चरागाह की खोज में भारत आए. सबसे प्रतापी शासक रुद्रदामन प्रथम (130-150 ई.) था, जिसने काठियावाड़ की अर्धशुष्क सुदर्शन झील का जीर्णोद्धार करवाया. रुद्रदामन ने ही सबसे पहले विशुद्ध संस्कृत भाषा में 'गिरनार अभिलेख' जारी किया.
  • कुषाण वंश — कुषाण मूलतः यू-ची जाति की एक शाखा थे. कुजुल कडफाइसिस प्रथम इस वंश का प्रथम शासक था. भारत में सर्वप्रथम सोने के सिक्के विम कडफाइसिस द्वारा चलाए गए, जो शैव मत का अनुयायी था.
    • कनिष्क (78 ई.) — यह सर्वाधिक शक्तिशाली कुषाण शासक था, जिसने 'शक-संवत्' (78 ई.) चलाया. इसकी राजधानी पुरुषपुर या पेशावर थी, तथा द्वितीय राजधानी मथुरा थी. इसके शासनकाल में कुण्डलवन (कश्मीर) में चौथी बौद्ध संगीति हुई. कनिष्क का राजवैद्य चरक था, जिसने 'चरक संहिता' की रचना की. इसके दरबार में वसुमित्र (विभावषा सूत्र के रचनाकार), अश्वघोष (बुद्धचरित के लेखक) और नागार्जुन (भारत का आइंस्टीन, माध्यमिक सूत्र के प्रतिपादक) जैसे विद्वान थे. इसके समय गांधार शैली एवं मथुरा शैली का विकास हुआ.

भाग 2: संगम युग — दक्षिण भारत के राजवंश

अशोक के अभिलेखों में चोल, चेर, पाण्ड्य और सतियपुत्र राज्यों का उल्लेख मिलता है.

1. प्रमुख राजवंश (चोल, चेर व पाण्ड्य)

  • चोल वंश — प्राचीन चोल साम्राज्य की राजधानी 'उरैयूर' थी. शासक करिकाल द्वारा राजधानी को कावेरीपट्टनम में स्थानांतरित किया गया. 9वीं शताब्दी में विजयालय ने तंजौर को राजधानी बनाकर चोल वंश की पुनर्स्थापना की. राजराज प्रथम ने तंजौर में प्रसिद्ध राजराजेश्वर शिव मंदिर बनवाया. राजेन्द्र प्रथम ने कलिंग और बंगाल पर विजय प्राप्त कर 'गंगैकोण्ड चोल' की उपाधि धारण की तथा कावेरी तट के निकट 'गंगैकोण्ड चोलपुरम्' नामक नई राजधानी बनाई. चोल प्रशासन में पेरुन्दरम् उच्च पदाधिकारियों को तथा शेरुन्दरम् निम्न श्रेणी के पदाधिकारियों को कहा जाता था. स्वतंत्र वेश्यावृत्ति अपनाने वाली महिला को 'रूपाजीवा' कहा जाता था.
  • चेर वंश — चेर राज्य (केरल) पाण्ड्य देश के पश्चिम और उत्तर में स्थित था. इसका प्रथम शासक उदयन जेरल था, जिसे 'लाल चेर' भी कहा जाता है. शासक सेनगुट्टुवन ने 'पत्तिनी' या 'कण्णगी' पूजा को प्रारंभ करवाया.
  • पाण्ड्य वंश — इनकी राजधानी मदुरा (मदुरै) थी और इनका प्रतीक चिह्न 'मछली' था. पाण्ड्य राज्य मोतियों के लिए प्रसिद्ध था. शासक नेडुजेलियन के कुशल शासन की जानकारी 'मदुरैकांजी' से मिलती है.

2. संगम कालीन सामाजिक व आर्थिक व्यवस्था

  • सामाजिक वर्ग — संगम साहित्य के अनुसार समाज पाँच वर्गों में बंटा था— ब्राह्मण, अरसर (शासक वर्ग), वेनिगर (वणिक वर्ग), वेल्लाल (बड़े कृषक), वेल्लार (मजदूर कृषक).
  • क्षेत्रीय विशेषताएँ (तिनई) — कुरुंजि (पहाड़िया) में विवाह-पूर्व प्रेम व पशुओं की लूट, पलाई (शुष्कभूमि) में अग्निदहन व डकैती, मुल्लै (वन प्रदेश) में संक्षिप्त विरह काल, मरुदम (मैदानी इलाके) में विवाहेत्तर प्रेम तथा नेडल (तटीय इलाके) में मछुआरों का जीवन शामिल था.
  • धार्मिक स्थिति — संगम काल में मुख्य स्थानीय देवता 'मुरुगन' थे, जो आरंभिक मध्यकाल में सुब्रह्मण्यम या कार्तिक कहलाने लगे। इनका प्रतीक चिह्न मुर्गा माना जाता था. इस काल में दास प्रथा का उल्लेख नहीं मिलता है, यद्यपि सती प्रथा का प्रचलन था. द्वितीय संगम का आयोजन स्थल 'कपाटपुरम्' (अलवै) में हुआ था.

भाग 3: गुप्त काल — भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग

श्रीगुप्त ने 275 ई. में गुप्त राजवंश की स्थापना की थी. गुप्तकाल को भारतीय इतिहास एवं संस्कृति का स्वर्णयुग माना जाता है.

1. प्रमुख गुप्त शासक एवं उनकी उपलब्धियां

  • चन्द्रगुप्त प्रथम (319-335 ई.) — यह गुप्त वंश का प्रथम वास्तविक स्वतंत्र शासक था, जिसने 'महाराजाधिराज' की उपाधि धारण की तथा प्रसिद्ध गुप्त संवत् 319 ईस्वी की शुरुआत की. इसने लिच्छवी राजकुमारी कुमारदेवी के साथ विवाह किया था.
  • समुद्रगुप्त (335-375 ई.) — इसका वास्तविक नाम 'काच' था. इसके दरबारी कवि हरिषेण ने 'इलाहाबाद प्रशस्ति' लेख की रचना की. वी.ए. स्मिथ ने समुद्रगुप्त को 'भारत का नेपोलियन' कहा है. यह महान बौद्ध भिक्षु वसुबन्धु का आश्रयदाता था तथा इसे सिक्कों पर वीणा-वादन करते हुए दिखाया गया है. प्रयाग अभिलेख में इसे 'लिच्छवी दौहित्र' बताया गया है.
  • चन्द्रगुप्त द्वितीय 'विक्रमादित्य' (375-414 ई.) — इसने शकों पर विजय के उपलक्ष्य में 'विक्रमादित्य' की उपाधि धारण की तथा चाँदी के सिक्के चलाए. इसके दरबार में नवरत्न थे— वराहमिहिर, अमरसिंह, कालिदास, बेतालभट्ट, घटकर्पर, क्षपणक, वररुचि, शकु और धन्वन्तरि (आयुर्वेदाचार्य). चीनी यात्री फाह्यान (399-411 ई.) इसी के समय भारत आया था. इसने कुतुबमीनार के पास महरौली का लौह-स्तम्भ बनवाया.
  • कुमारगुप्त प्रथम (415-455 ई.) — इसे 'महेन्द्रादित्य' भी कहा जाता है. इसके काल में नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की गई थी.
  • स्कन्दगुप्त (455-467 ई.) — इसके समय हूणों ने भारत पर आक्रमण किया, जिन्हें इसने परास्त किया. इसने गिरनार पर्वत पर स्थित सुदर्शन झील का पुनरुद्धार किया. भानुगुप्त (अन्तिम गुप्त शासकों में से एक) के समय के 510 ई. के एरण अभिलेख से सती होने का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य मिलता है.

2. गुप्तकालीन आर्थिक व्यवस्था एवं शब्दावली

शब्दावली / कर आधुनिक अर्थ / परिभाषा
भाग राजा को भूमि उत्पादन से प्राप्त होने वाला हिस्सा (उपज का 1/4 से 1/6 भाग)
भोग राजा को उपहार स्वरूप मिलने वाला कर
उपरिकर / उद्रंग स्थायी व अस्थायी काश्तकारों (कृषकों) के लिए कर
हिरण्य द्रव्य (नकद) रूप में लिया जाने वाला कर
विष्टि निःशुल्क या बेगार श्रम
दीनार / रूप्यक गुप्तकालीन सोने के सिक्कों को 'दीनार' एवं चाँदी के सिक्कों को 'रूप्यक' कहा जाता था

3. प्रशासनिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक व्यवस्था

  • प्रशासनिक इकाइयाँ — गुप्त साम्राज्य की सबसे बड़ी प्रादेशिक इकाई 'देश' थी, जिसके शासक को 'गोप्ता' कहा जाता था. दूसरी प्रादेशिक इकाई 'भुक्ति' (प्रांत) थी, जिसका शासक 'उपरिक' कहलाता था. प्रशासन की सबसे छोटी इकाई 'ग्राम' थी, जिसका मुखिया 'ग्रामिक' कहलाता था.
  • प्रशासनिक अधिकारी — महाबलाधिकृत (सेनापति), महादण्डनायक (न्यायाधीश), सन्धिविग्रहिक (युद्ध तथा संधि से संबंधित विदेश मंत्री) प्रमुख थे.
  • सामाजिक स्थिति — कायस्थों का सर्वप्रथम वर्णन याज्ञवल्क्य स्मृति में मिलता है. गुप्तकाल में वेश्यावृत्ति करने वाली महिलाओं को 'गणिका' तथा वृद्ध वेश्याओं को 'कुट्टनी' कहा जाता था. अजंता की गुफा संख्या 16, 17 और 19 गुप्तकालीन हैं, जो बौद्ध धर्म की महायान शाखा से संबंधित हैं. विष्णु शर्मा द्वारा लिखित 'पंचतंत्र' (संस्कृत) इसी काल की रचना है.

4. गुप्तकालीन विज्ञान, साहित्य एवं प्रमुख मंदिर

गुप्तकाल में विज्ञान और साहित्य के क्षेत्र में क्रांतिकारी विकास हुआ। प्रमुख विद्वानों और मंदिरों की सूची नीचे दी गई है:

विद्वान / वैज्ञानिक प्रमुख ग्रन्थ / खोज
आर्यभट्ट 'आर्यभटीय' एवं 'सूर्य सिद्धान्त' (दशमलव प्रणाली का विकास किया। सर्वप्रथम बताया कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है)
वराहमिहिर 'वृहत्संहिता' तथा 'पंचसिद्धान्तिका' (प्रसिद्ध खगोल शास्त्री)
ब्रह्मगुप्त 'ब्रह्म सिद्धान्त' (बताया कि प्राकृतिक नियमानुसार समस्त वस्तुएं पृथ्वी पर गिरती हैं — गुरुत्वाकर्षण का संकेत)
कालिदास 'मालविकाग्निमित्रम्', 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्', 'विक्रमोर्वशीयम्', 'मेघदूत', 'कुमारसंभवम्'
विशाखदत्त 'मुद्राराक्षस', 'देवीचन्द्रगुप्तम्'
प्रमुख गुप्तकालीन मंदिर स्थान / अवस्थिति
दशावतार मंदिर (सर्वप्रथम उन्नत मंदिर) देवगढ़, ललितपुर (उत्तर प्रदेश)
विष्णु मंदिर तिगवा, जबलपुर (मध्य प्रदेश)
शिव मंदिर भूमरा, नागौद (मध्य प्रदेश)
पार्वती मंदिर नचना कुठार, पन्ना (मध्य प्रदेश)
भितरगाँव का मंदिर (ईंटों से निर्मित) भितरगाँव, कानपुर (उत्तर प्रदेश)
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