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भारतीय नागरिकता (Citizenship) - नियम व अनुच्छेद

1 min read 141 views 03 Sep 2026 Indian GK ExamWise शैक्षणिक टीम द्वारा जाँचा गया
भारतीय संविधान के भाग-2, अनुच्छेद 5 से 11 के तहत नागरिकता संबंधी प्रावधान। नागरिकता अधिनियम, 1955, नागरिकता प्राप्ति के 5 प्रकार और समाप्ति के नियमों की संपूर्ण जानकारी।
Table of Contents
  1. भारतीय नागरिकता (Indian Citizenship) — संपूर्ण संवैधानिक एवं कानूनी फ्रेमवर्क
  2. नागरिकता सम्बन्धी प्रमुख संवैधानिक प्रावधान
  3. नागरिकता के विशेष अधिकार और सीमाएं
  4. अधिवास (Domicile) द्वारा नागरिकता — संवैधानिक नियम
  5. सीमा पार से प्रव्रजन (Migration) करने वाले व्यक्तियों के अधिकार
  6. नागरिकता अधिनियम, 1955: नागरिकता प्राप्ति के पाँच प्रकार
  7. नागरिकता की समाप्ति (Loss of Citizenship)
  8. नागरिकता सम्बन्धी विवाद एवं न्यायिक/राजनीतिक दृष्टिकोण
  9. विदेशों में बसे भारतीय मूल के लोगों की श्रेणियाँ (NRI, PIO, OCI)
  10. नागरिकता संशोधन विधेयक / अधिनियम (CAA)
  11. दोहरी नागरिकता (Dual Citizenship) का विशेष प्रावधान
  12. नागरिकता से सम्बन्धित अनुच्छेदों की त्वरित तालिका (Quick Reference Table)
Key Points
  • भारतीय संविधान के भाग-2 में अनुच्छेद 5 से 11 तक नागरिकता का उल्लेख है।
  • भारत में ब्रिटेन की तर्ज पर 'एकल नागरिकता' का सिद्धांत अपनाया गया है, जबकि अमेरिका में दोहरी नागरिकता है।
  • अनुच्छेद 11 संसद को नागरिकता के संबंध में कानून बनाने और संशोधन करने की सर्वोच्च शक्ति प्रदान करता है।
  • नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत नागरिकता प्राप्ति के 5 प्रकार (जन्म, वंश, पंजीकरण, देशीयकरण, भूमि अर्जन) हैं।
  • अनुच्छेद 9 के अनुसार किसी भी विदेशी राज्य की नागरिकता स्वेच्छा से लेने पर भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाती है।
  • अनिवासी भारतीयों (NRIs) को वर्ष 2011 से भारत के चुनावों में मतदान करने का कानूनी अधिकार दिया गया है।
  • OCI (ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया) योजना जनवरी 2006 में हैदराबाद के चौथे प्रवासी भारतीय दिवस में शुरू की गई थी।
  • नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश व अफगानिस्तान के 6 अल्पसंख्यक समुदायों के लिए देशीयकरण की अवधि घटाकर 5 वर्ष की गई है।

भारतीय नागरिकता (Indian Citizenship) — संपूर्ण संवैधानिक एवं कानूनी फ्रेमवर्क

भारतीय संविधान के निर्माताओं ने भारतीय संविधान के दूसरे भाग (Part-II) में अनुच्छेद 5 से 11 तक नागरिकता सम्बन्धी विभिन्न उपबन्धों का प्रावधान किया है। भारत की भौगोलिक और राजनीतिक एकता को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से भारत में ब्रिटेन के समान एकल नागरिकता (Single Citizenship) का प्रावधान किया गया है, जबकि इसके विपरीत अमेरिका जैसे देशों में दोहरी नागरिकता की व्यवस्था है।

भारत में नागरिकता के निर्धारण के लिए मुख्य कानूनी ढांचा नागरिकता अधिनियम, 1955 है। इस अधिनियम के तहत समय-समय पर व्यापक बदलाव किए गए हैं ताकि बदलते वैश्विक परिदृश्य में नागरिकता के नियमों को सुसंगत बनाया जा सके।

नागरिकता सम्बन्धी प्रमुख संवैधानिक प्रावधान

संविधान के भाग-2 के तहत अनुच्छेद 5 से 11 में नागरिकता के बुनियादी सिद्धांतों को रेखांकित किया गया है:

  • नागरिकता शीर्षक (भाग-2) — इसमें मुख्य रूप से यह स्पष्ट किया गया है कि 26 जनवरी, 1950 (संविधान के लागू होने के समय) किन व्यक्तियों को कानूनी तौर पर भारत का नागरिक माना जाएगा।
  • चार प्रमुख वर्ग (अनुच्छेद 5 से 8) — इन अनुच्छेदों के अंतर्गत नागरिकों को चार अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित कर उनके अधिकारों का उल्लेख किया गया है (अधिवास द्वारा, पाकिस्तान से आए लोग, पाकिस्तान जाने वाले लोग, और विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के व्यक्ति)।
  • नागरिकता का लोप (अनुच्छेद 9) — यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता स्वीकार कर लेता है, तो उसकी भारत की नागरिकता स्वतः ही समाप्त हो जाएगी।
  • अधिकारों की निरंतरता (अनुच्छेद 10) — प्रत्येक व्यक्ति, जो इस भाग के किसी भी उपबंध के तहत भारत का नागरिक है, उसकी नागरिकता संसद द्वारा बनाई गई विधि के अधीन बनी रहेगी।
  • संसद की विधायी शक्ति (अनुच्छेद 11) — यह अनुच्छेद संसद को नागरिकता के अर्जन (Acquisition), समाप्ति (Termination) तथा नागरिकता से सम्बन्धित अन्य सभी विषयों के सम्बन्ध में कानून (विधि) बनाने की सर्वोच्च और अनन्य शक्ति प्रदान करता है।

नागरिकता के विशेष अधिकार और सीमाएं

भारतीय संविधान केवल अपने देश के नागरिकों को ही कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण राजनीतिक और संवैधानिक पदों पर आसीन होने का विशेष अधिकार देता है। विदेशी नागरिक इन पदों के योग्य नहीं होते हैं:

  • संवैधानिक पद — राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल, उच्चतम न्यायालय व उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, महान्यायवादी (Attorney General) और महाधिवक्ता (Advocate General) जैसे सर्वोच्च पदों पर केवल और केवल भारतीय नागरिक ही नियुक्त हो सकते हैं।
  • विधायी अधिकार — संसद (लोकसभा व राज्यसभा) और राज्यों के विधानमण्डलों (विधानसभा व विधान परिषद) के सदस्य बनने का अधिकार केवल भारत के नागरिकों को प्राप्त है।

अधिवास (Domicile) द्वारा नागरिकता — संवैधानिक नियम

अनुच्छेद-5 के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति जो संविधान के प्रारम्भ के समय भारत के राज्य क्षेत्र में अधिवास (निवास) करता था, वह भारत का नागरिक होगा, यदि वह निम्न तीन शर्तों में से कम-से-कम एक शर्त पूरी करता हो:

  1. वह भारत के राज्य क्षेत्र में जन्मा हो।
  2. उसके माता-पिता में से कोई भी एक भारत के राज्य क्षेत्र में जन्मा हो।
  3. वह संविधान लागू होने से ठीक पहले कम-से-कम 5 वर्षों तक साधारण तौर पर भारत में निवासी रहा हो।

सीमा पार से प्रव्रजन (Migration) करने वाले व्यक्तियों के अधिकार

विभाजन के समय उत्पन्न परिस्थितियों को देखते हुए संविधान में विशेष प्रव्रजन नियम बनाए गए थे:

  • पाकिस्तान से भारत आए व्यक्तियों की नागरिकता (अनुच्छेद-6) — पाकिस्तान से प्रव्रजन करके भारत आए लोगों को दो वर्गों में बाँटा गया है, जिसके लिए 19 जुलाई, 1948 की तिथि अत्यंत महत्वपूर्ण मानी गई है। इस तिथि से भारत और पाकिस्तान के बीच 'अनुमति पत्र' (Permit System) प्रणाली शुरू की गई थी। जो लोग इस तिथि से पहले भारत आ गए वे सहज रूप से नागरिक बन गए, और जो इसके बाद आए उन्हें कम से कम 6 महीने भारत में रहने के बाद पंजीकरण कराना अनिवार्य था।
  • पाकिस्तान को प्रव्रजन करने वाले लोगों की नागरिकता (अनुच्छेद-7) — जो व्यक्ति 1 मार्च, 1947 के पश्चात् भारत से पाकिस्तान के लिए प्रव्रजन कर गए थे, वे भारत के नागरिक नहीं समझे जाएंगे। परंतु, यदि वे स्थायी रूप से भारत लौटने के लिए किसी पुनर्वास अनुमति पत्र के साथ वापस आ गए हैं, तो उन पर अनुच्छेद-6 के तहत 19 जुलाई, 1948 के बाद आने वाले व्यक्तियों के नियम लागू होंगे (यानी उन्हें 6 महीने रहने के बाद पंजीकरण आवेदन करना होगा)।
  • भारत से बाहर रहने वाले भारतीय मूल के व्यक्तियों की नागरिकता (अनुच्छेद-8) — उन व्यक्तियों की नागरिकता का उपबंध करता है जो स्वयं या जिनके माता-पिता, दादा-दादी या नाना-नानी में से कोई भारत शासन अधिनियम, 1935 द्वारा परिभाषित भारत में पैदा हुए थे, परंतु वर्तमान में वे भारत से बाहर किसी अन्य देश में रह रहे हैं। वे राजनयिक या काउंसलर प्रतिनिधि के समक्ष नागरिकता का आवेदन प्रस्तुत कर पंजीकरण करा सकते हैं।

नागरिकता अधिनियम, 1955: नागरिकता प्राप्ति के पाँच प्रकार

नागरिकता अधिनियम, 1955 को अब तक कुल आठ/नौ बार संशोधित किया जा चुका है (यथा- 1957, 1960, 1985, 1986, 1992, 2003, 2005, 2015, 2019)। इस अधिनियम के अनुसार नागरिकता निम्नलिखित पांच आधारों पर प्राप्त की जा सकती है:

1. जन्म से नागरिकता (By Birth)

भारत में जन्म लेने के आधार पर नागरिकता के नियमों में समय के साथ कड़े बदलाव किए गए हैं:

  • 26 जनवरी, 1950 को या उसके बाद जन्मा प्रत्येक व्यक्ति भारत का नागरिक माना जाएगा।
  • अपवाद: इस विधि के दो प्रमुख अपवाद हैं — प्रथम, यदि जन्म के समय शिशु का पिता किसी दूसरे देश का राजनयिक (Diplomat) हो, द्वितीय, शत्रुओं के अधीन भारत के किसी भाग में जन्म लेने वाले बच्चे।

2. वंशाधिकार द्वारा नागरिकता (By Descent)

भारत के बाहर जन्म लेने वाले बच्चों के लिए वंश के आधार पर नागरिकता के नियम निम्नलिखित हैं:

  • 26 जनवरी, 1950 को या उसके बाद भारत के बाहर जन्म लेने वाला व्यक्ति भारत का नागरिक हो सकता है, यदि उसके जन्म के समय उसका पिता भारत का नागरिक हो।
  • संशोधन 1992: 'नागरिकता संशोधन अधिनियम, 1992' द्वारा माता की नागरिकता के आधार पर भी विदेश में जन्मे बच्चे को नागरिकता देने का प्रावधान किया गया।
  • संशोधन 2004: 3 दिसम्बर, 2004 के बाद भारत से बाहर जन्मा कोई व्यक्ति वंश के आधार पर तब तक नागरिक नहीं हो सकता, जब तक उसके जन्म के एक वर्ष के भीतर भारतीय कौंसिलेट में उसका पंजीकरण न करा दिया गया हो या केंद्र सरकार की विशेष अनुमति न ली गई हो।

3. पंजीकरण द्वारा नागरिकता (By Registration)

ऐसा व्यक्ति जो भारतीय मूल का है, वह निम्नलिखित शर्तों के तहत पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकता है:

  • आवेदन करने से पूर्व वह लगातार 5 से 7 वर्षों तक भारत में निवास कर रहा हो।
  • संशोधन 1986: नागरिकता संशोधन अधिनियम, 1986 से पहले उपयुक्त निवास की यह अवधि मात्र 6 महीने की थी, जिसे बढ़ाकर बाद में 5 से 7 वर्ष किया गया।
  • भारतीय मूल के वे व्यक्ति जो अविभाजित भारत से बाहर किसी देश या स्थान में रह रहे हों, या जो भारतीय नागरिकों के साथ विवाह करने वाली स्त्रियां हों, अथवा भारतीय नागरिकों के अल्पवयस्क बच्चे हों, इस विधि से नागरिकता पा सकते हैं।

4. देशीयकरण द्वारा नागरिकता (By Naturalization)

किसी विदेशी नागरिक को भारत सरकार द्वारा देशीयकरण का प्रमाण पत्र दिए जाने के लिए निम्नलिखित शर्तें अनिवार्य हैं:

  • वह जिस देश का नागरिक है, उसकी नागरिकता का विधिवत त्याग कर दे।
  • वह उस देश का नागरिक नहीं होना चाहिए जहाँ देशीयकरण द्वारा भारतीय नागरिकों को नागरिकता लेने से रोका जाता हो।
  • वह देशीयकरण के आवेदन के तत्काल पूर्व कम-से-कम एक वर्ष तक लगातार भारत में रह रहा हो।
  • वह पूर्ण आयु, क्षमता एवं सद् चरित्र वाला व्यक्ति होना चाहिए।
  • उसे भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित भाषाओं में से किसी एक भाषा का पर्याप्त ज्ञान होना चाहिए।
  • उसे भारत के प्रति सकारात्मक आस्था रखना तथा निश्चित रूप से निष्ठा की एक शपथ लेनी चाहिए।

5. भूमि के अर्जन द्वारा (By Acquisition of Land)

यदि कोई नया विदेशी राज्य क्षेत्र भारतीय संघ में सम्मिलित या विलीन होता है, तो भारत सरकार यह निर्धारित करती है कि उस क्षेत्र के कौन से लोग भारत के नागरिक होंगे। उदाहरण के लिए, वर्ष 1974-75 में सिक्किम का भारत में विलय होने पर वहाँ के लोग भारत के नागरिक बने।

नागरिकता की समाप्ति (Loss of Citizenship)

नागरिकता अधिनियम, 1955 के अंतर्गत भारतीय नागरिकता का अंत तीन प्रकार से हो सकता है:

  1. परित्याग (Renunciation) — यदि कोई भी वयस्क और सक्षम भारतीय नागरिक घोषणा करके अपनी नागरिकता का स्वेच्छा से परित्याग करता है, तो उसकी नागरिकता समाप्त हो जाती है।
  2. पर्यवसान (Termination) — यदि कोई भारतीय नागरिक किसी अन्य देश की नागरिकता स्वेच्छा से स्वीकार कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता कानूनन स्वतः ही समाप्त हो जाती है।
  3. वंचित किया जाना (Deprivation) — यह केंद्र सरकार के आदेश द्वारा नागरिकता की अनिवार्य समाप्ति है। भारत सरकार निम्नलिखित आधारों पर किसी व्यक्ति को नागरिकता से वंचित कर सकती है:
    • संविधान के प्रति निष्ठा न रखने या अनादर प्रकट करने पर।
    • युद्ध के समय शत्रुओं की गैर-कानूनी सहायता या व्यापार करने पर।
    • यदि किसी व्यक्ति ने कपटपूर्वक या गलत तथ्यों के आधार पर भारतीय नागरिकता अर्जित की हो।
    • देशीयकरण या पंजीकरण द्वारा नागरिकता प्राप्ति के 5 वर्ष के अंदर किसी अन्य देश द्वारा 2 वर्ष की सजा दी जाने पर।
    • लगातार 7 वर्षों तक भारत से बाहर रहने पर।

नागरिकता सम्बन्धी विवाद एवं न्यायिक/राजनीतिक दृष्टिकोण

सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना (13वीं लोकसभा) ने इस विवाद को जन्म दिया था कि देशीयकरण (Naturalization) अथवा पंजीकरण (Registration) द्वारा नागरिकता अर्जित करने वाला कोई व्यक्ति भारत के उच्चतम संवैधानिक पदों (जैसे प्रधानमंत्री) पर आसीन हो सकता है या नहीं?

  • संवैधानिक स्थिति: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समता का आश्वासन देता है और अनुच्छेद 16 सरकारी नियोजनों में अवसर की समता प्रदान करता है तथा किसी भी विभेद का प्रतिषेध करता है। अतः भारतीय संविधान का कोई भी उपबंध देशीयकृत नागरिक को प्रधानमंत्री बनने से नहीं रोकता है।
  • वैश्विक तुलना: इसके विपरीत, अमेरिकी संविधान में स्पष्ट प्रावधान है कि केवल अमेरिका में जन्म लेने वाला व्यक्ति ही वहाँ का राष्ट्रपति बन सकता है, देशीयकृत नागरिक नहीं। लेकिन भारत में जन्म से या देशीयकरण दोनों माध्यमों से नागरिक बना व्यक्ति उच्च पदों के योग्य है।

विदेशों में बसे भारतीय मूल के लोगों की श्रेणियाँ (NRI, PIO, OCI)

विदेशों में रहने वाले प्रवासियों को भारत सरकार ने तीन मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया है:

1. अनिवासी भारतीय (Non-Resident Indians — NRIs)

  • ये ऐसे वास्तविक भारतीय नागरिक होते हैं जो साधारणतया नौकरी, व्यवसाय या शिक्षा के उद्देश्य से वर्ष में 182 दिन या उससे अधिक समय तक विदेशों में रहते हैं।
  • ये भारतीय पासपोर्ट धारण करते हैं और इन्हें भारत के आम चुनावों में मतदान करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है (वर्ष 2011 में अधिसूचना जारी कर यह अधिकार दिया गया)। फॉर्म-6A के माध्यम से ये मतदाता सूची में नाम दर्ज करा सकते हैं।

2. भारतीय मूल के व्यक्ति (Person of Indian Origin — PIO)

  • ये वे लोग हैं जो वर्तमान में किसी अन्य देश के नागरिक हैं, लेकिन स्वयं या उनके पूर्वज कभी भारत शासन अधिनियम, 1935 के अंतर्गत आने वाले भारत के नागरिक थे। इसमें पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, अफगानिस्तान, चीन या बांग्लादेश के नागरिकों को शामिल नहीं किया जाता।
  • PIO कार्ड योजना: वर्ष 2002 में भारतीय मूल के व्यक्तियों के लिए PIO Card की शुरुआत की गई थी। इसके तहत उन्हें भारत आने पर 180 दिनों तक पुलिस पंजीकरण (FRRO) से छूट और बिना वीजा 15 वर्षों तक आने की सुविधा थी, परंतु कृषि भूमि खरीदने या पर्वतारोहण/अनुसंधान कार्यों के लिए विशेष अनुमति आवश्यक थी। (नोट: जनवरी 2015 में इस योजना को समाप्त कर OCI में विलय कर दिया गया)।

3. भारत के सीमापारीय नागरिक (Overseas Citizen of India — OCI)

  • प्रारम्भ: नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2003 के माध्यम से 16 निर्दिष्ट देशों के पीआईओ को तथा नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2005 द्वारा सभी देशों (पाकिस्तान और बांग्लादेश को छोड़कर) के भारतीय मूल के व्यक्तियों को ओ.सी.आई. (OCI) योजना का लाभ दिया गया।
  • यह योजना आधिकारिक रूप से जनवरी, 2006 में हैदराबाद के चौथे प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा शुरू की गई थी। इसे लोकप्रिय रूप से 'दोहरी नागरिकता' (Dual Citizenship) भी कहा जाता है।
  • अधिकार व सीमाएं: OCI कार्ड धारकों को भारत आने के लिए 'आजीवन वीजा मुक्त प्रवेश' (Lifelong Visa-free Entry) की सुविधा मिलती है। परंतु इन्हें भारत में मतदान करने का अधिकार नहीं है, और न ही ये किसी सार्वजनिक या संवैधानिक पद को प्राप्त कर सकते हैं।
  • OCI की समाप्ति: यदि कोई OCI कार्ड धारक झूठे तथ्यों के आधार पर कार्ड प्राप्त करता है, संविधान के प्रति असम্মান दिखाता है, युद्ध के समय शत्रु देश की सहायता करता है, या कार्ड मिलने के 5 वर्ष के भीतर 2 वर्ष की जेल काटता है, तो केंद्र सरकार उसकी ओ.सी.आई. नागरिकता समाप्त कर सकती है।

नागरिकता संशोधन विधेयक / अधिनियम (CAA)

नागरिकता संशोधन विधेयक के माध्यम से पड़ोसी देशों के पीड़ित अल्पसंख्यकों को राहत दी गई है:

  • यह अधिनियम मुख्य रूप से बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से बिना वैध दस्तावेजों के (अवैध प्रवासियों के रूप में) आए छह धार्मिक अल्पसंख्यकों — हिन्दू, बौद्ध, सिख, जैन, पारसी और ईसाई नागरिकों को प्राकृतिकरण (Naturalisation) द्वारा अत्यंत सुगमता से भारतीय नागरिकता प्रदान करने के लिए बनाया गया है।
  • इसके तहत देशीयकरण द्वारा नागरिकता के लिए भारत में रहने की अनिवार्य अवधि को 11 वर्ष से घटाकर कम-से-कम 5 वर्ष कर दिया गया है। पहले देशीयकरण की यह अवधि 10 या 11 वर्ष थी। यह संशोधन जम्मू-कश्मीर और असम सहित भारत के सभी राज्यों पर प्रभावी रूप से लागू है।

दोहरी नागरिकता (Dual Citizenship) का विशेष प्रावधान

दोहरी नागरिकता के अंतर्गत ऐसे भारतीयों को जो 26 जनवरी, 1950 (पाकिस्तान और बांग्लादेश को छोड़कर) के बाद देश छोड़कर विदेशों में चले गए थे, उन्हें कुछ विशेष आर्थिक और शैक्षणिक अधिकार देने के लिए विदेशी नागरिकता के साथ भारतीय नागरिकता (ओसीआई के रूप में) का प्रावधान किया गया है, बशर्ते उनके देश में दोहरी नागरिकता की अनुमति हो।

नागरिकता से सम्बन्धित अनुच्छेदों की त्वरित तालिका (Quick Reference Table)

अनुच्छेद मुख्य विषय-वस्तु / संवैधानिक प्रावधान
अनुच्छेद 5 संविधान लागू होने के समय भारत में अधिवास (Domicile) रखने वाले व्यक्तियों की नागरिकता।
अनुच्छेद 6 पाकिस्तान से भारत को प्रव्रजन (Migration) करने वाले कुछ विशेष व्यक्तियों के नागरिकता के अधिकार।
अनुच्छेद 7 पाकिस्तान को प्रव्रजन करने वाले (1 मार्च 1947 के बाद जाने वाले) लोगों के नागरिकता अधिकारों का निलंबन व पुनर्वास।
अनुच्छेद 8 भारत के बाहर रहने वाले भारतीय मूल के (जैसे विदेशों में जन्में) व्यक्तियों के नागरिकता अधिकार।
अनुच्छेद 9 विदेशी राज्य की नागरिकता स्वेच्छा से अर्जित करने वाले व्यक्तियों की भारतीय नागरिकता का स्वतः समाप्त होना।
अनुच्छेद 10 नागरिकता के अधिकारों की निरंतरता (संसद की विधि के बिना नागरिकता नहीं छीनी जा सकती)।
अनुच्छेद 11 संसद द्वारा कानून (विधि) बनाकर नागरिकता के अधिकारों का नियमन और संशोधन करने की शक्ति।
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