विजयनगर व बहमनी साम्राज्य, प्रशासन व कला
Table of Contents
- भाग 1: विजयनगर साम्राज्य (1336 ई. — 1565 ई.)
- 1. प्रमुख विजयनगर शासक एवं घटनाएं
- 2. कृष्णदेव राय के 'अष्टदिग्गज' (तेलुगु कवि)
- 3. विजयनगर कालीन प्रशासनिक, आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था
- भाग 2: बहमनी साम्राज्य (स्थापना एवं विभाजन)
- 1. प्रमुख बहमनी शासक एवं बिंदु
- 2. बहमनी साम्राज्य का विघटन / पांच स्वतंत्र राज्य
Key Points
- दक्षिण भारत में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 1336 ई. में हरिहर और बुक्का नामक दो भाइयों ने की थी.
- इटली का प्रसिद्ध यात्री निकोलो डिकोंटी 1420 ई. में संगम वंश के शासक देवराय प्रथम के काल में विजयनगर आया था.
- राजा कृष्णदेव राय ने तेलुगु भाषा में राजनीति पर आधारित प्रसिद्ध ग्रंथ 'अमुक्तmaalyad' की रचना की थी.
- प्रसिद्ध तालीकोटा का युद्ध 23 जनवरी, 1565 ई. को हुआ, जिसमें दक्षिण के मुस्लिम राज्यों के मोर्चे ने विजयनगर को पराजित किया.
- विजयनगर काल में प्रांतीय भूमि-सामंतों को 'नायक' और ग्रामीण प्रशासन संभालने वाले 12 अधिकारियों के समूह को 'आयंगर' कहा जाता था.
- बहमनी साम्राज्य की स्थापना 1347 ई. में अलाउद्दीन हसन बहमन शाह द्वारा गुलबर्गा को राजधानी बनाकर की गई थी.
- बहमनी साम्राज्य के विघटन के बाद पांच नए स्वतंत्र राजवंशों (इमादशाही, आदिलशाही, निजामशाही, कुतुबशाही और बरीदशाही) का उदय हुआ.
भाग 1: विजयनगर साम्राज्य (1336 ई. — 1565 ई.)
मोहम्मद बिन तुगलक के समय दो भाइयों हरिहर और बुक्का ने विद्यारण्य सन्त से आशीर्वाद प्राप्त कर दक्षिण भारत में 1336 ई. में स्वतन्त्र विजयनगर साम्राज्य की नींव डाली एवं अपने पिता संगम के नाम पर 'संगम राजवंश' की स्थापना की। विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हम्पी थी तथा इनकी राजभाषा तेलुगु थी।
1. प्रमुख विजयनगर शासक एवं घटनाएं
- हरिहर प्रथम व बुक्का प्रथम — हरिहर प्रथम (1336-56 ई.) ने तुंगभद्रा नदी के दक्षिणी तट पर 'विजयनगर' और 'विद्यानगर' शहर की स्थापना की। बुक्का प्रथम (1356-77 ई.) ने 'वेदमार्ग प्रतिष्ठापक' की उपाधि धारण की तथा बहमनी शासक से मुद्गल के किले का प्रसिद्ध युद्ध किया।
- देवराय प्रथम (1406-22 ई.) — इन्होंने तुंगभद्रा नदी पर बांध का निर्माण कराया तथा पहली बार मुसलमानों को विजयनगर की सेना में भर्ती करने की प्रक्रिया प्रारंभ की। इनके शासनकाल में 1420 ई. में इटली का यात्री निकोलो डिकोंटी भारत आया था।
- देवराय-II (इमाडिदेवराय) — यह संगम वंश का सबसे प्रतापी राजा था। एक अभिलेख में इसे 'गजबेटकर' (हाथियों का शिकारी) कहा गया है। इसने संस्कृत ग्रंथ 'महानाटक सुधानिधि' एवं ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखा।
- कृष्णदेव राय (1509-29 ई.) — ये विजयनगर के सबसे महान शासक थे, जिन्हें 'आन्ध्रभोज', 'अभिनव भोज' और 'आन्ध्र पितामह' की उपाधियाँ प्राप्त थीं। बाबर ने अपनी आत्मकथा बाबरनामा में इन्हें भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक बताया है। इन्होंने तेलुगु में 'अमुक्तमाल्याद' तथा संस्कृत में 'जाम्बवती कल्याणम्' एवं 'उषा परिणय' की रचना की। इन्होंने 'नागलपुर' नामक नए नगर एवं हजारा तथा विट्ठलस्वामी मंदिरों का निर्माण करवाया।
- तालीकोटा का युद्ध (राक्षसी-तंगड़ी या बन्नीहट्टी) — यह युद्ध 23 जनवरी, 1565 ई. को हुआ, जिसके कारण विजयनगर का पतन हुआ। युद्ध में विजयनगर का नेतृत्व रामराय कर रहा था। इसके विरुद्ध बने दक्षिण राज्यों के संघ में बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुण्डा एवं बीदर शामिल थे (बरार शामिल नहीं था)। इस युद्ध का प्रत्यक्षदर्शी विदेशी यात्री 'सीज़र फ्रेडरिक' था।
- आरावीडू वंश (1570-1672 ई.) — यह विजयनगर का चौथा राजवंश था, जिसकी स्थापना तिरुमल ने सदाशिव को अपदस्थ कर पेनुकोंडा में की थी। इसी वंश के शासक वेंकट-II के शासनकाल में ही वोडेयार ने 1612 ई. में मैसूर राज्य की स्थापना की थी।
2. कृष्णदेव राय के 'अष्टदिग्गज' (तेलुगु कवि)
कृष्णदेव राय के युग को तेलुगु साहित्य का गौरवशाली युग कहा जाता है क्योंकि उनके दरबार में तेलुगु साहित्य के 8 सर्वश्रेष्ठ कवि (अष्टदिग्गज) रहते थे:
- अल्लसानी पेइ्डना — इन्हें 'तेलुगु कविता का पितामह' कहा जाता है। इनकी प्रमुख रचनाएँ 'स्वारोचितसंभव या मनुचरित्र' तथा 'हरिकथा शरणम्' हैं।
- तेनालीराम — प्रसिद्ध कवि, जिन्होंने 'पांडुरंग महात्म्य' की रचना की।
- अन्य प्रमुख कवि — नंदितिममन (पारिजात हरण), याद्वग्गी मल्लन (राजशेखर चरित), धूर्जटि (कलहसित महात्म्य), भट्टमूर्ति (नरसभूपालियम), जिंग्लीरन (राघवपांडवीय) और अच्युतराजु रामचन्द्र (रामाभ्युदय सकलकथा एवं सार संग्रह)।
3. विजयनगर कालीन प्रशासनिक, आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था
- प्रशासनिक इकाइयाँ — विजयनगर साम्राज्य की प्रशासनिक इकाइयों का घटता क्रम इस प्रकार था: प्रांत (मंडल) → कोटटम या वलनाडू (जिला) → नाडू → मेलग्राम (50 ग्राम का समूह) → ऊर (ग्राम)।
- नायंकर व्यवस्था — यह विजयनगर प्रशासन की सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था थी। इसके अंतर्गत नायक वस्तुतः 'भू-सामंत' थे, जिन्हें राजा वेतन के बदले विशेष भूखंड देता था, जो 'अमरम्' कहलाता था।
- आयंगर व्यवस्था — यह ग्रामीण प्रशासन से जुड़ी व्यवस्था थी, जिसमें स्थानीय स्वायत्त व्यवस्था की वास्तविक शक्ति 12 ग्रामीण अधिकारियों (आयंगरों) के हाथों में थी, जिनके पद वंशानुगत होते थे। 'कर्णिक' नामक आयंगर के पास जमीन के क्रय-विक्रय से सम्बन्धित समस्त दस्तावेज होते थे।
- सामाजिक स्थिति व कर — विजयनगर साम्राज्य की आय का सबसे बड़ा स्रोत 'लगान' था, जहाँ भूराजस्व की दर उपज का 1/6 वाँ भाग थी। यहाँ 'विवाह-कर' वर एवं वधू दोनों पक्षों से लिया जाता था, परन्तु विधवा से विवाह करने वाले इस कर से मुक्त थे। क्रयी दासों को 'बेसclassification/बेसवर्ग' कहा जाता था। भूमि के क्रय-विक्रय के साथ हस्तांतरित होने वाले कृषक मजदूर 'कूदि' कहलाते थे। गोवा को बहमनी से सर्वप्रथम छीनने वाला पहला विजयनगर शासक हरिहर-II था।
भाग 2: बहमनी साम्राज्य (स्थापना एवं विभाजन)
दक्षिण भारत में फारस के सुल्तान बहमनदीन के इस्कन्दियार के वंशज 'हसन' ने 1347 ई. में तुगलक साम्राज्य से विद्रोह कर स्वतन्त्र बहमनी साम्राज्य की नींव डाली। इसने 11 अगस्त, 1347 ई. को 'अबुल-ए-मुजफ्फर अलाउद्दीन हसन बहमन शाह' की उपाधि धारण की। इसकी राजधानी गुलबर्गा थी तथा राजभाषा मराठी थी।
1. प्रमुख बहमनी शासक एवं बिंदु
- मोहम्मदशाह प्रथम — अलाउद्दीन हसन के पश्चात् शासक बना, जिसके काल में ही सबसे पहले बारूद का प्रयोग (बुक्का प्रथम के विरुद्ध) हुआ था।
- फिरोजशाह बहमनी — इसके और देवराय प्रथम के बीच 'सोनार की बेटी का युद्ध' हुआ, जिसमें देवराय पराजित हुआ और उसे 10 लाख का हर्जाना देना पड़ा। इसने भीमा नदी के तट पर 'फिरोजाबाद' की स्थापना की तथा खगोलशास्त्र के अध्ययन के लिए दौलताबद में एक वेधशाला बनवाई।
- शहाबुद्दीन अहमद प्रथम — इसने अपनी राजधानी गुलबर्गा से हटाकर 'बीदर' में स्थापित की तथा बीदर का नया नाम 'मोहम्मदाबाद' रखा।
- मुहम्मद-III व महमूद गवाँ — मुहम्मद-III ने 'ख्वाजा जहाँ' की उपाधि से सम्मानित महमूद गवाँ को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया था। 1481-82 ई. में राजद्रोह के झूठे आरोप में महमूद गवाँ को फाँसी दे दी गई। इसके काल में 1470-74 ई. में रूसी यात्री 'अफानासी निकितिन' बहमनी साम्राज्य की यात्रा पर आया था।
- प्रशासनिक शब्दावली — दौलताबाद का तरफदार (प्रांतपति) 'मसनद-ए-आली' एवं बरार का तरफदार 'मजलिस-ए-आली' कहलाता था। सुल्तान के महल व दरबार की सुरक्षा के लिए अंगरक्षक सैनिक दल 'साख-ए-खेल' कहलाता था, जिसका मुख्य अधिकारी 'सर-ए-नौबत' होता था। बीजापुर के शासक यूसुफ आदिलशाह के संरक्षण में फरिश्ता ने ऐतिहासिक ग्रंथ 'तारीख-ए-फरिश्ता' की रचना की।
2. बहमनी साम्राज्य का विघटन / पांच स्वतंत्र राज्य
कलान्तर में बहमनी साम्राज्य का विघटन हो गया और वह निम्नलिखित पाँच राज्यों में स्वतन्त्र हो गया:
| स्वतन्त्र राज्य | राजधानी | स्थापना वर्ष | संस्थापक शासक | राजवंश का नाम |
|---|---|---|---|---|
| बरार | एलिचपुर / गाविलगढ़ | 1484 ई. | फतेहउल्ला इमादशाह | इमादशाही |
| बीजापुर | नौरसपुर | 1489 ई. | यूसुफ आदिलशाह | आदिलशाही |
| अहमदनगर | जुनार / खिरकी / अहमदनगर | 1490 ई. | मलिक अहमद | निजामशाही |
| गोलकुंडा | गोलकुंडा | 1512 ई. | कुली कुतुबशाह | कुतुबशाही |
| बीदर | बीदर | 1526 ई. | अमीर अली बरीद | बरीदशाही |