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संघीय संसद: लोकसभा संरचना, कार्य एवं विधायी प्रक्रिया

1 min read 27 views 06 Jul 2026 Indian GK
भारतीय संसद के निम्न सदन लोकसभा (अनुच्छेद 81) की संरचना, निर्वाचन, परिसीमन, कार्यकाल, प्रमुख पदाधिकारी (अध्यक्ष व उपाध्यक्ष), विधायी व संयुक्त अधिवेशन प्रक्रिया तथा धन विधेयक (अनुच्छेद 110) का संपूर्ण गहन विवरण।
Table of Contents
  1. संघीय संसद: लोकसभा की संरचना (Structure of Lok Sabha)
  2. सदस्य संख्या एवं प्रतिनिधित्व
  3. सदन का परिसीमन (Delimitation 2026 अपडेट)
  4. सदस्यों की योग्यताएँ एवं निर्हताएं (Qualifications & Disqualifications)
  5. लोकसभा का कार्यकाल (अनुच्छेद 83(2))
  6. अधिवेशन एवं गणपूर्ति (Session & Quorum)
  7. लोकसभा के प्रमुख पदाधिकारी
  8. 1. लोकसभा अध्यक्ष (Speaker)
  9. 2. उपाध्यक्ष, प्रोटेम स्पीकर एवं महासचिव
  10. लोकसभा की शक्तियाँ एवं विधायी प्रक्रिया
  11. 1. व्यवस्थापिका सम्बन्धी शक्ति व संयुक्त अधिवेशन (अनुच्छेद 108)
  12. 2. कार्यपालिका पर नियंत्रण की शक्ति (अनुच्छेद 75(3))
  13. 3. वित्तीय शक्ति एवं धन विधेयक (Money Bill - अनुच्छेद 110)
  14. संसद के विभिन्न प्रस्ताव व चर्चाएँ
  15. शीर्ष लोकसभा सीटों वाले 5 राज्य (तालिका)
  16. भारत का महान्यायवादी (Attorney General - अनुच्छेद 76)
Key Points
  • लोकसभा (अनुच्छेद 81) संसद का निम्न व लोकप्रिय सदन है, जिसके सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा होता है.
  • 61वें संविधान संशोधन (1989) द्वारा मताधिकार की न्यूनतम आयु सीमा को 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष किया गया.
  • किसी विधेयक के धन विधेयक होने का अंतिम निर्धारण करने की अनन्य शक्ति केवल लोकसभा अध्यक्ष को प्राप्त है.
  • संसद के दोनों सदनों में गतिरोध होने पर अनुच्छेद 108 के तहत संयुक्त अधिवेशन बुलाया जाता है, जिसकी अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करता है.
  • भारतीय इतिहास में अब तक कुल तीन बार (1961, 1978, 2002) संसद का संयुक्त अधिवेशन बुलाया गया है.
  • धन विधेयक (अनुच्छेद 110) केवल लोकसभा में पेश हो सकता है और राज्यसभा इसे अधिकतम 14 दिनों तक ही रोक सकती है.
  • शून्य काल (Zero Hour) दोपहर 12 बजे से शुरू होने वाली भारतीय संसद की अपनी एक विशिष्ट व्यवस्था है जो 1962 से चल रही है.
  • उत्तर प्रदेश 80 लोकसभा सीटों के साथ देश में सर्वाधिक प्रतिनिधित्व रखने वाला राज्य है.

संघीय संसद: लोकसभा की संरचना (Structure of Lok Sabha)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 81 में लोकसभा के गठन का प्रावधान किया गया है. लोकसभा को 'लोकप्रिय सदन' (Popular House) या 'निम्न सदन' भी कहा जाता है, क्योंकि इसके सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से वयस्क मताधिकार के आधार पर चुने जाते हैं.

सदस्य संख्या एवं प्रतिनिधित्व

  • अधिकतम सदस्य संख्या: 31वें संविधान संशोधन (1974) द्वारा लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 547 निश्चित की गई थी. इसके बाद गोवा, दमन और दीव पुनर्गठन अधिनियम, 1987 द्वारा यह निश्चित किया गया कि सदन की अधिकतम सदस्य संख्या 552 हो सकती है. इनमें से अधिकतम 530 सदस्य राज्यों के निर्वाचन क्षेत्रों से तथा 20 सदस्य संघ शासित क्षेत्रों से निर्वाचित हो सकते हैं.
  • वर्तमान स्थिति (वर्ष 2026 के अनुसार): 84वें संविधान संशोधन (2001) द्वारा यह निर्णय लिया गया था कि लोकसभा में राज्यों को आवंटित सीटों की संख्या वर्ष 2026 तक यथावत रखी जाएगी. 104वें संविधान संशोधन द्वारा आंग्ल-भारतीय समुदाय के 2 सदस्यों के मनोनयन को समाप्त किए जाने के बाद, वर्तमान में लोकसभा की प्रभावी और वास्तविक सदस्य संख्या 543 है, जो पूरी तरह से जनता द्वारा निर्वाचित है.
  • वयस्क मताधिकार: मूल संविधान में मताधिकार की आयु 21 वर्ष थी, किंतु 61वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1989 द्वारा इसे घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया (अनुच्छेद 326).

सदन का परिसीमन (Delimitation 2026 अपडेट)

संविधान के अनुसार प्रत्येक 10 वर्ष में होने वाली जनगणना के बाद परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) का गठन किया जाता है. वर्तमान में लोकसभा में सीटों का राज्यवार आवंटन 1971 की जनगणना के आधार पर निर्धारित है. अनुच्छेद 81(2) के अनुसार, प्रत्येक राज्य को लोकसभा में स्थानों का आवंटन इस प्रकार किया जाता है कि स्थानों की संख्या से उस राज्य की जनसंख्या का अनुपात सभी राज्यों के लिए यथासाध्य एक समान हो. यह उपबंध उन राज्यों पर लागू नहीं होता जिनकी जनसंख्या 60 लाख से कम है.

विशेष ध्यान रहे (वर्ष 2026): 84वें संविधान संशोधन (2001) द्वारा सीटों की संख्या पर लगाई गई रोक की समय-सीमा वर्ष 2026 में समाप्त हो रही है, जिसके कारण आगामी जनगणना के आधार पर नए राष्ट्रव्यापी परिसीमन और संसद के नए स्वरूप को लेकर विधायी प्रक्रियाएं चर्चा में हैं.

सदस्यों की योग्यताएँ एवं निर्हताएं (Qualifications & Disqualifications)

योग्यताएँ (अनुच्छेद 84):

  1. वह भारत का नागरिक हो.
  2. उसकी आयु न्यूनतम 25 वर्ष हो.
  3. वह निर्वाचन आयोग द्वारा प्राधिकृत व्यक्ति के समक्ष शपथ ले चुका हो.
  4. वह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत संसद द्वारा निर्धारित अन्य सभी योग्यताएं रखता हो.

निर्हताएं (अनुच्छेद 101 व 102):

  • यदि कोई व्यक्ति भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन किसी लाभ के पद पर हो (मंत्रियों का पद लाभ का पद नहीं माना जाता).
  • यदि वह विकृतचित्त या दिवालिया हो.
  • यदि उसने स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता अर्जित कर ली हो.
  • दल-बदल कानून: 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा संविधान में 10वीं अनुसूची जोड़कर दल-बदल करने वाले सदस्यों को अयोग्य घोषित करने का प्रावधान किया गया है.
  • विवादों का निपटारा (अनुच्छेद 103): यदि सदस्यों की अयोग्यता संबंधी कोई प्रश्न उठता है, तो उसका निर्णय राष्ट्रपति करता है. राष्ट्रपति इस विषय में निर्वाचन आयोग (Election Commission) की राय लेगा और उसकी राय के अनुसार कार्य करेगा.

लोकसभा का कार्यकाल (अनुच्छेद 83(2))

  • लोकसभा का कार्यकाल प्रथम बैठक की तारीख से 5 वर्ष तक होता है. अवधि समाप्त होते ही लोकसभा स्वतः भंग हो जाती है, परंतु इससे पूर्व भी प्रधानमंत्री के परामर्श पर राष्ट्रपति द्वारा इसे भंग किया जा सकता है.
  • आपातकाल में विस्तार: राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा लागू होने पर संसद विधि द्वारा लोकसभा के कार्यकाल में एक बार में 1 वर्ष से अधिक की वृद्धि नहीं कर सकती. आपातकाल की समाप्ति के पश्चात् किसी भी दशा में इसका विस्तार 6 माह से अधिक नहीं रहेगा.
  • ऐतिहासिक तथ्य: 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा लोकसभा का कार्यकाल 6 वर्ष कर दिया गया था, जिसे पुनः 44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा घटाकर 5 वर्ष किया गया.

अधिवेशन एवं गणपूर्ति (Session & Quorum)

  • राष्ट्रपति वर्ष में कम से कम दो बार लोकसभा का अधिवेशन बुलाता है. लोकसभा के एक सत्र की अंतिम बैठक तथा आगामी सत्र की पहली बैठक के लिए नियत तारीख के बीच 6 माह से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए.
  • गणपूर्ति (Quorum): सदन की कार्यवाही शुरू करने के लिए कुल सदस्य संख्या का 1/10 भाग उपस्थित होना अनिवार्य है. यदि कोरम पूरा नहीं है, तो अध्यक्ष सदन को तब तक के लिए निलंबित कर सकता है जब तक गणपूर्ति न हो जाए.

लोकसभा के प्रमुख पदाधिकारी

1. लोकसभा अध्यक्ष (Speaker)

संविधान के अनुच्छेद 93 के अनुसार लोकसभा अपने सदस्यों में से एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष चुनती है. अध्यक्ष को ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमंस की तरह गरिमा प्राप्त है, परंतु भारतीय अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद अपनी दलीय सदस्यता का औपचारिक त्याग नहीं करता. वर्तमान 18वीं लोकसभा के अध्यक्ष के रूप में श्री ओम बिरला कार्यरत हैं (जो लगातार दूसरी बार इस पद पर चुने गए हैं).

  • वेतन: वर्तमान में अध्यक्ष को 1,25,000 रुपये मासिक वेतन तथा अन्य निःशुल्क सुविधाएं प्राप्त होती हैं.
  • त्यागपत्र: अध्यक्ष अपना त्यागपत्र उपाध्यक्ष को सौंपता है तथा उपाध्यक्ष अपना त्यागपत्र अध्यक्ष को देता.
  • पदच्युति: लोकसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा अध्यक्ष को पद से हटाया जा सकता है, बशर्ते इसकी सूचना 14 दिन पूर्व दी गई हो. अनुच्छेद 94 के अनुसार लोकसभा भंग होने पर भी अध्यक्ष अगली लोकसभा की प्रथम बैठक तक अपना पद नहीं छोड़ता.

अध्यक्ष के मुख्य अधिकार तथा कार्य:

  1. वह लोकसभा की बैठकों की अध्यक्षता करता है और सदन की कार्यवाही का संचालन करता है.
  2. सदन में शांति व्यवस्था बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी है, व्यवस्था भंग करने वाले सदस्यों को वह बाहर जाने का आदेश दे सकता है.
  3. वह तय करता है कि कोई विधेयक धन विधेयक (Money Bill) है या नहीं; इस संबंध में उसका निर्णय अंतिम होता है.
  4. संसद के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन (Joint Session) की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है (अनुच्छेद 118(4)).
  5. सामान्य स्थिति में वह मत नहीं देता, परंतु किसी विषय पर पक्ष और विपक्ष में बराबर मत होने पर वह अपना निर्णायक मत (Casting Vote) देता है (अनुच्छेद 100(1)).

2. उपाध्यक्ष, प्रोटेम स्पीकर एवं महासचिव

  • लोकसभा उपाध्यक्ष: अध्यक्ष की अनुपस्थिति में वह सदन की अध्यक्षता करता है तथा उपाध्यक्ष के रूप में वह 'सचिवालय बजट समिति' का पदेन अध्यक्ष होता है. स्वतंत्रता के बाद प्रथम उपाध्यक्ष अनन्तशयनम आयंगर थे.
  • प्रोटेम स्पीकर (Protem Speaker): आम चुनावों के बाद राष्ट्रपति नवनिर्वाचित सदस्यों में से सबसे वरिष्ठ सदस्य को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त करता है, जिसका मुख्य कार्य नए सदस्यों को शपथ दिलाना तथा नए अध्यक्ष के चुनाव का संचालन करना होता है.
  • लोकसभा महासचिव: यह कार्यपालिका का स्थायी पदाधिकारी होता है जो 60 वर्ष की आयु तक कार्य कर सकता है. यह सदन का प्रशासनिक प्रधान होता है.

लोकसभा की शक्तियाँ एवं विधायी प्रक्रिया

1. व्यवस्थापिका सम्बन्धी शक्ति व संयुक्त अधिवेशन (अनुच्छेद 108)

प्रत्येक साधारण विधेयक को कानून बनने के लिए लोकसभा और राज्यसभा दोनों की स्वीकृति आवश्यक है. यदि किसी साधारण विधेयक पर दोनों सदनों में मतभेद उत्पन्न हो जाता है, तो गतिरोध दूर करने के लिए राष्ट्रपति अनुच्छेद 108 के तहत दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन (Joint Session) बुलाता है.

  • संयुक्त अधिवेशन में निर्णय दोनों सदनों के उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के साधारण बहुमत से होता है.
  • चूंकि लोकसभा की सदस्य संख्या राज्यसभा की तुलना में लगभग दोगुनी है, इसलिए इस संयुक्त बैठक में निर्णय सामान्यतः लोकसभा की इच्छानुसार ही होता है.
  • ऐतिहासिक तथ्य: भारतीय इतिहास में अब तक केवल तीन बार संयुक्त अधिवेशन बुलाया गया है:
    1. 6 मई, 1961: दहेज निरोधक विधेयक (जवाहर लाल नेहरू के काल में).
    2. 16 मई, 1978: बैंकिंग सेवा आयोग विधेयक (मोरारजी देसाई के काल में).
    3. 26 मार्च, 2002: आतंकवाद निरोधी विधेयक - पोटा (अटल बिहारी वाजपेयी के काल में).

2. कार्यपालिका पर नियंत्रण की शक्ति (अनुच्छेद 75(3))

अनुच्छेद 75(3) के अनुसार केंद्रीय मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से केवल लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है. लोकसभा अनेक प्रकार से कार्यपालिका पर नियंत्रण रखती है:

  • लोकसभा के सदस्य मंत्रियों से सरकारी नीति के संबंध में प्रश्न तथा पूरक प्रश्न पूछ सकते हैं.
  • सदन के सदस्य कार्यपालिका की कमियों को उजागर करने के लिए काम रोको प्रस्ताव (Adjournment Motion) या निन्दा प्रस्ताव ला सकते हैं.
  • यदि लोकसभा सरकार द्वारा पेश किए गए बजट को अस्वीकृत कर दे या राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव को अस्वीकार कर दे, तो मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना पड़ता है.

3. वित्तीय शक्ति एवं धन विधेयक (Money Bill - अनुच्छेद 110)

वित्तीय क्षेत्र में लोकसभा की स्थिति अत्यंत सुदृढ़ है और राज्यसभा की स्थिति इसके समक्ष बहुत गौण (Secondary) है.

  • अनुच्छेद 109 के अनुसार धन विधेयक केवल लोकसभा में ही प्रस्तावित किए जा सकते हैं, राज्यसभा में नहीं.
  • लोकसभा से पारित होने के बाद धन विधेयक को राज्यसभा के पास भेजा जाता है. राज्यसभा को धन विधेयक की प्राप्ति की तिथि से 14 दिनों के भीतर उसे अपनी सिफारिशों सहित लोकसभा को लौटाना पड़ता है.
  • यदि राज्यसभा 14 दिनों के भीतर विधेयक वापस नहीं करती है, तो वह विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है. राज्यसभा की सिफारिशों को स्वीकार करना या न करना पूरी तरह लोकसभा की इच्छा पर निर्भर करता है.

धन विधेयक से संबंधित प्रमुख प्रावधान (अनुच्छेद 110):

किसी विधेयक को धन विधेयक तब माना जाता है जब उसमें निम्नलिखित में से कोई विषय शामिल हो:

  1. किसी कर का अधिरोपण, उत्सादन, परिहार या परिवर्तन.
  2. भारत सरकार द्वारा धन उधार लेने या कोई प्रत्याभूति देने का विनियमन.
  3. भारत की संचित निधि या आकस्मिकता निधि की अभिरक्षा, उसमें धन जमा करना या निकालना.
  4. भारत की संचित निधि में से धन का विनियोग करना.

संसद के विभिन्न प्रस्ताव व चर्चाएँ

  • तारांकित प्रश्न (Starred Questions): जिन प्रश्नों का उत्तर सदस्य सदन में तुरंत (मौखिक रूप से) चाहता है, उनके शीर्ष पर स्टार (*) लगा दिया जाता है. इनके बाद पूरक प्रश्न भी पूछे जा सकते हैं.
  • अतारांकित प्रश्न: जिन प्रश्नों के लिखित उत्तर की आवश्यकता होती है, उन्हें अतारांकित प्रश्न कहा जाता है. इनमें पूरक प्रश्न पूछने का अवसर नहीं मिलता.
  • शून्य काल (Zero Hour): संसद के दोनों सदनों में प्रश्न काल के तुरंत बाद (दोपहर 12 बजे से) एक घंटे का समय 'शून्य काल' कहलाता है. इसमें बिना पूर्व सूचना के सार्वजनिक महत्व के मामले उठाए जाते हैं. यह व्यवस्था वर्ष 1962 से भारतीय संसदीय प्रणाली की अपनी देन है.
  • आधे घंटे की चर्चा: जब किसी पर्याप्त लोक महत्व के मामले में तथ्य स्पष्ट करना आवश्यक हो, तब लोकसभा में सप्ताह में तीन दिन (सोมवार, बुधवार, शुक्रवार) शाम 5:00 से 5:30 बजे के बीच यह चर्चा की जाती है.

शीर्ष लोकसभा सीटों वाले 5 राज्य (तालिका)

स्थान / क्रम राज्य का नाम लोकसभा सीटों की संख्या
पहला उत्तर प्रदेश 80
दूसरा महाराष्ट्र 48
तीसरा पश्चिम बंगाल 42
चौथा बिहार 40
पांचवां तमिलनाडु 39

विशेष नोट: संघ शासित राज्यों में सर्वाधिक 7 सीटों के साथ दिल्ली शीर्ष पर है. उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जातियों (SC) के लिए सर्वाधिक 17 सीटें आरक्षित हैं.

भारत का महान्यायवादी (Attorney General - अनुच्छेद 76)

  • संविधान के अनुच्छेद 76 में भारत के महान्यायवादी के पद का उल्लेख है, जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति करता है. वर्तमान में भारत के महान्यायवादी के रूप में श्री आर. वेंकटरमणी कार्यरत हैं.
  • महान्यायवादी को संसद के किसी भी सदन या उसकी समिति में बोलने तथा कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार है, परंतु वह मत नहीं दे सकता. उसे भारत के राज्यक्षेत्र के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है.
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