महाजनपद काल, मगध उत्कर्ष व मौर्य साम्राज्य
Table of Contents
Key Points
- छठी शताब्दी ई.पू. के 16 महाजनपदों की सूची बौद्ध ग्रंथ 'अंगुत्तर निकाय' तथा जैन ग्रंथ 'भगवती सूत्र' से प्राप्त होती है.
- हर्यक वंश के शासक बिम्बिसार को जैन साहित्य में 'श्रेणिक' कहा गया है, जिसने राजगृह को अपनी राजधानी बनाया था.
- अजातशत्रु का उपनाम 'कुणिक' था और उसने वज्जी संघ के विरुद्ध 'महाशिलाकण्टक' तथा 'रथमूसल' जैसे नवीन हथियारों का प्रयोग किया था.
- यूनानी शासक सिकन्दर ने 326 ई.पू. में भारत पर आक्रमण किया तथा झेलम के ऐतिहासिक युद्ध में राजा पोरस को पराजित किया.
- सम्राट अशोक के अभिलेखों को सर्वप्रथम 1837 ई. में जेम्स प्रिंसेप द्वारा पढ़ा गया तथा कलिंंग विजय का उल्लेख उसके 13वें शिलालेख में है.
- मौर्य काल में सरकारी कृषि भूमि को 'सीता भूमि' कहा जाता था और भूमिकर सामान्यतः कुल उपज का 1/6 भाग लिया जाता था.
- मेगास्थनीज ने तत्कालीन भारतीय समाज को सात श्रेणियों (दार्शनिक, किसान, अहीर, कारीगर, सैनिक, निरीक्षक व सभासद) में वर्गीकृत किया है.
भाग 1: महाजनपदों का उदय एवं मगध का उत्कर्ष
छठी शताब्दी ई.पू. में भारतवर्ष 16 महाजनपदों में बंटा हुआ था, जिसकी जानकारी बौद्ध ग्रंथ 'अंगुत्तर निकाय' एवं जैन ग्रंथ 'भगवती सूत्र' से मिलती है। मगध, वत्स, कौशल एवं अवन्ति सर्वाधिक शक्तिशाली जनपद थे। अस्मक एकमात्र ऐसा जनपद था जो दक्षिण भारत (नर्मदा गोदावरी नदी क्षेत्र) में स्थित था।
1. 16 महाजनपद एवं उनकी राजधानियाँ
| महाजनपद | प्रमुख शासक | राजधानी | वर्तमान स्थान |
|---|---|---|---|
| अंग | ब्रह्मदत्त | चंपा | भागलपुर, मुंगेर (बिहार) |
| काशी | अजातशत्रु | वाराणसी | इलाहाबाद के आसपास |
| कौशल | प्रसेनजित | श्रावस्ती / साकेत | अवध (उत्तर प्रदेश) |
| वत्स | उदयन | कौशाम्बी | इलाहाबाद के आसपास |
| मगध | बिम्बिसार, अजातशत्रु | गिरिव्रज / राजगृह | पटना, गया (बिहार) |
| अवन्ति | चण्ड प्रद्योत | उत्तरी अवन्ति-उज्जयनी, दक्षिणी अवन्ति-महिष्मती | पश्चिमी मध्य प्रदेश |
| मत्स्य | - | विराटनगर | जयपुर (राजस्थान), भरतपुर |
| गांधार | - | तक्षशिला | कश्मीर एवं पाकिस्तान (शिक्षा केंद्र) |
2. मगध साम्राज्य के प्रमुख राजवंश
- हर्यक वंश (बिम्बिसार — 545 ई.पू.) — बिम्बिसार ने हर्यक वंश की स्थापना कर राजगृह को राजधानी बनाया। इसे जैन साहित्य में 'श्रेणिक' कहा गया है। इसने अवन्ति के राजा चण्ड प्रद्योत के पाण्डु रोग से ग्रसित होने पर अपने राजवैद्य जीवक को उनकी सेवा में भेजा था।
- अजातशत्रु (कुणिक) — इसने अपने पिता बिम्बिसार की हत्या की, इसलिए इसे 'पितृहन्ता' कहा जाता है। इसने वैशाली के विरुद्ध 'महाशिलाकण्टक' तथा 'रथमूसल' नामक नए अस्त्रों का प्रयोग किया। इसके सुयोग्य मन्त्री का नाम वर्षकार (वस्सकार) था।
- उदयन — इसने 'गार्गी संहिता' एवं 'वायु पुराण' के अनुसार गंगा और सोन नदियों के संगम पर 'पाटलिपुत्र' नगर की स्थापना की।
- शिशुनाग वंश (412 ई.पू.) — शिशुनाग ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र से बदलकर 'वैशाली' में स्थापित की। इसके उत्तराधिकारी कालाशोक के समय द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ।
- नन्द वंश (344 ई.पू.) — संस्थापक महापद्मनन्द (एक शूद्र शासक) थे, जिन्होंने 'एकराट' एवं 'एक्छत्र' की उपाधि धारण की। पुराणों में इन्हें 'सर्वक्षत्रान्तक' (क्षत्रियों का नाश करने वाला) कहा गया है। इस वंश का अन्तिम शासक धनानन्द था, जो सिकन्दर का समकालीन था। ग्रीक लेखकों ने इसे 'अग्रमीज' एवं 'जैन्द्रमीज' कहा।
भाग 2: प्राचीन विदेशी आक्रमण
- ईरानी आक्रमण — भारत पर प्रथम विदेशी आक्रमण ईरान के ऐखमेनेयिन (हखमनी) साम्राज्य ने किया था। डेरियस (दारा प्रथम) ने 532-486 ई.पू. में भारत पर प्रथम सफल आक्रमण किया, जिसका प्रमाण बेहिस्तुन, पर्सिपोलिस एवं नक्शेरुस्तम अभिलेखों से मिलता है।
- यूनानी आक्रमण (सिकन्दर) — सिकन्दर 326 ई.पू. में बल्ख को जीतने के बाद हिन्दूकुश पर्वत पार कर भारत आया। उसने हाइडेस्पीज (झेलम) के युद्ध में भारतीय शासक पोरस को पराजित किया। सिकन्दर की सेना ने व्यास नदी को पार करने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद सिकन्दर 325 ई.पू. में वापस लौट गया। उसकी मृत्यु 323 ई.पू. में बेबीलोन में 33 वर्ष की अवस्था में हुई। उसके घोड़े का नाम 'बुकाफेला' था।
भाग 3: मौर्य साम्राज्य (322-198 ई.पू.)
चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने गुरु चाणक्य की सहायता से नन्द शासक 'धनानन्द' का वध करके मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। विशाखदत्त के नाटक 'मुद्राराक्षस' में चन्द्रगुप्त के लिए 'वृषल' तथा 'कुलहीन' शब्द का प्रयोग हुआ है।
1. प्रमुख मौर्य शासक
- चन्द्रगुप्त मौर्य — यूनानी लेखकों ने इसे 'सैण्ड्रोकोटस' या 'एण्ड्रोकोटस' कहा है। सेल्यूकस निकेटर के राजदूत मेगास्थनीज ने इसके दरबार में आकर 'इंडिका' नामक पुस्तक लिखी और पाटलिपुत्र को 'पालिब्रोधा' कहा। सेल्यूकस ने अपनी पुत्री हेलेना की शादी चन्द्रगुप्त से की थी।
- बिन्दुसार (298-272 ई.पू.) — इसे यूनानी लेखकों द्वारा 'अमित्रघात' या 'अमित्रोकेट्स' कहा गया। यह 'आजीवक सम्प्रदाय' का अनुयायी था। इसके शासनकाल में तक्षशिला में दो बार विद्रोह हुए, जिसका दमन करने के लिए पहले सुसीम और बाद में अशोक को भेजा गया। जैन ग्रंथों में इसे 'सिंहसेन' कहा गया है।
- अशोक महान (273-232 ई.पू.) — राजगद्दी पर बैठने के समय अशोक अवन्ति का राज्यपाल था। इसने अपने राज्याभिषेक के 8वें वर्ष (लगभग 261 ई.पू.) में कलिंंग पर आक्रमण किया और उसकी राजधानी 'तोसली' पर अधिकार कर लिया। उपगुप्त नामक बौद्ध भिक्षु ने अशोक को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी थी।
2. सम्राट अशोक के प्रमुख अभिलेख एवं शिलालेख
अशोक के अभिलेखों को सर्वप्रथम 1837 ई. में जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ा था। अशोक का नाम 'अशोक' मुख्य रूप से मास्की, नेत्तूर, गुर्जरा एवं उद्गोलम अभिलेखों में मिलता है।
| क्र.सं. | शिलालेख / स्तम्भ लेख | खोज वर्ष / लिपि | वर्णित विषय / मुख्य तथ्य |
|---|---|---|---|
| 1 | पहला शिलालेख | - | पशुबलि की निन्दा, समाज में उत्सव का निषेध। |
| 2 | दूसरा शिलालेख | - | लोक कल्याणकारी कार्य, चेर, चोल, पाण्ड्य व सत्तियपुत्र का उल्लेख। |
| 3 | पाँचवाँ शिलालेख | - | धर्म महामात्रों की नियुक्ति के संकेत। |
| 4 | तेरहवां शिलालेख | - | कलिंग युद्ध का वर्णन, पाँच यूनानी शासकों के नाम तथा आटविक राज्यों का उल्लेख। |
| 5 | शाहबाजगढ़ी व मानसेहरा | 1836, 1889 | खरोष्ठी लिपि में उत्कीर्ण शिलालेख। |
| 6 | रुम्मिन्देई स्तम्भ लेख | - | सबसे छोटा स्तम्भ लेख, लुम्बिनी यात्रा के दौरान भू-राजस्व दर घटाने की घोषणा (आर्थिक विषय)। |
| 7 | प्रयाग स्तम्भ लेख | - | कौशाम्बी से अकबर द्वारा इलाहाबाद लाया गया, इस पर अशोक की रानी कारुवाकी का उल्लेख है। |
3. मौर्यकालीन प्रशासन एवं प्रांतीय व्यवस्था
कौटिल्य के सप्तांग सिद्धांत के अनुसार राज्य के 7 अंग हैं— राजा, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दण्ड एवं मित्र। मौर्य साम्राज्य पाँच बड़े प्रांतों में विभाजित था जिन्हें 'चक्र' कहा जाता था:
| क्र.सं. | प्रांत / चक्र | राजधानी |
|---|---|---|
| 1 | उत्तरापथ | तक्षशिला |
| 2 | अवन्ति राष्ट्र | उज्जयिनी |
| 3 | दक्षिणापथ | सुवर्णगिरि (कर्नाटक) |
| 4 | कलिंग | तोसली |
| 5 | प्राची (मध्य देश) | पाटलिपुत्र |
- प्रशासनिक अधिकारी (तीर्थ) — अर्थशास्त्र में शीर्षस्थ अधिकारियों को 'तीर्थ' कहा गया है जिनकी संख्या 18 थी। पुरोहित (प्रधानमन्त्री), समाहर्ता (राजस्व विभाग का प्रधान), सन्निधाता (कोषाध्यक्ष), प्रदेष्टा (फौजदारी न्यायालय का न्यायाधीश/कंटकशोधन) प्रमुख थे।
- गुप्तचर व्यवस्था — एक स्थान पर रहकर कार्य करने वाले गुप्तचर को 'संस्था' तथा एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करने वाले को 'संचार' कहा जाता था। न्यायालय दो प्रकार के थे— धर्मस्थीय (दीवानी) एवं कण्टकशोधन (फौजदारी)।
- आर्थिक व्यवस्था — राज्य की आय का मुख्य स्रोत भूमिकर था जो उपज का 1/6 भाग होता था। सरकारी भूमि को सीता भूमि कहा जाता था। बिना वर्षा के अच्छी खेती होने वाली भूमि को अदेवमातृक कहा जाता था। प्रांतों से कर एकत्रित करने की जिम्मेदारी स्थानिक तथा गोप नामक अधिकारियों की होती थी।
- सामाजिक स्थिति — मेगास्थनीज ने भारतीय समाज को सात वर्गों में विभाजित किया है— 1. दार्शनिक, 2. किसान, 3. अहीर, 4. कारीगर, 5. सैनिक, 6. निरीक्षक एवं 7. सभासद। स्वतंत्र वेश्यावृत्ति अपनाने वाली महिला को रूपाजीवा कहा जाता था।