राठौड़ व कछवाहा वंश - मारवाड़, बीकानेर व जयपुर का इतिहास
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06 Jul 2026
Rajasthan GK
राजस्थान के प्रमुख राजपूत वंशों — मारवाड़ के राठौड़, बीकानेर के राठौड़, किशनगढ़ के राठौड़ तथा आमेर/जयपुर के कछवाहा वंश का सम्पूर्ण इतिहास। प्रमुख शासक, युद्ध, निर्माण कार्य एवं RPSC परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य।
Table of Contents
- राठौर/राठौड़ वंश — परिचय
- मारवाड़ के राठौर
- राव सीहा
- रावचूड़ा
- राव जोधा
- राव मालदेव
- राव चंद्रसेन
- राजा उदयसिंह
- सवाई राजा सूरसिंह
- राजा गजसिंह प्रथम
- महाराजा जसवंत सिंह प्रथम
- अजीत सिंह
- बीकानेर के राठौर
- राव बीका (संस्थापक)
- राव लुणकर्ण
- राव जैतसी
- राव कल्याणमल
- महाराज रायसिंह
- महाराजा कर्णसिंह
- महाराजा अनूपसिंह
- महाराजा सूरतसिंह
- बीकानेर के महत्वपूर्ण तथ्य
- किशनगढ़ के राठौड़
- कछवाहा वंश — परिचय
- दूलहराय (संस्थापक)
- कोकिलदेव
- भारमल या बिहारीमल
- भगवंत दास
- मानसिंह
- जयसिंह प्रथम या मिर्जा राजा जयसिंह
- महाराजा जयसिंह द्वितीय या सवाई जयसिंह
- सवाई ईश्वरीसिंह
- महाराजा सवाई माधोसिंह प्रथम
- सवाई प्रतापसिंह
- सवाई जगतसिंह द्वितीय
- महाराजा रामसिंह द्वितीय
Key Points
- मारवाड़ के राठौर वंश के संस्थापक राव सीहा थे — राव जोधा ने 12 मई, 1459 को जोधपुर नगर की स्थापना की
- राव मालदेव मारवाड़ का सबसे शक्तिशाली शासक था जिसने 52 युद्ध जीते — गिरी सुमेल युद्ध (1544 ई.) में शेरशाह सूरी ने इन्हें हराया
- बीकानेर के राठौर वंश के संस्थापक राव बीका ने 3 अप्रैल, 1488 ई. को बीकानेर नगर की स्थापना की
- महाराज रायसिंह ने 1594 ई. में जुनागढ़ किले का निर्माण पूर्ण करवाया — इतिहासकार ने इन्हें 'राजपूताने का कर्ण' कहा
- महाराजा गंगासिंह (बीकानेर) को 'आधुनिक भारत का भागीरथ' कहते हैं — 1927 ई. में गंगानहर लाए
- कछवाहा वंश के सवाई जयसिंह ने 18 नवम्बर, 1727 ई. को जयपुर नगर की स्थापना की — वेधशालाएँ जयपुर, दिल्ली, मथुरा, उज्जैन व बनारस में बनाईं
- रामसिंह द्वितीय ने 1876 ई. में प्रिंस ऑफ वेल्स की यात्रा पर जयपुर को गुलाबी रंग से रंगवाया
राठौर/राठौड़ वंश — परिचय
राठौरों ने राजस्थान के पश्चिमी भाग में शासन किया। राठौरों की दो प्रमुख शाखाएँ — मारवाड़ (राजस्थानी/जोधपुर) और बीकानेर अधिक प्रसिद्ध हुईं। राठौर की एक परवर्ती शाखा किशनगढ़ मुगल काल में स्थापित हुई।
मारवाड़ के राठौर
राव सीहा
- जोधपुर के राठौर वंश के संस्थापक
- जयचंद गहड़वाल (कन्नौज) का प्रपौत्र
- पाली के उत्तर-पश्चिम में एक छोटा-सा राज्य स्थापित किया
- 1273 ई. में मुसलमानों के विरुद्ध पाली प्रदेश की रक्षा करते हुए शहीद हुए
- 1291 ई. में जलालुद्दीन खिलजी से युद्ध करते हुए इनके उत्तराधिकारी मारे गए
- आस्थान के उत्तराधिकारी में धूहड़, रायपाल, कर्णपाल, जालणसी, छाड़ा, तीड़ा, मल्लीनाथ और रावचूड़ा प्रमुख हैं
रावचूड़ा
- राव वीरमदेव का पुत्र — मारवाड़ का प्रथम बड़ा शासक
- चूड़ा की पुत्री हंसाबाई का विवाह मेवाड़ के राणा लाखा के साथ हुआ था
- चूड़ा के पुत्र रणमल की हत्या मेवाड़ के सामंतों द्वारा धोखे से सन् 1438 ई. में चित्तौड़ में की गई
- नागौर के सूबेदार जल्लाल खाँ को हराकर नागौर के पास 'चूड़ासर' बसाया था
राव जोधा
- रणमल का पुत्र | मेवाड़ के अक्का सिसोदिया/अहाड़ा हिंगोला को हराकर मंडोर पर पुनः अधिकार किया
- 12 मई, 1459 को जोधपुर नगर की स्थापना कर अपनी राजधानी बनाई
- चिड़यावटूक पहाड़ी पर मेहरानगढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया
- जोधा के पाँचवें पुत्र बीका ने 1465 ई. में बीकानेर राज्य की स्थापना की
- राव जोधा ने राजतिलक की वागड़ी के ठाकुर की तलवार से अपने अंगूठे का चीरा लगाकर रक्त से किया
राव मालदेव
- राव गंगा का बड़ा पुत्र — मारवाड़ की ख्यात के अनुसार 52 युद्धों का विजेता
- 1542 ई. में पोहोवा व सांहोवा के युद्ध में बीकानेर के राव जैतसी को हराकर बीकानेर पर कब्जा किया
- मालदेव की पत्नी उमादे — जैसलमेर के राव लुणकर्ण की पुत्री, जिन्हें रूठीरानी भी कहा जाता था
- शेरशाह सूरी ने मालदेव के दो सेनापतियों जैता व कूम्पा को 5 जनवरी, 1544 ई. गिरी सुमेल के युद्ध में हराया
- शेरशाह ने कहा — "मैं मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिन्दुस्तान का बादशाहत खो देता"
- मृत्योपरांत 1545 ई. में मालदेव ने जोधपुर, पोखरण, कोठडा, जालौर, मेड़ता और आसपास के भागों पर अपना अधिकार कर लिया
राव चंद्रसेन
- राव मालदेव के मरणोपरांत मारवाड़ का शासक बना
- मुगल बादशाह अकबर के साम्राज्यवाद का सामना करना पड़ा
- राणा प्रताप का अग्रगामी, भूला बिसरा नायक कहा जाता है
- 1570 ई. में नागौर दरबार में अकबर से मिला लेकिन शीघ्र ही नागौर छोड़ दिया
- चंद्रसेन पहला राजपूत शासक था जिसने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की, मरते दम तक संघर्ष किया
- सोजत परगने में सारण के पास सचियाव नामक स्थान पर देहांत हुआ
राजा उदयसिंह
- राव चंद्रसेन का भाई | 'मोटा राजा' के नाम से भी जाना जाता है
- मारवाड़ के प्रथम शासक जिन्होंने अकबर की अधीनता स्वीकार की
- अपनी पुत्री जोधाबाई (जगत गुंसाई) उर्फ मानी बाई का विवाह शहजादे सलीम से किया
- जोधपुर की राजकुमारी होने के कारण इन्हें मानीबाई, जोधाबाई के रूप में प्रसिद्ध हुईं
- उदयसिंह के पुत्र किशनसिंह ने किशनगढ़ राज्य की स्थापना की
सवाई राजा सूरसिंह
- उदयसिंह की मृत्यु के पश्चात् 1595 ई. में पुत्र सूरसिंह जोधपुर के शासक बने
- मुगल सम्राट अकबर ने इन्हें 'सवाई राजा' की उपाधि दी
राजा गजसिंह प्रथम
- सूरसिंह के पश्चात् पुत्र गजसिंह प्रथम जोधपुर के शासक बने
- जहाँगीर ने इन्हें 'दलथंभन' की उपाधि और इनके घोड़ों को 'शाही दाग' से मुक्त किया
- गजसिंह प्रथम की मृत्यु 1638 ई. में आगरा में हुई
महाराजा जसवंत सिंह प्रथम
- गजसिंह के मरणोपरांत 1638 में बारह वर्षीय अल्पवयस्क पुत्र जसवंत सिंह प्रथम मारवाड़ का शासक बना
- शाहजहाँ ने जसवंत सिंह प्रथम को 'महाराजा' की उपाधि प्रदान की
- मुगलों की ओर से शिवाजी के विरुद्ध भी युद्ध में भाग लिया
- मुहणौत नैणसी इन्हीं की दरबारी था — 'नैणसी री ख्यात' व 'मारवाड़ रा परगना री विगत' पुस्तकें लिखीं
- मृत्यु: 1678 ई. में काबुल के पास जामरूद नामक स्थान पर
- औरंगजेब ने कहा — "आज कुफ्र (धर्म-विरोध) का दरवाजा टूट गया"
अजीत सिंह
- जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद औरंगजेब ने पुत्र अजीत सिंह को राजा नहीं बनाया और बंदी बना लिया
- वीर दुर्गादास राठौड़ ने औरंगजेब के चंगुल से मुक्त कराया
- 1679 ई. में औरंगजेब ने मारवाड़ पर चढ़ाई की — दुर्गादास ने मुगल सेना का बहादुरी से सामना किया
- 1681 ई. में राजसिंह ने मुगलों से संधि कर ली — राठौर अकेले पड़ गए लेकिन हार नहीं मानी
- 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के बाद अजीत सिंह ने मारवाड़ पर अधिकार कर लिया
- नए मुगल बादशाह बहादुर शाह ने 1708 में अजीत सिंह को जोधपुर का वैधानिक शासक स्वीकार किया
- इनके द्वारा निर्मित प्रमुख इमारतें: जसवंत सिंह का स्मारक (मंडोर), फतह महल (जोधपुर), एक थम्भा महल (एक प्रहरी मीनार) (जोधपुर), घनश्याम मंदिर (जोधपुर), मूलनायक मंदिर (जोधपुर)
- वर्ष 1724 ई. में जोधपुर में अजीत सिंह की हत्या कर दी गई
बीकानेर के राठौर
राव बीका (संस्थापक)
- राव जोधा का पुत्र | करणी माता के आशीर्वाद से 3 अप्रैल, 1488 ई. को नेरा जाड़े के सहयोग से बीकानेर नगर की स्थापना की
- इससे पूर्व यह स्थान रातीघाटी के नाम से जाना जाता था — इसलिए इसे 'रेत का शहर' भी कहा जाता है
- 1504 ई. में राव बीका की निधन के पश्चात् उनके बड़े पुत्र नारा बीकानेर के शासक बने किन्तु राज्याभिषेक के 1 वर्ष के भीतर ही मृत्यु हो गई
राव लुणकर्ण
- बड़े भाई राव नारा की मृत्यु के कारण राव लुणकर्ण राजा बना
- हिसार व सिरसा क्षेत्र के शासक पूसा को पराजित कर इस क्षेत्र पर अधिकार — यह क्षेत्र चाहड़वाला कहलाता है
- दानशीलता, धार्मिक, प्रजापालक व गुणीजनों का सम्मान करने वाला शासक
- दानशीलता के कारण बीठू सूजा के प्रसिद्ध ग्रंथ 'राव जैतसी रो छंद' में इसे 'कर्ण' अथवा 'कलियुग का कर्ण' कहा
- सन् 1526 ई. में नारनौल के नवाब पर आक्रमण किया किन्तु धाँसा नामक स्थान पर हुए युद्ध में लुणकर्ण वीरगति को प्राप्त हो गया
राव जैतसी
- राव लुणकर्ण के बाद बीकानेर का शासक बना
- बाबर के पुत्र कामरान ने 1534 ई. में भटनेर पर अधिकार करके राव जैतसी की अधीनता स्वीकार करने को कहा किन्तु जैतसी ने 26 अक्टूबर, 1534 को अचानक कामरान पर आक्रमण किया और उन्हें गढ़ छोड़ने के लिए बाध्य किया
- राव जैतसी को राव मालदेव (मारवाड़) के साथ पाहोबा के युद्ध (1542 ई.) में वीरगति प्राप्त हुई
राव कल्याणमल
- राव जैतसी के बाद बीकानेर का शासक बना
- 1544 ई. में गिरी सुमेल के युद्ध में शेरशाह सूरी ने बीकानेर के राव मालदेव को पराजित किया — इस युद्ध में कल्याणमल ने शेरशाह की सहायता की
- शेरशाह ने बीकानेर का राज्य कल्याणमल को दे दिया
- कल्याणमल ने 1570 ई. में नागौर दरबार में अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली और अपनी पुत्री का विवाह अकबर से किया
- कवि पृथ्वीराज राठौड़ (पीथल) कल्याणमल का ही पुत्र था — पृथ्वीराज राठौड़ की प्रसिद्ध रचना 'वेलि किसन रुकमणी री'
महाराज रायसिंह
- कल्याणमल का उत्तराधिकारी — दानशीलता के कारण प्रसिद्ध, इतिहासकार मुंशी देवीप्रसाद ने 'राजपूताने का कर्ण' कहा
- बीकानेर का शासक बनते ही 'महाराजाधिराज' और 'महाराज' की उपाधियाँ धारण कीं
- बीकानेर के राठौर नरेशों में रायसिंह पहला नरेश था जिसने इस प्रकार की उपाधियाँ धारण की थीं
- अपने जीवन तक मुगल सेवा करता रहा — अकबर का विश्वास पात्र बन गया
- राव देखरेख में राव मंत्री कर्मचंद द्वारा बनवाये गए पुराने (जूना) किले पर ही नये किले जुनागढ़ का निर्माण सन् 1594 ई. में पूर्ण करवाया
- किले के अन्दर रायसिंह ने एक प्रशस्ति लिखाई जिसे अब 'रायसिंह प्रशस्ति' कहते हैं
- 'रायसिंह महोत्सव' व 'ज्योतिप रत्नमाला' ग्रंथ की रचना की
महाराजा कर्णसिंह
- सूरसिंह के पुत्र — औरंगजेब ने 'जांगलेदेश बादशाह' की उपाधि दी
- विद्वानों के सहयोग से 'साहित्यकल्पद्रुम ग्रंथ' की रचना की
- 1644 ई. में बीकानेर के कर्णसिंह व नागौर के अमरसिंह राठौड़ के बीच 'मतीरा री राड़' नामक युद्ध हुआ
- आश्रित विद्वान गंगानगर मिथल ने 'कर्णभूषण एवं काव्यडाकिनी' नामक ग्रंथों की रचना की
- देशनोक (बीकानेर) में करणी माता के मंदिर का निर्माण करवाया
महाराजा अनूपसिंह
- एक प्रकाण्ड विद्वान, कूटनीतिज्ञ, विधानुरागी एवं संगीत प्रेमी
- अनेक संस्कृत ग्रंथों की रचना की — अनूपविवेक, काम-प्रबोध, अनूपोदय आदि
- संगीताचार्य भावभट्ट द्वारा रचित 'संगीत अनूपांकुश', 'अनूप संगीत रत्नाकर' आदि प्रमुख ग्रंथ
- इनके शासन काल को बीकानेरी चित्रकला का स्वर्णकाल माना जाता है
महाराजा सूरतसिंह
- 16 अप्रैल, 1805 को मंगलवार के दिन भाटियों को हराकर इन्होंने भटनेर को बीकानेर राज्य में मिला लिया और हनुमानगढ़ बार मंगलवार को यह जीत हासिल करने के कारण भटनेर का नाम हनुमानगढ़ रख दिया
- 1818 ई. में बीकानेर के राजा सूरतसिंह ने ईस्ट इंडिया कम्पनी से सुरक्षा संधि कर ली
बीकानेर के महत्वपूर्ण तथ्य
- 1857 की क्रांति के समय बीकानेर के महाराजा सरदार सिंह थे जो अंग्रेजों के पक्ष में क्रांतिकारियों का दमन करने के लिए राजस्थान के बाहर पंजाब तक गए
- बीकानेर के लालसिंह ऐसे व्यक्ति हुए जो स्वयं कभी राजा नहीं बने परन्तु जिनके पुत्र डूंगरसिंह के समय 1886 ई. में राजस्थान में सर्वप्रथम बीकानेर रियासत में बिजली का शुभारम्भ हुआ
- 1927 ई. में बीकानेर के महाराजा गंगासिंह (आधुनिक भारत का भागीरथ) राजस्थान में गंगानहर लेकर आए जिसका उद्घाटन वायसराय लॉर्ड इरविन ने किया
- महाराजा गंगासिंह को 1919 ई. के वर्साय शांति सम्मेलन (पेरिस) में एक पूर्ण सत्ता सम्पन्न प्रतिनिधि बनाया गया
- 1921 ई. में गठित नरेंद्र मंडल (चेम्बर ऑफ प्रिंसेज) के प्रथम चांसलर महाराजा गंगासिंह थे
- महाराजा गंगासिंह ने लंदन में आयोजित प्रथम गोलमेज सम्मेलन (1930 ई.) में भाग लिया था
- बीकानेर रियासत के अंतिम राजा शारदूल सिंह थे
किशनगढ़ के राठौड़
- राजस्थान में राठौड़ वंश का तीसरा राज्य किशनगढ़ था जिसकी स्थापना सन् 1609 में जोधपुर के शासक मोटाराजा उदयसिंह के पुत्र किशनसिंह ने की
- सम्राट जहाँगीर ने यहाँ के शासक को महाराजा का खिताब दिया
- महाराजा सावंतसिंह इस वंश के बहुत प्रसिद्ध राजा हुए — कृष्ण भक्ति में राज-पाट अपने पुत्र सरदारसिंह को छोड़कर वृंदावन चले गए एवं नागरीदास के नाम से प्रसिद्ध हुए
- किशनगढ़ चित्रशैली का प्रमुख चित्रकार निहालचन्द (मोरध्वज) था जिसने बणी-ठणी का चित्र बनाया
- जर्मन विद्वान एरिक डिक्सन ने बणी-ठणी को 'भारत की मोनालिसा' कहा है
कछवाहा वंश — परिचय
कछवाहा वंश राजस्थान के इतिहास का एक प्रमुख राजवंश है। कछवाहों की उत्पत्ति के संबंध में अनेक मत हैं। कछवाहों के मूल शासक कछप नामक जनजाति थे जिनका उन्होंने दमन किया और 'कछछपता', 'कछछपटा' व 'कछछपहन' उपाधि धारण किए जिसे ही साधारण बोलचाल में 'कछवाहा' कहा गया।
दूलहराय (संस्थापक)
- दूलहराय (तेजकरण) ढूढाड़ में कछवाह राज्य का संस्थापक
- नरवर (ग्वालियर) के शासक सोड़ासिंह का पुत्र | अति सुंदर होने के कारण नाम दूलहराय पड़ा
- 1137 ई. में बड़गूजर को हराकर नवीन ढूढाड़ राज्य की स्थापना की
- 1150 ई. में अम्बावती और आमेर बसाए
- दूलहराय ने मांची के मीणा सरदारों को हराया और मांची पर अधिकार कर लिया — मांची विजय के उपलक्ष्य में जमवा माता का मंदिर बनवाया
कोकिलदेव
- दूलहराय के पौत्र — 1207 ई. में मीणों से आमेर जीतकर अपनी राजधानी बनाया जो 1722 ई. तक कछवाह वंश की राजधानी रही
- राणा सांगा के शासनकाल में आमेर का राजा पृथ्वीराज था जो राणा सांगा के साथ बाबर से खानवा के युद्ध में लड़ा था
भारमल या बिहारीमल
- 1547 ई. में भारमल आमेर का शासक बना
- राजस्थान का प्रथम शासक जिसने अकबर की अधीनता स्वीकार की
- 1562 ई. में अपनी पुत्री हरखबाई उर्फ मानमती अथवा शाही बाई (मरियम उज्जमानी) का विवाह अकबर से किया
- मुगल बादशाह अकबर ने हरखबाई को 1570 ई. में नागौर दरबार का आयोजन किया
- अकबर ने भारमल को 'राजा व अमीर-उल-उमरा' की उपाधि प्रदान की
भगवंत दास
- भारमल के बाद पुत्र भगवंत दास या भगवान दास आमेर का शासक बना
- इनकी पुत्री मानबाई (मनभावनी) का विवाह शहजादे सलीम (जहाँगीर) से किया — मानबाई को सुल्तान निस्सा की उपाधि प्राप्त थी
- खुसरो मानबाई का पुत्र था जिसने औरंगजेब के शासनकाल में विद्रोह किया
मानसिंह
- भगवंत दास का दत्तक पुत्र | आमेर के कछवाहा शासकों में सर्वाधिक प्रतापी एवं महान् राजा
- मानसिंह ने 52 वर्ष तक मुगलों की सेवा की
- 1573 ई. में अकबर के दूत के रूप में राणा प्रताप से मिला था
- 1576 ई. में हल्दीघाटी युद्ध में उसने शाही सेना का नेतृत्व किया था
- अकबर ने उसे फर्जन्द (पुत्र) एवं राजा की उपाधि प्रदान की
- मानसिंह ने बंगाल में अकबर नगर तथा बिहार में मानपुर नगर का निर्माण किया
- शिलादेवी (आमेर), जगत शिरोमणी (आमेर), गोविन्द देवजी (वृंदावन) मंदिर उसी ने बनवाए थे
जयसिंह प्रथम या मिर्जा राजा जयसिंह
- मानसिंह के बाद पुत्र भाव सिंह आमेर की गद्दी पर बैठा किन्तु निस्संतान होने के कारण उनके बाद मान सिंह का दूसरा पुत्र जयसिंह 11 वर्ष की अवस्था में मेवाड़ की गद्दी पर बैठा
- तीन मुगल बादशाहों जहाँगीर, शाहजहाँ व औरंगजेब को अपनी सेवाएँ दीं
- औरंगजेब की तरफ से शिवाजी के साथ पुरंदर की संधि (जून 1665 ई.) के नाम से प्रसिद्ध है
- शाहजहाँ ने उसे 'मिर्जा राजा' की उपाधि दी
- जयगढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया तथा यहाँ तोप बनाने का कारखाना स्थापित करवाया
महाराजा जयसिंह द्वितीय या सवाई जयसिंह
- विशन सिंह के बाद जयसिंह द्वितीय 12 वर्ष की अल्पायु में आमेर का शासक बना
- मूल नाम जयसिंह था परन्तु वाक्पटुता व चातुर्य से प्रभावित होकर औरंगजेब ने उन्हें अधिक योग्य 'सवाई' मानकर सवाई जयसिंह नाम दे दिया
- मारवाड़ के अजीतसिंह व मेवाड़ के अमरसिंह द्वितीय के साथ मिलकर मुगल शक्ति के विरुद्ध लड़ने की योजना (देवारी समझौता) बनाई
- मुगलों की विजय होने के उपलक्ष में बादशाह मुहम्मद शाह ने जयसिंह को 'राज राजेश्वर, श्री राजाधिराज सवाई' की उपाधि प्रदान की
- सवाई जयसिंह ने मेवाड़ के महाराणा अमरसिंह द्वितीय के साथ मिलकर 17 जुलाई, 1734 ई. में हुर्डा (भीलवाड़ा) में राजस्थान के राजपूत राजाओं का सम्मेलन आयोजित किया
- जयसिंह ने जयपुर, दिल्ली, बनारस, उज्जैन व मथुरा में वेधशालाएँ (ग्रह-नक्षत्र शालाएँ) स्थापित कीं — इनमें सबसे बड़ी वेधशाला जयपुर (जंतर-मंतर) है जो यूनेस्को की सूची में शामिल है
- 18 नवम्बर, 1727 ई. को जयपुर (नगर) की स्थापना की — प्रधान वास्तुकार बंगाली ब्राह्मण विद्याधर भट्टाचार्य था
- जयपुर शहर की स्थापना सिन्धु घाटी सभ्यता के नगरों की तर्ज पर की गई
- नाहरगढ़ दुर्ग (सुदर्शनगढ़) का निर्माण शुरू करवाया
- नाहरगढ़ दुर्ग में माधोसिंह द्वितीय ने एक जैसे नौ महल बनवाए
- चन्द्रमहल (सिटीपैलेस) एवं जलमहल का निर्माण करवाया
- 1740 ई. में अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन करवाया जिसका पुरोहित पुंडरिक रत्नाकर था
- मृत्यु: 1 सितम्बर, 1743 ई.
सवाई ईश्वरीसिंह
- महाराजा सवाई जयसिंह की मृत्यु के बाद बड़े पुत्र ईश्वरीसिंह ने राजकाज संभाला
- 1747 ई. में राजमहल (टोंक) स्थान पर हुए युद्ध में ईश्वरीसिंह की विजय हुई — जयपुर की त्रिपोलिया बाजार में एक ऊँची मीनार ईसरलाट (वर्तमान सरगासूली) का निर्माण करवाया
- भारी चौथ की माँग से परेशान होकर सवाई ईश्वरीसिंह ने आत्महत्या कर ली
महाराजा सवाई माधोसिंह प्रथम
- ईश्वरीसिंह की आत्महत्या के बाद 1750 ई. में माधोसिंह जयपुर की गद्दी पर बैठा
- मराठा सरदार मल्हर राव होल्कर ने भारी चौथ की माँग की, जो न चुकाने पर जयपुर में नागरिकों ने विद्रोह किया
- मुगल बादशाह अहमदशाह एवं जाट महाराजा सूरजमल (भरतपुर) एवं अवध नवाब सफदरजंग से सहायता माँगी
- बादशाह ने परिणामस्वरूप रणथम्भौर किला माधोसिंह को दे दिया
- 1763 ई. में इन्होंने सवाई माधोपुर नगर बसाया
- 1768 ई. में मृत्यु | इन्होंने मोती डूंगरी पर महलों का निर्माण करवाया | चाकस में शीतलामाता का मंदिर बनवाया
सवाई प्रतापसिंह
- महाराजा पृथ्वीसिंह की मृत्यु के बाद छोटे भाई प्रतापसिंह ने 1778 ई. में जयपुर का शासन संभाला
- 1799 ई. में हवा महल का निर्माण करवाया
- इनके दरबार में 22 प्रसिद्ध संगीतज्ञों की 'गंधर्व बाईसी' थी
- इन्होंने जयपुर में एक संगीत सम्मेलन करवाकर राधागोविंद संगीत सार ग्रंथ की रचना करवाई
सवाई जगतसिंह द्वितीय
- सवाई जगतसिंह ने राजकुमारी कृष्णा कुमारी को लेकर (1807 ई. में) जोधपुर की सेना को गिंगोली (नागौर) में हराया
- सन् 1818 ई. में मराठा आतंक से मुक्ति हेतु कम्पनी से संधि कर ली
महाराजा रामसिंह द्वितीय
- रामसिंह द्वितीय के नाबालिग होने के कारण यहाँ ब्रिटिश संरक्षण स्थापित हुआ
- 1843 ई. में प्रशासक जिन लुडलों ने जयपुर में सतीप्रथा, दासप्रथा, बहेड़ा प्रथा और कन्या वध पर प्रत्येक रोक लगाई
- 1857 ई. के विद्रोह में सहायता के उपलक्ष्य में 'सितारे हिन्द' उपाधि दी गई
- 1870 ई. में लॉर्ड मेयो, 1875 ई. में लॉर्डनार्थ ब्रुक तथा 1876 ई. में प्रिंस ऑफ वेल्स अल्बर्ट ने जयपुर की यात्रा की — अल्बर्ट की यात्रा की स्मृति में जयपुर में अल्बर्ट हॉल (म्यूजियम) का शिलान्यास प्रिंस अल्बर्ट के हाथों करवाया गया
- जयपुर को रामसिंह द्वितीय के आदेश से गुलाबी रंग से रंगवाया गया
- रामसिंह द्वितीय ने जयपुर में कला संस्थान 'मदरसा हुनरी' (महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट) अथवा 'तस्वीरों रो कारखानों' की स्थापना करवाई
- 1869 ई. में महाराजा रामसिंह को वायसराय की विधान परिषद का सदस्य बनाया गया