राजस्थान कला एवं संस्कृति - 100+ महत्वपूर्ण तथ्य
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06 Jul 2026
Rajasthan GK
राजस्थान की कला, संस्कृति, मन्दिर, नृत्य, चित्रकला, आभूषण, लोकदेवता एवं अकादमियों से जुड़े 100 से अधिक महत्वपूर्ण तथ्य। RPSC RAS, RSMSSB, Patwar, SI, REET परीक्षाओं हेतु अति उपयोगी।
Table of Contents
- राजस्थान कला एवं संस्कृति - महत्वपूर्ण तथ्य
- जयपुर एवं अकादमियाँ
- आभानेरी एवं दौसा
- अलवर, भरतपुर एवं करौली
- टोंक एवं सवाई माधोपुर
- नागौर, पाली एवं जोधपुर
- कोटा, बूंदी एवं झालावाड़
- बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर एवं जालोर
- उदयपुर, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़ एवं डूंगरपुर
- राजसमन्द, माउंट आबू, सिरोही एवं अन्य
- नृत्य एवं संगीत
- मेले
- लोकदेवता एवं सम्प्रदाय
- चित्रकला
- आभूषण एवं वस्त्र
Key Points
- जयपुर को हस्तकलाओं का तीर्थ कहा जाता है।
- शेखावाटी क्षेत्र को ओपन आर्ट गैलरी के नाम से जाना जाता है।
- तेरहताली नृत्य का जन्म स्थान पादरला (पाली) है। नृत्यांगना मांगीबाई का सम्बन्ध यहाँ से है।
- शांति की प्रतिमा (स्टैच्यू ऑफ पीस) पाली जिले में स्थित है, जो अष्टधातु से निर्मित है।
- रणकपुर जैन मन्दिर 1444 खम्भों पर स्थित है, इसका निर्माण धरमक शाह द्वारा 15वीं शताब्दी में करवाया गया।
- बिना खम्भों का एशिया का सबसे बड़ा मन्दिर गोविन्द देव जी मन्दिर जयपुर में है।
- एकलिंग जी को मेवाड़ का राजा कहा जाता है।
- बम नृत्य अलवर और भरतपुर में फाल्गुन माह में किया जाता है।
- गोगाजी का जन्मस्थान ददरेवा (टोंक) था।
- बम नृत्य अलवर और भरतपुर में फाल्गुन माह में किया जाता है।
- फालना का स्वर्ण मन्दिर देश का प्रथम जैन स्वर्ण मन्दिर है।
- राजस्थान संस्कृत अकादमी की स्थापना 1980 में जयपुर में हुई। यहाँ से स्वरमाला पत्रिका प्रकाशित होती है।
- विश्व का सबसे बड़ा सती माता मन्दिर झुंझुनू जिले में है।
राजस्थान कला एवं संस्कृति - महत्वपूर्ण तथ्य
जयपुर एवं अकादमियाँ
- जयपुर को हस्तकलाओं का तीर्थ कहा जाता है।
- राजस्थान संस्कृत अकादमी की स्थापना 1980 में जयपुर में की गई। यहाँ से मासिक पत्रिका स्वरमाला प्रकाशित की जाती है।
- राजस्थान संगीत अकादमी जयपुर में स्थित है।
- राजस्थान उर्दू अकादमी, राजस्थान सिंधी अकादमी तथा राजस्थान ब्रजभाषा अकादमी जयपुर में स्थित हैं।
- अली बख्शी ख्याल खैरथल-तिजारा से सम्बन्धित है।
आभानेरी एवं दौसा
- आभानेरी आठवीं एवं नौवीं सदी की कलात्मक मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है।
- आभानेरी महोत्सव (दौसा) प्रतिवर्ष सितम्बर माह में आयोजित होता है।
- कलात्मक मिट्टी के बर्तन दौसा के प्रसिद्ध हैं।
- नाइयों की कुलदेवी नारायणी माता का मन्दिर राजगढ़ तहसील (दौसा) के बरबा डूंगरी की तलहटी में स्थित है।
- आभानेरी के मन्दिर स्थल से अर्धनारीश्वर की प्रतिमा प्राप्त हुई है।
- प्रसिद्ध महोदीपुर वालाजी मन्दिर दौसा जिले में स्थित है।
अलवर, भरतपुर एवं करौली
- अलवर क्षेत्र में भाग्य व्यवस्था प्रसिद्ध है।
- बम नृत्य अलवर और भरतपुर में प्रचलित है। (फाल्गुन माह में बमरसिया गानों के साथ)
- बूंदी में चिड़िया के राणा परिवार का ख्याल प्रसिद्ध है।
- बूंदी की मूर्तिभिन्न रामलीला प्रसिद्ध है।
- बूंदी में स्थित खेतड़ी महल को शेखावाटी का हवामहल भी कहते हैं।
- बूंदी का मण्डल ओपन आर्ट गैलरी भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध है।
- कैलादेवी मन्दिर (करौली) कालीसिल नदी के किनारे त्रिकूट पर्वत पर स्थित है।
- कैलादेवी मन्दिर (करौली) में देवी की आराधना के समय लांगुरिया नृत्य किया जाता है एवं लांगुरिया गीत गाए जाते हैं।
- मदन मोहन जी का मन्दिर (करौली) का सम्बन्ध गौड़ीय सम्प्रदाय से है।
- भरतपुर का नौटंकी लोकनाट्य प्रसिद्ध है।
- राजेश्वरी माता मन्दिर लोहागढ़ दुर्ग, भरतपुर में स्थित है। राजेश्वरी माता जाटों की कुलदेवी हैं।
टोंक एवं सवाई माधोपुर
- चन्दन की कलाकारी टोंक जिले की प्रसिद्ध है।
- टोंक कलाकार रंगस्थान के प्रसिद्ध कलाकार हैं।
- जगत्पिता के रूप में पूजे जाने वाले लोकदेवता गोगाजी का जन्मस्थान ददरेवा (टोंक) था।
- प्रसिद्ध गोगाजी मन्दिर/शीर्ष मेड़ी ददरेवा टोंक में स्थित है।
- मोहनदास द्वारा निर्मित सालासर बालाजी का प्रसिद्ध मन्दिर टोंक जिले में स्थित है।
- इच्छापूर्ण बालाजी मन्दिर सरदारशाह (टोंक) में स्थित है। इस मन्दिर में हनुमान जी की प्रतिमा राजा की तरह आशीर्वाद की मुद्रा में है।
- साहबा गुरुद्वारा जोगी आसन नामक स्थान पर टोंक में स्थित है। इसका निर्माण गुरु नानक तथा गुरु गोविन्द सिंह के आगमन व निवास की स्मृति में करवाया गया।
- मांडव कृष्ण की तपोस्थली मांडकला के 16 प्राचीन मन्दिर टोंक में स्थित हैं।
- घुम्मेश्वर महादेव का मन्दिर सिवाड़ ग्राम (सवाई माधोपुर) में स्थित है।
- तन्त्र विद्या के लिए जाना जाने वाला काला-गोरा भैरव मन्दिर सवाई माधोपुर शहर में स्थित है।
नागौर, पाली एवं जोधपुर
- किराडू का सोमेश्वर मन्दिर और आभानेरी का हर्षद माता मन्दिर गुर्जर-प्रतिहार शैली में बने हैं।
- पादरला (पाली) तेरहताली नृत्य का जन्म स्थान है। नृत्यांगना मांगीबाई का सम्बन्ध यहाँ से है।
- शांति की प्रतिमा (स्टैच्यू ऑफ पीस) पाली जिले में स्थित है। यह अष्टधातु से निर्मित है।
- पाली जिले में परशुराम गुप्ता में प्राकृतिक शिवलिंग है, जिसे राजस्थान का अमरनाथ कहा जाता है।
- मन्दिर स्थापत्य की मिश्रित शैली वेसर शैली कहलाती है।
- नाथद्वारा में श्रीनाथ जी की मूर्ति राजसिंह प्रथम ने स्थापित करवाई थी।
- श्रीनाथ जी को सात ध्वजा का नाथ स्वामी कहा जाता है।
- वल्लभ सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र करौली राजसमन्द में स्थित है।
- जोधपुर की चित्रकला की शुरुआत मालदेव के शासनकाल में हुई तथा इसका स्वर्णकाल मानसिंह के काल को माना जाता है।
- जमीला बानो जोधपुर की प्रसिद्ध मांड गायिका है।
- ओसियाँ 8वीं से 11वीं सदी के ब्राह्मण व जैन मन्दिरों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ सूर्य मन्दिर, हरिहर मन्दिर तथा सच्चाया माता के मन्दिर स्थित हैं।
- आई माता का मन्दिर जोधपुर ग्रामीण जिले में स्थित है।
- बिना खम्भों का एशिया का सबसे बड़ा मन्दिर गोविन्द देव जी मन्दिर जयपुर में है।
- कोलुमण्ड (फलोदी) पूजा स्थल का सम्बन्ध पाबूजी से है।
- हड्डूजी का प्रमुख पूजा स्थल बंगोटी फलोदी जिले में स्थित है।
कोटा, बूंदी एवं झालावाड़
- बड़े देवताजी की हवेली भित्ति चित्र कोटा में स्थित है।
- कोटा चित्र शैली का जन्म बूंदी शैली से हुआ है।
- बूंदी के महाराव उम्मेद सिंह के समय निर्मित रंगीन चित्रों की बुखारा को चित्रशाला कहा जाता है।
- बूंदी के सिसोल में पुरातात्विक शैल चित्र मिले हैं।
- बूंदी चित्र शैली भित्ति चित्रों का स्वर्ग कहलाती है। इस शैली में सर्वाधिक पशु-पक्षियों का चित्रण हुआ है।
- बूंदी का रंगमहल भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध है।
- वांसी युगारी (बूंदी) में तेजाजी का प्रसिद्ध मन्दिर स्थित है।
- सात सहेलियों का मन्दिर झालरापाटन में स्थित है। (कर्नल टॉड ने इसे चारभुजा मन्दिर भी कहा है)
- दर्शनी सदी का पद्मनाथ मन्दिर (सूर्य मन्दिर) झालरापाटन में स्थित है।
- झालरापाटन का मन्दिर खजुराहो मन्दिर शैली में बना है।
- ब्राह्मणी माता का मन्दिर (एकमात्र मन्दिर जहाँ देवी की पीठ की पूजा होती है) सोरसन बाराँ में स्थित है।
- बाराँ का काकुनी का मन्दिर 108 मन्दिरों का समूह है।
- बाराँ का भण्डवेरा मन्दिर या शिव मन्दिर 10वीं शताब्दी का प्राचीन मन्दिर है। इसे राजस्थान का मिनी खजुराहो और हाड़ौती का खजुराहो कहा जाता है।
- मामा-भांजा का मन्दिर/फूलदेवरा मन्दिर अटक (बाराँ) में स्थित है।
- कंसुआ का शिव मन्दिर कोटा में स्थित है। यहाँ आठवीं शताब्दी की कुटिल लिपि में शिवगण मौर्व का शिलालेख है।
- सम्पूर्ण भारत में विभाषणजी का एकमात्र मन्दिर कैथून (कोटा) में स्थित है।
- बीजासण माता का मन्दिर इन्द्रगढ़ (बूंदी) में स्थित है।
बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर एवं जालोर
- उत्पाद कहलाने वाले चित्रकारों ने बीकानेर में भित्ति चित्र बनाए हैं।
- रुकुनुद्दीन राजस्थानी चित्रकला की बीकानेर शैली से सम्बन्ध रखता था।
- चूहों का मन्दिर नाम से मशहूर करणी माता का मन्दिर बीकानेर में स्थित है।
- प्रसिद्ध अमर सागर जैन मन्दिर राजस्थान के जैसलमेर जिले में स्थित है।
- नागण्योरा माता का मन्दिर बाड़मेर के नागण्या में स्थित है। नागण्योरा माता राठौड़ वंश की कुलदेवी हैं।
- फालना का स्वर्ण मन्दिर देश का प्रथम जैन स्वर्ण मन्दिर है, जिसे गेटवे ऑफ गोडवाड़ एवं मिनी मुम्बई कहा जाता है।
- लोक देवता मल्लीनाथ जी का मन्दिर तिलवाड़ा (बालोतरा) में स्थित है।
- रेवारी जाति का आस्था स्थल खेड़ बालोतरा जिले में स्थित है।
- देवका सूर्य मन्दिर का निर्माण 12वीं-13वीं शताब्दी में देवका गाँव, बाड़मेर में किया गया।
- आशा पुरी मन्दिर (मोड़ा) जालोर के सोनगर चौहानों की कुलदेवी का मन्दिर है।
- जालोर में सुन्दा पहाड़ी पर चामुण्डा देवी का प्रख्यात मन्दिर है।
उदयपुर, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़ एवं डूंगरपुर
- राजस्थान का पहला शिल्पग्राम उदयपुर शहर के फतेहसागर झील के पास पहाड़ियों के बीच बसाया गया है।
- ब्रह्मदेव मन्दिर धुलेश्वर (उदयपुर) में स्थित है।
- एकलिंग जी का मन्दिर कैलाशपुरी (उदयपुर) में स्थित है। एकलिंग जी को मेवाड़ का राजा कहते हैं।
- सास-बहू का मन्दिर नगदा (उदयपुर) में स्थित है।
- मीरा मन्दिर चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित है।
- बडली माता मन्दिर निकुम्भ (चित्तौड़गढ़) में स्थित है।
- आवरी माता मन्दिर निकुम्भ (चित्तौड़गढ़) में स्थित है।
- गणेश जी के स्वरूप में मन्दाकिनी मन्दिर बिजोलिया (भीलवाड़ा) में स्थित है।
- गवरी बाई (बागड़ की मीरा) का मन्दिर डूंगरपुर में स्थित है।
- संत मावजी का मन्दिर डूंगरपुर के साबला गाँव में स्थित है। मावजी को भगवान विष्णु का कल्कि अवतार माना जाता है।
- गौतमेश्वर महादेव मन्दिर अरनोद, प्रतापगढ़ में स्थित है। इसे सर्वोत्कृष्ट एवं प्रतापगढ़ का हरिहर भी कहा जाता है।
- काका जी की दरगाह (प्रतापगढ़) का सम्बन्ध बोहरा मुस्लिम सम्प्रदाय से है। इसे सर्वोत्कृष्ट का ताजमहल कहा जाता है।
राजसमन्द, माउंट आबू, सिरोही एवं अन्य
- रणकपुर जैन मन्दिर यथाई नदी के तट पर है। इसका निर्माण धरमक शाह/धरणक शाह द्वारा 15वीं शताब्दी में करवाया गया था। यह भगवान आदिनाथ को समर्पित है। यह मन्दिर 1444 खम्भों पर स्थित है।
- कुशल माता का भव्य मन्दिर जिसका निर्माण महाराणा कुम्भा ने करवाया था, बदनोर (राजसमन्द) में स्थित है।
- जगत सिंह (पुत्र) की स्मृति में राजा मानसिंह ने आमेर में जगत शिरोमणि मन्दिर का निर्माण करवाया।
- जगत शिरोमणि मन्दिर/मीरा मन्दिर जयपुर में स्थित है। यह देश का एकमात्र मन्दिर है, जहाँ भगवान श्री कृष्ण के साथ मीरा भी विराजमान हैं।
- कछवाहा शासक दुर्लभराचार्य ने जमवायामाता मन्दिर का निर्माण जमवारामगढ़ (जयपुर) में करवाया था।
- जिलापी माता का मन्दिर बहरोड़ में स्थित है।
- तिजारा में भगवान चन्द्रमुनी का प्रसिद्ध जैन मन्दिर स्थित है।
- गुड्डाभुड्डा जोड़ सिखों का परम धार्मिक स्थल है।
- मौठे साहेब की दरगाह गागरोण (झालावाड़) में स्थित है।
- बूद्धादी सूर्य मन्दिर डीगोद (भरतपुर) में स्थित है।
- खाद्यस्थानी मन्दिर (सीकर) की नींव अजमेर के राजा अजीतसिंह के पुत्र अभयसिंह द्वारा डाली गई।
- विश्व का सबसे बड़ा सती माता मन्दिर झुंझुनू जिले में स्थित है।
- नरहड़ की दरगाह (हजरत शक्कर पीर बाबा की दरगाह) चिड़ावा (झुंझुनू) में स्थित है। इनको बांगड़ का ठणी कहते हैं।
- झुंझुनू के लोहारगल में सूर्यकुंड एवं मालकेतु मन्दिर स्थित है।
- खेतड़ी में दाढ़ी मूंड बाले राम-लक्ष्मण जी का मन्दिर स्थित है।
- रामकृष्ण मिशन का मठ खेतड़ी में स्थित है।
- अपनी गोपुरम आकृति के लिए प्रसिद्ध रंगनाथ मन्दिर का निर्माण सेठ पूराणमल ने 1844 ई. में करवाया था। यह पुष्कर में स्थित है।
- उज्जैन के राजा तथा महान योगी भर्तृहरि की तपोस्थली अलवर में स्थित है।
नृत्य एवं संगीत
- गवरी नृत्य झालावाड़ का प्रमुख नृत्य है जो मुख्य रूप से वर्षा ऋतु में किया जाता है।
- नाहर नृत्य होली के 13 दिन बाद शुरू होता है, जो माण्डल, भीलवाड़ा का प्रसिद्ध नृत्य है।
- बम नृत्य फाल्गुन माह में बमरसिया गानों के साथ किया जाता है।
- अंकन नामक कला संस्था का सम्बन्ध चित्रकारों से है।
मेले
- घोटिया अम्बा मेला को आदिवासियों का दूसरा कुम्भ कहा जाता है। यह बाँसवाड़ा का सबसे बड़ा मेला है।
लोकदेवता एवं सम्प्रदाय
- दाउदी बोहरा सम्प्रदाय की गद्दी गलियाकोट (झालावाड़) में स्थित है।
- गुर्जरों का तीर्थ स्थल आसीन्द भीलवाड़ा जिले में स्थित है।
- सीताबाई सहरिया जनजाति की कुम्भ कहलाती हैं।
चित्रकला
- राजस्थानी चित्रकला का प्रमुख केन्द्र भिन्डर (भीलवाड़ा) है।
- हवेलियों में किए गए भित्ति चित्रण के कारण शेखावाटी क्षेत्र ओपन आर्ट गैलरी के नाम से जाना जाता है।
- महानंदरा शैली का प्रचलन गुर्जर-प्रतिहार के शासनकाल में हुआ।
- अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध फड़ चित्रकला के क्षेत्र में भीलवाड़ा निवासी श्रीलाल जोशी को राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत किया जा चुका है।
आभूषण एवं वस्त्र
- मादलिया गले पर पहना जाता है।
- वल्लभ आभूषण हाथों में पहना जाता है।
- वृक्षपा नामक आभूषण हाथ पर पहना जाता है।
- दामणा नामक आभूषण अंगुली में पहना जाता है।
- चोप नामक आभूषण राजस्थान में नाक पर पहना जाता है।
- राजस्थान में बंगड़ी आभूषण हाथों में पहना जाता है।
- उंदी आभूषण कान पर पहना जाता है।
- राजस्थान में तनसुख, गदर, गावा एवं डोढी पुरुषों के वस्त्र हैं।