राजस्थान के प्रमुख राजपूत वंश - चौहान, भाटी, परमार, प्रतिहार
Table of Contents
- चौहान/चाहमान वंश — परिचय
- शाकम्भरी के चौहान
- शाकम्भरी के प्रमुख शासक — क्रम
- अजयराज
- अर्णोराज
- विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव)
- पृथ्वीराज तृतीय
- हाड़ौती के चौहान
- नाडौल के चौहान
- सिरोही के चौहान
- रणथम्भौर के चौहान
- जालौर के चौहान
- जैसलमेर का भाटी राजवंश
- करौली राज्य का यादव वंश
- सोलंकी/चालुक्य वंश
- पवार/परमार वंश
- आबू के परमार
- मालवा के परमार
- गुर्जर प्रतिहार वंश
- मण्डौर के प्रतिहार
- जालौर के प्रतिहार
- अन्य राजपूत राज्य
- भरतपुर
- कोटा
- अलवर
Key Points
- शाकम्भरी के चौहान वंश के संस्थापक वासुदेव (551 ई.) थे — पृथ्वीराज तृतीय ने 1191 ई. में तराइन प्रथम युद्ध में मुहम्मद गोरी को हराया, 1192 में दूसरे युद्ध में पराजित हुए
- विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) ने संस्कृत नाटक 'हरिकेली' लिखा — इनके काल को सपादलक्ष का स्वर्णयुग कहते हैं
- रणथम्भौर के हम्मीर चौहान की पत्नी रंगदेवी ने राजस्थान का प्रथम जौहर किया (1301 ई.
- जैसलमेर का भाटी राजवंश — भट्टी ने 285 ई. में भटनेर की स्थापना की, 1155 ई. में जैसलदेव ने जैसलमेर दुर्ग बनवाया
- मालवा के परमार भोज परमार सर्वश्रेष्ठ शासक थे — 'कविराज' कहलाते थे, 23 ग्रंथों की रचना की
- गुर्जर प्रतिहार वंश — नागभट्ट I ने 730 ई. में जालौर में स्थापना की, भोज I सर्वश्रेष्ठ शासक, वराह उपाधि धारण की
- किशनगढ़ चित्रशैली के प्रमुख चित्रकार निहालचन्द ने बणी-ठणी का चित्र बनाया जिसे जर्मन विद्वान एरिक डिक्सन ने 'भारत की मोनालिसा' कहा
चौहान/चाहमान वंश — परिचय
राजस्थान के इतिहास में चौहान वंश का अपना महत्वपूर्ण स्थान है। इस वंश का आदिपुरुष चाहमान नामक व्यक्ति था जिसके नाम पर इस वंश का नामकरण हुआ। चौहानों का मूल स्थान जांगलदेश में शाकम्भरी (सांभर) के आसपास सपादलक्ष माना जाता है। इनकी राजधानी अहिच्छत्रपुर (नागौर) थी। राजस्थान में प्रमुख चौहान शाखाएँ — शाकम्भरी, नागौर, जालौर, रणथम्भौर, निरोही, हाड़ौती की चौहान वंश प्रमुख हैं।
शाकम्भरी के चौहान
शाकम्भरी के चौहान वंश का संस्थापक वासुदेव को माना जाता है जिसने 551 ई. के आसपास यह राज्य स्थापित किया। वासुदेव ने सांभर झील का निर्माण करवाया।
इसी वंश के चंदनराज ने दिल्ली के तोमर शासक को पराजित किया था। चंदनराज की पत्नी रूद्राणी थी जो शिवभक्त थीं और अपने इष्ट देव महादेव के सम्मुख प्रतिदिन 1000 दीपक जलाती थीं।
शाकम्भरी के प्रमुख शासक — क्रम
वासुदेव के बाद जयराज, विग्रहराज प्रथम, चंदनराज, गोपेनद्राज, दुर्लभराज, गुवुक, चन्द्रराज द्वितीय, गुवुक द्वितीय, चन्द्रराज, वाक्पतिराज प्रथम, विंध्यराज, सिंहराज, विग्रहराज द्वितीय उत्तराधिकारी हुए।
अजयराज
- पृथ्वीराज प्रथम का पुत्र
- 1113 ई. में अजयमेरु (अजमेर) नगर बसाया और तारागढ़ नामक दुर्ग का निर्माण करवाया — इसे 'पूर्व का जिब्राल्टर' भी कहा जाता है
- इसी नगर को राजधानी बनाया
- अजयराज ने मालवा के शासक परमार चर्वमन को पराजित किया
- चाँदी व ताँबे के सिक्के जारी करवाए
- अजयराज ने अपना राज्य अपने पुत्र अर्णोराज को सौंपने के बाद अंतिम समय पुष्कर के वनों में बिताया
अर्णोराज
- अजयराज के बाद चौहान वंश का शासक बना
- तुर्क आक्रमणकारियों को बुरी तरह हराया और चौहान राज्य की सीमा का सिन्धु तथा सरस्वती नदी तक विस्तार किया
- अजमेर में आनासागर झील का निर्माण करवाया
- चालुक्य जयसिंह की पुत्री कंचन देवी से विवाह किया
- अर्णोराज शैव मतावलम्बी था — पुष्कर में वराह मंदिर का निर्माण करवाया
- अर्णोराज के समय देवबोध तथा धर्मघोष प्रमुख विद्वान थे
- अर्णोराज की हत्या उसके पुत्र जगदेव ने की थी
विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव)
- शाकम्भरी व अजमेर का महान चौहान शासक — इसका शासनकाल सपादलक्ष या स्वर्णयुग माना जाता है
- 1151 ई. में उसने दिल्लिका (दिल्ली) के तोमर शासक को हराकर अपने अधीन सामंत बना लिया
- तुर्कों के विरुद्ध युद्ध किए और कुछ हिन्दू राजाओं को गजनी राज्य से मुक्ति दिलाई
- उसने पाली, जालौर और नाडौल पर आक्रमण कर चालुक्यों से अपने पिता की हार का बदला लिया
- संस्कृत भाषा में 'हरिकेली' नामक नाटक की रचना की — यह नाटक अर्जुन और शिव के मध्य युद्ध का वर्णन है
- नरपति नाल्ह द्वारा रचित ग्रंथ 'बीसलदेव रासो' में रानी राजमती के कहने पर बीसलदेव द्वारा उड़ीसा के राजा से हीरे लाने के प्रसंग का सौन्दर्यात्मक वर्णन है — यह एक श्रेष्ठ शृंगार काव्य है
- समकालीन लोग इसे 'कवि बान्धव' नाम से पुकारते थे
- इन्होंने कण्ठाभरणम् की उपाधि भी धारण की
- विग्रहराज चतुर्थ के पश्चात् अपराजित्य तथा पृथ्वीराज द्वितीय और सोमेश्वर चौहान वंश के शासक बने
पृथ्वीराज तृतीय
- पृथ्वीराज प्रतापी राजा व श्रेष्ठ सेनानायक — 1177 ई. में 11 वर्ष की अवस्था में अजमेर के सिंहासन पर बैठे
- शासन संचालन उनकी माता कपूरी देवी के हाथ में था
- 1178 ई. में पृथ्वीराज तृतीय ने शासन सत्ता का पूर्णरूपेण संभाल लिया
- उन्होंने साम्राज्य का विस्तार करने के लिए सर्वप्रथम दो महत्वपूर्ण कार्य किए — पहला, नागार्जुन का अंत और दूसरा, भंडापकों का दमन
- महोबा के चंदेल शासक परिमर्दिदेव (परमाल) को हराया — इस युद्ध में परिमर्दिदेव के दो वीर सेनानायक आल्हा और ऊदल वीरगति को प्राप्त हुए
- जयचंद पृथ्वीराज तृतीय का मुख्य प्रतिद्वंद्वी था जिसकी पुत्री संयोगिता ने पिता की इच्छा के विरुद्ध स्वयंवर सभा में उनका वरण किया
- पृथ्वीराज तृतीय की सबसे बड़ी विजय 1191 ई. में तराइन के प्रथम युद्ध में मुहम्मद गोरी के विरुद्ध हुई — मुहम्मद गोरी घायल होकर जान बचाकर भागा
- 1192 ई. में तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज तृतीय की मुहम्मद गोरी से हार हुई और उनकी हत्या कर दी गई — इनकी मृत्यु के साथ ही शाकम्भरी चौहान वंश का अंत हो गया
- पृथ्वीराज तृतीय ने चन्दरबरदाई, जयनक, जनार्दन, विश्वरूप, गौड़ व गागेश्वर जैसे विद्वानों को आश्रय दिया
- इन्हें 'राय पिथौरा' भी कहा जाता है
- चन्दरबरदाई की रचना 'पृथ्वीराज रासो' — जिसे हिन्दी साहित्य का प्रथम महाकाव्य कहा जाता है
- जयनक द्वारा रचित संस्कृत काव्य कृति 'पृथ्वीराज विजय' में मिलती है
हाड़ौती के चौहान
कोटा और बूंदी के शासक चौहान जाति के हाड़ा उपजाति के थे। 1241 ई. में यहाँ हाड़ा चौहान देव ने मीणों को पराजित कर चौहान वंश का शासन स्थापित किया।
- देवसिंह शक्ति का उपासक था और उसने उपमर्दन में गंगेश्वरी (शक्ति का एक रूप) मंदिर की स्थापना की
- देव सिंह का पुत्र समर सिंह था — दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की सेनाओं के बंबावड़ा (मेवाड़) दुर्ग पर आक्रमण के समय रक्षा करते हुए समर सिंह मारे गए
- समर सिंह का उत्तराधिकारी नापूजी 1304 ई. में अलाउद्दीन खिलजी से लड़ता हुआ मारा गया
- इस वंश के अन्य शासक हल्लू, वीर सिंह और बांदा हुए — एक युद्ध में पराजय के बाद बांदा को भूड़ी की पहाड़ियों में शरण लेनी पड़ी जहाँ पर 1503 ई. में उसकी मृत्यु हो गई
नाडौल के चौहान
- चौहान वंश की नाडौल शाखा का संस्थापक लक्ष्मण था जिसने 960 ई. के लगभग चावड़ा राजपूतों के आधिपत्य से अपने आपको स्वतंत्र कर चौहान वंश का शासन स्थापित किया
- उसने नाडौल दुर्ग बनवाया — इस वंश के कल्हड़ ने पवित्र सोमेश्वर के मंदिर में स्वर्ण तोरण स्थापित करवाया
- नाडौल शाखा के कीर्तिपाल चौहान ने लगभग 1177 ई. में मेवाड़ शासक सामन्तसिंह को पराजित कर मेवाड़ को अपने अधीन कर लिया था
- लगभग 1205 ई. में नाडौल के चौहान जालौर की चौहान शाखा में मिल गए
सिरोही के चौहान
- सिरोही के शासक चौहान जाति की देवड़ा उपजाति के थे
- इस शाखा ने आदि दिरूख रहित ने आबू व चन्द्रावती पर अधिकार कर इस राज्य की स्थापना की — इनकी राजधानी चन्द्रावती थी
- बाद में बार-बार मुस्लिम आक्रमणों के कारण इस वंश ने 1425 ई. में सिरोही नगर की स्थापना कर अपनी राजधानी बनाई
- इस काल में महाराणा कुम्भा ने सिरोही को अपने अधीन कर लिया
- 1451 ई. में लाखा सिरोही का शासक बना — उसने 'कलिका माता मंदिर' और 'लाखेलाव तालाब' का निर्माण करवाया
- 1823 ई. में यहाँ के शासक शिवसिंह ने ईस्ट इंडिया कम्पनी से संधि कर राज्य की सुरक्षा का जिम्मा उसे सौंप दिया
- स्वतंत्रता के बाद सिरोही राज्य राजस्थान में जनवरी, 1950 में मिला दिया गया
रणथम्भौर के चौहान
- रणथम्भौर के चौहान वंश की स्थापना पृथ्वीराज तृतीय के पुत्र गोविन्द राज ने की थी
- गोविन्दराज के पश्चात् वाल्हण (वलनदेव), प्रह्लादन, वीरनारायण, नायभट्ट व जैत्रसिंह (जयसिम्हा) शासक बने
- रणथम्भौर के चौहान शासक हम्मीर ने 1282 ई. में उसने दिग्विजय के माध्यम से रणथम्भौर की सीमाओं का विस्तार किया
- हम्मीर ने 17 युद्ध लड़े जिनमें 16 में वह विजयी रहा
- 16 युद्धों में विजय के उपलक्ष में कोटियज्ञ का आयोजन किया
- 1291 ई. में जलालुद्दीन खिलजी के आक्रमण को विफल किया
- अलाउद्दीन के विद्रोही सेनानायक मुहम्मदशाह को शरण दी — अतः अलाउद्दीन ने रणथम्भौर पर 1301 ई. में आक्रमण किया
- हम्मीर लड़ता हुआ मारा गया और उसकी पत्नी रंगदेवी ने जौहर किया — यह राजस्थान के इतिहास का प्रथम जौहर है
- हम्मीर के सेनापति रणमल व रितपाल ने इस युद्ध में हम्मीर के साथ विश्वासघात किया
- रणथम्भौर के युद्ध में प्रसिद्ध इतिहासकार अमीर खुसरो भी उपस्थित था
जालौर के चौहान
- जालौर का प्राचीन नाम जबालीपुर था — यहाँ के शासक सोनगरा चौहान कहलाते थे
- जालौर के चौहान वंश का संस्थापक कीर्तिपाल (कीतु) को माना जाता है
- कीर्तिपाल के उत्तराधिकारियों में समरसिंह, उदयसिंह, चाचिगदेव, सामन्त सिंह एवं कान्हड़देव थे
- यहाँ के अंतिम शासक कान्हड़देव (1296-1312 ई.) — अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय 1312 ई. में अपने पुत्र वीरमदेव के साथ मारा गया
- 1312 ई. को अलाउद्दीन के आक्रमण के समय जालौर में साका हुआ
- धाय युलिवहिसत (अलाउद्दीन की पुत्री फीरोजा की धाय) ने कान्हड़देव के विरुद्ध जालौर आक्रमण का नेतृत्व किया था
- पद्मनाथ ने 'कान्हड़देव प्रबंध' की रचना की
जैसलमेर का भाटी राजवंश
- यदुवंशी बालद के पुत्र भट्टी ने 285 ई. में भटनेर (हनुमानगढ़) के किले का निर्माण कर वहाँ अपना राज्य स्थापित किया — इनके वंशज भाटी कहलाने लगे
- 1155 ई. में राव जैसलदेव भाटी ने जैसलमेर दुर्ग का निर्माण करवाया
- यहाँ के परवर्ती शासकों ने नागौर दरबार में मुगल अधीनता स्वीकार कर अपनी पुत्री का विवाह अकबर से 1570 ई. में किया
- यहाँ के अंतिम शासक जवाहर सिंह के काल में प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी सागरमल गोपा को जेल में अमानवीय यातनाएँ देकर 3 अप्रैल, 1946 को जलाकर मार दिया गया
- 30 मार्च, 1949 को जैसलमेर रियासत का राजस्थान में विलय हो गया
करौली राज्य का यादव वंश
- जैसलमेर के भाटियों की भाँति करौली के सरदार यादव राजपूत थे — इस वंश की स्थापना विजयपाल ने की
- 1040 ई. में विजयमंदिरगढ़ नगर बसाया और उसे अपनी राजधानी बनाया — बाद में इस दुर्ग का नाम बयाना पड़ गया
- विजयपाल का पुत्र तवनपाल इस वंश का बहुत योग्य शासक था — उसने तवनगढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया
- अर्जुनपाल इस वंश का सबसे महान शासक था — उसने 1348 ई. में कल्याणपुर (करौली नगर) बसाया और उसे अपनी राजधानी बनाया
- 15 नवम्बर, 1817 ई. में करौली नरेश हरबक्षपाल ने ब्रिटिश सरकार से अधीनस्थ मैत्री संधि कर ली
- स्वतंत्रता के बाद करौली रियासत मत्स्य संघ में मिल गई और अंततः राजस्थान का हिस्सा बनी
सोलंकी/चालुक्य वंश
- सोलंकी शासकों का मुख्य क्षेत्र गुजरात था लेकिन राजस्थान में सिरोही और जयपुर के अधिकांश क्षेत्रों पर भी बहुत समय तक इनका अधिकार रहा
- कुछ समय तक इनका शासन चित्तौड़ व उसके आस-पास के प्रदेश एवं बागड़ पर भी रहा
- सोलंकी शासक भीमदेव I (1022-64 ई.) के समय में विमल शाह वैश्य ने आबू पर दिलवाड़ा गाँव में आदिनाथ (ऋषभनाथ) का मंदिर 1031 ई. में बनवाया — यह मंदिर जैन शिल्पकला का बेजोड़ उदाहरण है
- सोलंकी शासक कुमारपाल (1153-72 ई.) के राजस्थान में मिलने वाले दानपत्र से उसकी उदारता का प्रमाण मिलता है
पवार/परमार वंश
इतिहास में परमारों की कई शाखाओं का उल्लेख मिलता है — दो महत्वपूर्ण शाखाएँ थीं — आबू के परमार एवं मालवा के परमार। परमारों की कुछ कम महत्वपूर्ण शाखाएँ जालौर के परमार, किराडू के परमार और बागड़ के परमार थीं।
आबू के परमार
- धूमराज को आबू के परमारों का आदिपुरुष माना जाता है
- परमारों की आबू शाखा की स्थापना उत्पलराज I ने की
- मुंज परमार ने 997 ई. में मेवाड़ के शासक गुहिल शक्ति कुमार को हराकर आहड़ तथा चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया
- आबू के सिंहराज परमार को 'परमारों के मरुमंडल का महाराजा' की सेना दी गई
- 1145 ई. के एक शिलालेख में इस वंश के यशस्वी शासक विक्रम सिंह के लिए 'महाविंडहुल्ल' उपाधि का प्रयोग किया गया है
- इस वंश के शासक प्रह्लादन देव ने अपने नाम से प्रह्लादनपुर (पालनपुर) नामक नगर बसाया
- 1311 ई. में सिरोही के शासक लुंबा ने चन्द्रावती (आबू) पर अधिकार कर लिया और इस प्रकार परमारों की आबू शाखा का समापन हो गया
मालवा के परमार
- सीजक II/श्री हर्ष (945-72 ई.) — मालवा के परमार वंश का प्रथम ऐतिहासिक शासक — उसे स्वतंत्र परमार राज्य का संस्थापक भी माना जाता है
- सीजक II के बाद वाक्पति II मुंज (973-96 ई.) मालवा का परमार शासक बना
- मुंज ने खुद 6 बार तैलप II को हराया लेकिन सातवीं बार में खुद हार गया और तैलप II के हाथों मारा गया
- भोज परमार इस वंश का सर्वाधिक लोकप्रिय व महान शासक था — उसने भोपाल के दक्षिण में भोजपुर नगर बसाया
- भोज ने धारानगरी का विस्तार किया और वहाँ भोजशाला नामक एक महाविद्यालय की स्थापना की जिसमें वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित की
- भोज 'कविराज' के नाम से प्रसिद्ध था — 23 पुस्तकों की रचना की जिनमें प्रमुख हैं — 'समरांगण सुत्रधार' (स्थापत्य शास्त्र पर), 'सरस्वती कंठाभरण', 'सिद्धान्त संग्रह', 'राज मार्तण्ड' (योग विद्या पर), 'आयुर्वेद सर्वस्व' आदि
- भोज के पुत्र जयसिंह के शासनकाल (1055-70 ई.) में परमारों की शक्ति कमजोर हो गई
- अंततः 1305 ई. में दिल्ली सल्तनत के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा को अपनी सल्तनत में मिला लिया
गुर्जर प्रतिहार वंश
प्रतिहार राज्य की स्थापना गुर्जर प्रदेश (गुजरात) में हुई थी, इसीलिए इस वंश का नाम 'गुर्जर प्रतिहार' पड़ा। इस वंश की 26 शाखाएँ थीं जिनमें — मण्डौर तथा जालौर (भीनमाल) शाखाएँ अधिक प्रसिद्ध हुईं।
मण्डौर के प्रतिहार
- मण्डौर शाखा प्रतिहारों की सबसे प्राचीन शाखा थी
- मण्डौर के प्रतिहार हरिचन्द्र तथा उनकी पत्नी भद्रा से अपने वंश की उत्पत्ति मानते हैं
- हरिश्चंद्र का काल छठी शताब्दी के आस-पास माना जाता है
- हरिश्चंद्र के पुत्र भोगभट्ट, कक्क, रज्जिल और दह ने मिलकर मण्डौर को जीत लिया
- नरभट्ट, नागभट्ट, शीलुक, कक्क, बाउक, कक्कुक इस वंश के प्रमुख शासक हुए
- मण्डौर की प्रतिहार शाखा ने लगभग 600 वर्षों तक शासन किया
जालौर के प्रतिहार
- जालौर की प्रतिहार शाखा की स्थापना नागभट्ट I नामक एक सामंत ने 730 ई. में की
- वत्सराज इस वंश का पहला शासक था जिसने 'समाट' की उपाधि धारण की
- वत्सराज ने ओसियाँ (जोधपुर से 66 किमी. उत्तर में स्थित) के महावीर जैन मंदिर का निर्माण करवाया — यह पश्चिमी भारत का प्राचीनतम जैन मंदिर है
- भोज I, मिहिरभोज — प्रतिहार वंश का सर्वश्रेष्ठ शासक था
- भोज I अपनी साहित्यिक अभिरुचि और वैष्णव धर्म के संरक्षण के लिए भी याद किया जाता है
- उनके कुछ सिक्कों में विष्णु के अवतार वराह के चित्र तथा 'आदि वराह' की उपाधि मिलती है
- प्रमुख शासक — महेन्द्रपाल I, महिपाल, विनायकपाल, महेन्द्रपाल II, देवपाल, महिपाल II, विजयपाल, राज्यपाल, त्रिलोचनपाल
- कन्नौज के गहड़वाल वंश के उद्भव होने पर चन्द्रदेव गहड़वाल ने 1093 ई. में कन्नौज पर अधिकार करके गुर्जर-प्रतिहार वंश का अंत कर दिया
अन्य राजपूत राज्य
भरतपुर
- राजस्थान के पूर्वी भाग — भरतपुर, धौलपुर, डीग आदि क्षेत्रों पर जाट वंश का शासन था
- यहाँ जाट शक्ति का उदय औरंगजेब के शासनकाल से हुआ
- औरंगजेब की मृत्यु के आसपास जाट सरदार चूड़ामन ने थून में किला बनाकर अपना राज्य स्थापित कर लिया
- चूड़ामन के बाद बदनसिंह यहाँ का शासक बना
- बदनसिंह के पुत्र सूरजमल ने सोंधार के निकट दुर्ग का निर्माण करवाया जो बाद में भरतपुर केशव दुर्ग के नाम से प्रसिद्ध हुआ
- सूरजमल ने डीग के महलों का निर्माण करवाया
- 1803 ई. में यहाँ के शासक रणजीत सिंह ने अंग्रेजों से सहायक संधि कर ली
- स्वतंत्रता के बाद भरतपुर मत्स्य संघ में विलय हो गया जो 1949 में राजस्थान में शामिल हो गया
कोटा
- कोटा पहले बूंदी रियासत का ही एक अंग था — यहाँ हाड़ा चौहानों का राज था
- शाहजहाँ के समय 1631 ई. में बूंदी नरेश राव रतनसिंह के बेटे माधोसिंह को कोटा का पृथक राज्य देकर उसे बूंदी से स्वतंत्र कर दिया गया — तभी से कोटा स्वतंत्र राज्य के रूप में अस्तित्व में आया
- कोटा पहले कोटिया भील के नियंत्रण में था, जिसके कारण उसका नाम कोटा पड़ा
- माधोसिंह का बाद उसका पुत्र यहाँ का शासक बना — वह औरंगजेब के विरुद्ध धर्मत के उत्तराधिकार युद्ध में मारा गया
अलवर
- 11वीं शताब्दी में अलवर का क्षेत्र (मेवात) अजमेर के चौहानों के अधीन था
- पृथ्वीराज चौहान की पराजय (1192 ई.) के बाद यह मेवाती क्षेत्र स्वतंत्र हो गए
- 1527 ई. में खानवा युद्ध के बाद यह क्षेत्र मुगल साम्राज्य का अंग बन गया
- 1775 ई. में प्रतापसिंह ने भरतपुर राज्य से अलवर छीनकर उसे अपनी राजधानी बनाया — तभी से यह अलवर राज्य बन गया
- 1857 की क्रांति के समय विनयसिंह अलवर का शासक था
- देश स्वतंत्र होने के बाद अलवर मत्स्य संघ में मिल गया जो मार्च, 1949 ई. में राजस्थान में शामिल हो गया