1857 की क्रांति में राजस्थान का योगदान
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Key Points
- राजस्थान में 1857 की क्रांति की शुरुआत 28 मई, 1857 को नसीराबाद छावनी से 15वीं नेटिव इन्फैंट्री द्वारा हुई।
- क्रांति के समय राजस्थान के ए.जी.जी. जॉर्ज पैट्रिक लारेंस थे और उनका मुख्य प्रशासनिक केंद्र अजमेर में था।
- राजपूताना की कुल 6 सैनिक छावनियों में से ब्यावर और खेरवाड़ा छावनियों ने इस विद्रोह में भाग नहीं लिया था।
- आऊवा के ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत ने एरिनपुरा के विद्रोही सैनिकों का नेतृत्व किया और अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी।
- कोटा में 15 अक्टूबर, 1857 को मेहराब खाँ और जयदयाल के नेतृत्व में हुए विद्रोह में पॉलिटिकल रेजीडेंट मेजर बर्टन का सिर काट दिया गया था।
- बीकानेर के महाराज सरदार सिंह राजपूताना के एकमात्र ऐसे शासक थे जो अपनी सेना लेकर अंग्रेजों की सहायतार्थ राज्य से बाहर (पंजाब) गए थे।
1857 की क्रांति के कारण
1857 का विद्रोह भारतीय इतिहास की एक प्रमुख घटना थी, जिससे राजस्थान की रियासतें भी गहराई से प्रभावित हुईं। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित थे:
- अंग्रेजों द्वारा आर्थिक शोषण: 1817-18 ई. की संधियों के बाद ब्रिटिश संरक्षण में आम नागरिकों का आर्थिक जीवन कष्टमय हो गया। पाश्चात्य विचारों को थोपने से जनता में असंतोष फैला।
- सामंत वर्ग में असंतोष: ब्रिटिश सेना के आ जाने से राजाओं की सामंतों पर निर्भरता समाप्त हो गई, जिससे सामंत महत्वहीन और प्रभावहीन हो गए।
- रियासतों में आंतरिक हस्तक्षेप: संधियों की शर्तों के विपरीत अंग्रेजों ने राज्यों के आंतरिक मामलों में दखल दिया। जैसे—जुलाई 1852 ई. में करौली के नि:संतान शासक नरसिंहपाल की मृत्यु पर करौली को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने का प्रयास (डैलहौजी की हड़प नीति)।
- शासक वर्ग में असंतोष: डूँगरपुर के शासक जसवंत सिंह को गद्दी से हटाकर प्रतापगढ़ के दलपत सिंह को वहाँ का शासक बना दिया गया, जो अंग्रेजों के हाथ की कठपुतली मात्र था।
- शक्ति क्षीण करने की नीति: अंग्रेजों ने शासकों और सामंतों के आपसी कलह का फायदा उठाकर दोनों पक्षों को कमजोर किया।
विद्रोह का प्रसार एवं राजपूताना की स्थिति
विद्रोह के समय राजस्थान के ए.जी.जी. (एजेंट टू गवर्नर जनरल) जॉर्ज पैट्रिक लारेंस थे, जिनका मुख्यालय अजमेर में था। विभिन्न रियासतों में नियुक्त ब्रिटिश पॉलिटिकल रेजीडेंट निम्नलिखित थे:
| रियासत | ब्रिटिश पॉलिटिकल रेजीडेंट (P.R.) |
|---|---|
| उदयपुर (मेवाड़) | कैप्टन सी.एल. शोवर्स |
| जयपुर | कैप्टन विलियम ईडन |
| जोधपुर (मारवाड़) | कैप्टन मैक मेसन |
| भरतपुर | मेजर निक्सन |
| कोटा | मेजर बर्टन |
राजस्थान की 6 सैनिक छावनियाँ और विद्रोह
विद्रोह के समय राजस्थान में कुल 6 सैनिक छावनियाँ थीं, जिनमें से 4 छावनियों के सैनिकों ने सक्रिय रूप से विद्रोह में भाग लिया (ब्यावर और खेरवाड़ा छावनियों ने भाग नहीं लिया):
- 1. नसीराबाद छावनी: राजस्थान में विद्रोह की शुरुआत यहीं से हुई। मेरठ के विद्रोह की खबर मिलते ही 28 मई, 1857 ई. को दोपहर 3 बजे 15वीं नेटिव इन्फैंट्री के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया।
- 2. नीमच छावनी: 3 जून, 1857 ई. को रात्रि 11 बजे यहाँ विद्रोह भड़का। विद्रोहियों ने छावनी को लूट लिया।
- 3. देवली छावनी: नीमच के विद्रोही सैनिक 7 जून, 1857 ई. को देवली पहुँचे और छावनी को लूटकर दिल्ली की ओर कूच कर गए।
- 4. एरिनपुरा छावनी व आऊवा का विद्रोह: 21 अगस्त, 1857 ई. को एरिनपुरा (जोधपुर) के सैनिकों ने विद्रोह कर 'चलो दिल्ली मारो फिरंगी' का नारा लगाया। मारवाड़ के बड़े ठिकाने आऊवा के ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत ने इनका नेतृत्व स्वीकार किया। आसोप, गूलर और आलनियावास के ठाकुर भी अपनी सेनाओं के साथ आ मिले। गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग के आदेश पर 20 जनवरी, 1858 ई. को नसीराबाद व पालनपुर की संयुक्त बड़ी सेना ने आऊवा पर आक्रमण कर इसे नष्ट कर दिया।
- 5. कोटा का विद्रोह: कोटा में 15 अक्टूबर, 1857 ई. को 'कोटा राज पलटन' ने मेहराब खाँ व जयदयाल के नेतृत्व में भारी विद्रोह किया। उन्होंने ब्रिटिश रेजीडेंट मेजर बर्टन, उनके दो पुत्रों और एक डॉक्टर (सर्जन् सेल्डर) की हत्या कर दी। कोटा लगभग साढ़े पाँच महीने तक स्वतंत्र रहा। अंततः 30 मार्च, 1858 ई. को जनरल राबर्ट्स के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने विद्रोह को दबाया।
अन्य महत्वपूर्ण घटनाएँ
- टोंक: टोंक से 600 मुजाहिद मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर की सहायतार्थ दिल्ली भेजे गए।
- धौलपुर: अक्टूबर, 1857 में राव रामचन्द्र व हीरा लाल के नेतृत्व में विद्रोहियों ने धौलपुर नरेश की तोपें छीनकर आगरा की ओर प्रस्थान किया।
- अजमेर: 9 अगस्त, 1857 को केन्द्रीय कारागृह में कैदियों ने विद्रोह किया।
- भरतपुर: 31 मई, 1857 को भरतपुर की सेना ने विद्रोह किया, जिससे मेजर मारीसन भरतपुर छोड़कर आगरा भाग गया।
विद्रोह में विभिन्न वर्गों की भूमिका एवं असफलता के कारण
आम जनता इस विद्रोह के प्रति अधिकांशतः उदासीन रही, जबकि जागीरदार/सामंत वर्ग (जैसे आऊवा के ठाकुर कुशाल सिंह, आसोप के ठाकुर बिशन सिंह आदि) ने विद्रोहियों का सक्रिय साथ दिया।
रियासती नरेशों की भूमिका: राजस्थान के राजाओं-नवाबों का रुख पूर्णतः ब्रिटिश समर्थक था। बीकानेर नरेश सरदार सिंह स्वयं अपनी सेना लेकर अंग्रेजों की सहायता के लिए पंजाब (हिसार व हांसी) तक गए। जयपुर नरेश ने अंग्रेजों को कोट कासिम का परगना दिया तथा मेवाड़ ने निम्बाहेड़ा में विद्रोहियों को दबाने में अंग्रेजों की मदद की।
असफलता के मुख्य कारण:
- रियासती शासकों का अंग्रेजों के प्रति झुकाव और दासवृत्ति का परिचय देना।
- मारवाड़, मेवाड़, जयपुर आदि राज्यों द्वारा तात्या टोपे को सहयोग न देना।
- विद्रोहियों के मध्य अखिल भारतीय संपर्क, संगठन एवं उचित रणनीति का अभाव।
क्रांति के परिणाम
विद्रोह भले ही असफल रहा, लेकिन इसने राष्ट्रीय चेतना के उदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1 नवम्बर, 1858 को इलाहाबाद दरबार में महारानी विक्टोरिया की घोषणा के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हो गया और भारत सीधे ब्रिटिश ताज (क्राउन) के अधीन आ गया। राजस्थान पर अब दोहरा अंकुश स्थापित हो गया—एक तरफ रियासती नरेश और दूसरी तरफ ब्रिटिश सरकार।
1857 की क्रांति के प्रमुख राजस्थानी शहीद
| शहीद का नाम | सम्बन्धित क्षेत्र / संक्षिप्त विवरण |
|---|---|
| नसीर मोहम्मद | कोटा सेना के अफसर, अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ते हुए कोटा किले पर वीरगति प्राप्त की। |
| हरदयाल भटनागर | कोटा रियासत के विद्रोही नेता, जनरल राबर्ट्स की सेना के विरुद्ध लड़ते हुए शहीद हुए। |
| हीरा सिंह | कोटा रियासत व ब्रिटिश सेना के विरुद्ध अनेक युद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त। |
| जयदयाल भटनागर | कोटा विद्रोह के मुख्य संगठनकर्ता, 1860 ई. में अंग्रेजों द्वारा फाँसी दी गई। |
| मेहराब खान | कोटा सेना में रिसालदार, अक्टूबर 1857 के विद्रोह के नेता, अंग्रेजों द्वारा बंदी बनाकर मृत्युदंड। |
| रोशन बेग | कोटा सेना के प्रमुख विद्रोही नेता, कैथूनीपोल युद्ध में जनरल राबर्ट्स के विरुद्ध लड़ते हुए वीरगति। |
| अकबर खान व कामदार खान | कोटा रियासत के विद्रोही सैनिक, युद्धों में वीरतापूर्वक लड़ते हुए शहीद हुए। |
| खंवास खान (उर्फ एवाज खान) | 15 अक्टूबर, 1857 को ब्रिटिश एजेंट के घर पर हमले का नेतृत्व किया; अंग्रेजों द्वारा फाँसी। |
| गुल मोहम्मद व अब्बास बेग मिर्जा | कोटा रियासत की सेना के कर्मचारी, अंग्रेजों के खिलाफ युद्धों में लड़ते हुए वीरगति पाई। |
| अलीम खान व हफीज-उन-उमर | टोंक के नवाब के विरुद्ध आक्रमण के संगठनकर्ता, अंग्रेजों से लड़ते हुए वीरगति पाई। |
| जिया लाल | निम्बाहेड़ा के मुख्य पटेल, कैप्टन शोवर्स का आदेश न मानने व विद्रोही सेना बनाने के कारण मृत्युदंड। |
| नवी शेर खाँ | कोटा रियासत के सिपाही, विद्रोहियों को अस्त्र-शस्त्र दिए, 1858 में तोप/गोली से उड़ाया गया। |
| भैरू सिंह जोधा | गेराओं के जागीरदार, आऊवा के युद्ध में लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की। |
| मुन्वर खान व हाफिज | टोंक रियासत के सिपाही, विद्रोही सेना के साथ मिलकर दिल्ली में लड़ते हुए शहीद हुए। |
| शक्तिदान ठाकुर | आऊवा युद्ध में विद्रोहियों का समर्थन करने के कारण कारावास के दौरान मृत्यु हुई। |
| सफदर यार खान | दिल्ली के मुगलकोट में कार्यरत, विद्रोहियों का सहयोग करने के कारण अंग्रेजों द्वारा फाँसी। |
| सरदार अली | कोटा सेना के सहायक सेनाधिकारी, 15 अक्टूबर 1857 के युद्ध में लड़ते हुए वीरगति प्राप्त। |
| हरनाथ सिंह ठाकुर | जनरल लारेंस के विरुद्ध आऊवा युद्ध में भाग लिया और वीरगति प्राप्त की। |