राजस्थान का इतिहास - प्रागैतिहासिक काल से गुप्त काल तक
Table of Contents
- परिचय — इतिहास के काल
- प्रागैतिहासिक राजस्थान (पाषाण काल)
- पूर्व पाषाण काल
- मध्य पाषाण काल
- उत्तर (नव) पाषाण काल
- राजस्थान में धातु काल
- ताम्र-पाषाण, ताम्र एवं ताम्र-कांस्य काल
- लौह काल
- राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएँ
- कालीबंगा सभ्यता
- आहड़ सभ्यता (बनास सभ्यता)
- गणेश्वर सभ्यता
- बालाथल सभ्यता
- बैराठ सभ्यता
- महाजनपद काल
- मौर्य काल
- गुप्त काल
- हूणों के आक्रमण
Key Points
- राजस्थान के इतिहास को तीन कालों में बाँटा गया है — प्राक् युग, आद्य युग और ऐतिहासिक युग
- कालीबंगा (हनुमानगढ़) — हड़प्पा सभ्यता का प्रमुख स्थल, खोज 1951 ई. में अमलानंद घोष ने की
- गणेश्वर सभ्यता (सीकर) — भारत की ताम्र सभ्यताओं की जननी, 2800 ईसा पूर्व की
- राजस्थान में तीन महाजनपद — शूरसेन, मत्स्य और कुरु
- मौर्य सम्राट अशोक के दो अभिलेख बैराठ (जयपुर) से प्राप्त हुए
परिचय — इतिहास के काल
मानव के सम्पूर्ण इतिहास को तीन कालों में विभक्त किया जाता है:
- प्राक् युग — सृष्टि के आरम्भ से हड़प्पा सभ्यता के काल तक
- आद्य युग — हड़प्पा सभ्यता के काल से 600 ई.पू. तक
- ऐतिहासिक युग — 600 ई.पू. से वर्तमान तक
प्रागैतिहासिक राजस्थान (पाषाण काल)
मानव सभ्यता के उद्भव के इस काल को पाषाण काल कहते हैं। इसे तीन भागों में बांटा गया है:
पूर्व पाषाण काल
राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में क्वार्टजाइट पत्थर के अनेक उपकरण मिले हैं। आज से लगभग डेढ़-दो लाख वर्ष पूर्व राजस्थान में एक मानव संस्कृति विद्यमान थी। 1870 ई. में सी.ए. हैकेट ने सर्वप्रथम जयपुर और इंद्रगढ़ से पत्थर से बनी पूर्व पाषाणकालीन हस्त कुठार (Hand-axe) खोज निकाली।
प्रमुख स्थल: अजमेर, अलवर, चित्तौड़, भीलवाड़ा, जयपुर, झालावाड़, जालौर, जोधपुर, पाली, टोंक आदि।
मध्य पाषाण काल
पश्चिम राजस्थान में लूनी और उसकी सहायक नदियों, चितौड़ की बेड़च नदी घाटी और विराटनगर से मध्य पाषाणकालीन उपकरण मिले हैं। इस काल के उपकरण छोटे, हल्के और कुशलता से निर्मित हैं।
उत्तर (नव) पाषाण काल
अजमेर, नागौर, सीकर, झुंझुनूं, जयपुर, उदयपुर, चित्तौड़, जोधपुर आदि स्थानों से उत्तर पाषाणकालीन सभ्यता के अनेक उपकरण प्राप्त हुए हैं।
राजस्थान में धातु काल
ताम्र-पाषाण, ताम्र एवं ताम्र-कांस्य काल
प्रमुख स्थल: गणेश्वर (सीकर), कालीबंगा (हनुमानगढ़), गिलूण्ड (राजसमंद), आहड़ व झाड़ौल (उदयपुर), कुराड़ा (नागौर), किराडोत व चीथवाड़ी (जयपुर), एलाना (जालौर), बूढ़ा पुष्कर (अजमेर), मलाह (भरतपुर) आदि।
लौह काल
ताम्र और कांस्य काल के पश्चात् लोहे का ज्ञान और उसका प्रयोग मानव इतिहास की युगान्तकारी घटना थी। राजस्थान में नोह (भरतपुर), जोधपुरा (जयपुर), सुनारी (झुंझुनूं), रैढ़ (टोंक) आदि स्थानों से लौह संस्कृति के समय के अनेक हथियार और उपकरण मिले हैं।
लौह काल के पश्चात् राजस्थान में सलेटी रंग की चित्रित मृद्भाण्ड संस्कृति (Painted Grey Ware-PGW) का उदय हुआ। अवशेष: विराटनगर व जोधपुरा (जयपुर), सुनारी, नोह आदि।
राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएँ
कालीबंगा सभ्यता
कालीबंगा का शाब्दिक अर्थ है — काले रंग की चूड़ियाँ। यह स्थल हनुमानगढ़ के निकट सरस्वती-दृषद्वती (घग्घर-चौतांग) नदियों के तट पर बसा था। सबसे पहले इस स्थल की खोज अमलानंद घोष ने 1951 ई. में की।
कालीबंगा से प्राप्त हड़प्पा सभ्यता के अवशेष:
- कुंड/हलरेखा (जुते हुए खेत) चूड़ियाँ (शंख, कांच व मिट्टी की बनी)
- अग्नि हवन कुंड, खाना पकाने का तंदूर
- कच्ची ईंटों से निर्मित घर
- धान्य कोठार, जौ के अवशेष
- वृषभ की ताम्र मूर्ति, कांसे का दर्पण
- बौस्ट्रोफेडन लिपि (Boustrophendon Script)
- मेसोपोटामिया (इराक) की एक बेलनाकार मुहर
आहड़ सभ्यता (बनास सभ्यता)
आहड़ उदयपुर के निकट बनास नदी की घाटी में स्थित था। आहड़ को ताम्रवती/ताम्बवती के नाम से भी जाना जाता था। आहड़ संस्कृति का काल 2100 ई.पू.-1500 ई.पू. माना जाता है।
प्रमुख केंद्र: आहड़, गिलूंद गिलूँड (सर्वप्रमुख केंद्र), बागोर, पलादिया आदि।
प्रमुख अवशेष: ताँबे के फलक, ताँबा पिघलाने का काम आनेवाला चूल्हा, लोहे के औजार, रिंगवेल, बांस के टुकड़े, हड्डियाँ, पत्थर से बनी वस्तुएँ, काले व लाल मृदभाण्ड, काँच तथा सीप की चूड़ियाँ, यूनानी मुद्राएँ।
गणेश्वर सभ्यता
गणेश्वर (नीम का थाना, सीकर) कांतली नदी के उद्गम पर स्थित ताम्रयुगीन सभ्यता का महत्वपूर्ण स्थल है। रतनचन्द्र अग्रवाल के निर्देशन में हुए उत्खनन से यहाँ 2800 ईसा पूर्व की सभ्यता के अवशेष मिले हैं।
यहाँ से प्राप्त ताँबे के उपकरणों व पात्रों में 99 प्रतिशत ताँबा है। गणेश्वर को भारत की ताम्र सभ्यताओं की जननी माना जाता है।
बालाथल सभ्यता
बालाथल (उदयपुर) में प्रो. वी.एन. मिश्र के निर्देशन में हुए उत्खनन से एक ताम्र पाषाणकालीन सभ्यता प्रकाश में आई। इस सभ्यता का सम्पर्क हड़प्पा से होने का पुख्ता प्रमाण प्राप्त होता है।
बैराठ सभ्यता
प्राचीन मत्स्य जनपद में स्थित बैराठ (जयपुर) की बीजक पहाड़ी, भीम की डूंगरी व महादेव जी की डूंगरी से हड़प्पा सभ्यता व मौर्यकाल के अवशेष प्राप्त हुए। यहाँ से एक गोल मंदिर व अशोक के स्तम्भ के अभिलेख प्राप्त हुए हैं।
महाजनपद काल
आर्य युगीन संस्कृति के बाद राजस्थान में जनपदों का उदय देखने को मिलता है। 16 महाजनपदों में से तीन जनपद राजस्थान में स्थित थे:
- शूरसेन जनपद — वर्तमान पूर्वी अलवर, धौलपुर, भरतपुर तथा करौली | राजधानी: मथुरा
- मत्स्य जनपद — अलवर का क्षेत्र तथा वर्तमान जयपुर | राजधानी: विराटनगर
- कुरु जनपद — वर्तमान उत्तरी अलवर | राजधानी: हस्तिनापुर/इन्द्रप्रस्थ/वर्तमान दिल्ली
मौर्य काल
राजस्थान में मौर्य सम्राट अशोक के दो अभिलेख बैराठ से प्राप्त हुए। इनमें विरल अभिलेख (बुद्ध, धम्म, संघ) महत्वपूर्ण हैं। कणसवा गांव (कोटा) अभिलेख (738 ई.) से ज्ञात होता है कि वह मौर्य शासक धवल का राज्य था।
मौर्यवंशी राजा विक्रमगोत्र मौर्य ने चित्तौड़गढ़ की स्थापना की। यवन शासक मिनाण्डर ने 150 ई.पू. में माध्यमिका (नगरी) को जीता था।
गुप्त काल
गुप्तों के उदय से पूर्व राजस्थान पर विदेशी शकों का शासन था। रुद्रदामन द्वितीय यहाँ का महाक्षत्रप था। समुद्रगुप्त ने रुद्रदामन द्वितीय को हराकर दक्षिणी राजस्थान को अपने साम्राज्य में मिलाया (351 ई. में)।
राजस्थान में गुप्तकाल की प्रतिमाएँ: अम्बेर, कल्याणपुर व जगत (उदयपुर), आम्बानेरी (जयपुर), मण्डोर, ओसियाँ (जोधपुर), नीलकंठ, सेंचली (अलवर) से प्राप्त हुई हैं।
हूणों के आक्रमण
हूण राजा तोरमाण ने 503 ई. में गुप्त राजाओं को हराकर राजस्थान में अपना राज्य स्थापित किया। तोरमाण के पुत्र मिहिरकुल ने छठी शताब्दी में बाड़ोली (चित्तौड़गढ़) में एक शिव मन्दिर का निर्माण करवाया था।