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प्रकाश की प्रकृति, परावर्तन, अपवर्तन, लेंस, दर्पण एवं मानव नेत्र दोष सम्पूर्ण सार नोट्स

2 min read 42 views 06 Jul 2026 General Science
प्रकाश की प्रकृति, परावर्तन-अपवर्तन के नियम, पूर्ण आंतरिक परावर्तन, वर्ण-विक्षेपण और ऑप्टिकल यंत्रों के सिद्धांतों का विस्तृत अध्ययन। भारतीय प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण टॉपिक।
Key Points
  • प्रकाश की गति निर्वात में 3×10⁸ मीटर/सेकंड होती है और यह विद्युत चुम्बकीय तरंग है
  • परावर्तन में आपतन कोण हमेशा परावर्तन कोण के बराबर होता है (∠i = ∠r)
  • पूर्ण आंतरिक परावर्तन तब होता है जब प्रकाश सघन से विरल माध्यम में जाती है और आपतन कोण क्रांतिक कोण से अधिक होता है
  • वर्ण-विक्षेपण में श्वेत प्रकाश सात रंगों में बंटती है - VIBGYOR क्रम में
  • दर्पण और लेंस के लिए मुख्य सूत्र हैं: 1/f = 1/u + 1/v (दर्पण) और 1/f = 1/v - 1/u (लेंस)
  • लेंस की क्षमता का मात्रक डायऑप्टर ($D$) है जो फोकस दूरी ($m$) का व्युत्क्रम होती है। उत्तल लेंस की क्षमता धनात्मक तथा अवतल लेंस की ऋणात्मक होती है।
  • निकट दृष्टि दोष (Myopia) में प्रतिबिंब रेटिना के आगे बनता है जिसे अवतल लेंस से ठीक करते हैं, जबकि दूर दृष्टि दोष (Hypermetropia) में प्रतिबिंब रेटिना के पीछे बनता है जिसे उत्तल लेंस से सुधारा जाता है।
  • प्रकाश एक विद्युत चुम्बकीय अनुप्रस्थ तरंग है जिसकी निर्वात में सर्वाधिक चाल $3 \times 10^8 \text{ m/s}$ होती है। इसकी प्रकृति तरंग और कण (फोटॉन) दोनों रूपों में होती है।
  • अपवर्तन के समय प्रकाश का वेग और तरंगदैर्घ्य बदल जाते हैं परंतु प्रकाश की आवृत्ति (Frequency) अपरिवर्तित रहती है। हीरे का अपवर्तनांक सर्वाधिक 2.42 होता है।

प्रकाश की प्रकृति (Nature of Light)

प्रकाश (Light) ऊर्जा का एक रूप है जो हमारी आँखों को संवेदित करके वस्तुओं को देखने में सहायता प्रदान करता है। आधुनिक भौतिकी के अनुसार, प्रकाश की द्वैत प्रकृति (Dual Nature) होती है, अर्थात् यह तरंग (Wave) और कण (Particle) दोनों के समान व्यवहार प्रदर्शित करता है।

  • यह एक विद्युत चुम्बकीय अनुप्रस्थ तरंग (Electromagnetic Transverse Wave) है, जिसके संचरण के लिए किसी भौतिक माध्यम की आवश्यकता नहीं होती।
  • निर्वात (Vacuum) में प्रकाश की चाल सर्वाधिक $$c = 3 \times 10^8 \text{ मीटर/सेकंड}$$ होती है। प्रकाश की चाल की गणना सर्वप्रथम रोमर ने की थी।
  • कण रूप में प्रकाश ऊर्जा के छोटे-छोटे पैकेटों के रूप में चलता है, जिन्हें फोटॉन (Photon) या क्वांटा कहते हैं।
  • मुख्य अभिलक्षण: प्रकाश हमेशा सरल रेखीय पथ (Straight Line Path) पर गमन करता है। यह परावर्तन, अपवर्तन, व्यतिकरण (Interference), विवर्तन (Diffraction), ध्रुवण (Polarization) तथा प्रकाश विद्युत प्रभाव (Photoelectric Effect) जैसी महत्वपूर्ण घटनाएं प्रदर्शित करता है।

परावर्तन (Reflection of Light)

जब प्रकाश की किरणें किसी उच्च कोटि के पॉलिश किए हुए चमकदार पृष्ठ (जैसे दर्पण) से टकराकर अपने ही पूर्व माध्यम में वापस लौट आती हैं, तो इस परिघटना को प्रकाश का परावर्तन कहते हैं।

परावर्तन के नियम (Laws of Reflection):

  1. प्रथम नियम: आपतित किरण (Incident Ray), परावर्तित किरण (Reflected Ray) तथा आपतन बिंदु पर खींचा गया अभिलंब (Normal) तीनों हमेशा एक ही समतल (Same Plane) में स्थित होते हैं।
  2. द्वितीय नियम: आपतन कोण ($\angle i$) का मान सदैव परावर्तन कोण ($\angle r$) के बराबर होता है।
    $$\mathbf{\angle i = \angle r}$$

परावर्तन के प्रकार:

  • नियमित परावर्तन (Regular Reflection): जब प्रकाश की समांतर किरणें किसी पूर्णतः समतल व चिकनी सतह से टकराती हैं, तो परावर्तन के पश्चात भी वे समांतर ही रहती हैं (जैसे समतल दर्पण से प्रतिबिंब बनना)।
  • अनियमित या विसरित परावर्तन (Diffused Reflection): जब प्रकाश किसी खुरदरे या असमान पृष्ठ पर आपतित होता है, तो परावर्तित किरणें विभिन्न दिशाओं में बिखर जाती हैं। इसी परावर्तन के कारण हमें दैनिक जीवन में अपने आस-पास की वस्तुएं दिखाई देती हैं।

अपवर्तन (Refraction of Light)

जब प्रकाश की किरण एक पारदर्शी माध्यम से दूसरे पारदर्शी माध्यम में प्रवेश करती है, तो दोनों माध्यमों के सीमा पृष्ठ पर वह अपने मूल पथ से आंशिक रूप से विचलित (Deviate) हो जाती है। इस परिघटना को प्रकाश का अपवर्तन कहते हैं।

  • जब प्रकाश की किरण विरल माध्यम (Rare Medium - जैसे हवा) से सघन माध्यम (Dense Medium - जैसे कांच) में प्रवेश करती है, तो यह अभिलंब की ओर झुक जाती है।
  • जब यह सघन माध्यम से विरल माध्यम में प्रवेश करती है, तो यह अभिलंब से दूर हट जाती है।
  • अपवर्तन का मुख्य कारण अलग-अलग माध्यमों में प्रकाश की चाल (Velocity) का भिन्न-भिन्न होना है। अपवर्तन के दौरान प्रकाश की आवृत्ति (Frequency) और कला (Phase) अपरिवर्तित रहते हैं, जबकि तरंगदैर्घ्य (Wavelength) और वेग बदल जाते हैं।

अपवर्तन के नियम (Laws of Refraction):

  1. आपतित किरण, अपवर्तित किरण तथा आपतन बिंदु पर अभिलंब तीनों एक ही समतल में होते हैं।
  2. स्नेल का नियम (Snell's Law): किन्हीं दो निश्चित माध्यमों और एक निश्चित रंग के प्रकाश के लिए, आपतन कोण की ज्या (sin) और अपवर्तन कोण की ज्या (sin) का अनुपात एक नियतांक होता है।
    $$\mathbf{\frac{\sin \theta_1}{\sin \theta_2} = \frac{n_2}{n_1} \implies n_1 \sin \theta_1 = n_2 \sin \theta_2}$$

अपवर्तनांक (Refractive Index - n):

किसी माध्यम का अपवर्तनांक यह दर्शाता है कि उस माध्यम में प्रकाश की चाल निर्वात की तुलना में कितने गुना कम है। यह एक मात्रकहीन और विमारहित नियतांक है।
$$\mathbf{n = \frac{c}{v}}$$ (जहाँ $c = $ निर्वात में प्रकाश की चाल, $v = $ माध्यम में प्रकाश की चाल)

माध्यम (Medium) निरपेक्ष अपवर्तनांक (Refractive Index - n) माध्यम की प्रकृति
निर्वात / हवा (Air) 1.00 (हवा के लिए 1.0003) सबसे विरल माध्यम
पानी (Water) 1.33 ($\frac{4}{3}$) सघन (हवा की तुलना में)
कांच (Glass) 1.50 ($\frac{3}{2}$) सघन
हीरा (Diamond) 2.42 सर्वाधिक प्रकाशीय सघनता (न्यूनतम वेग)

पूर्ण आंतरिक परावर्तन (Total Internal Reflection - TIR)

जब कोई प्रकाश की किरण सघन माध्यम से विरल माध्यम में प्रवेश करती है और उसका आपतन कोण ($\angle i$), दोनों माध्यमों के जोड़ों के लिए निर्धारित क्रांतिक कोण (Critical Angle - C) से अधिक हो जाता है, तो किरण विरल माध्यम में अपवर्तित होने के बजाय संपूर्ण रूप से परावर्तित होकर वापस सघन माध्यम में ही लौट आती है। इस परिघटना को पूर्ण आंतरिक परावर्तन कहते हैं।

अनिवार्य शर्तें (Conditions):

  1. प्रकाश की किरण अनिवार्य रूप से सघन माध्यम से विरल माध्यम की ओर जानी चाहिए।
  2. सघन माध्यम में आपतन कोण का मान क्रांतिक कोण से हमेशा अधिक ($\angle i > C$) होना चाहिए।

क्रांतिक कोण का सूत्र: $$\mathbf{\sin C = \frac{1}{n}}$$ (जहाँ $n$ सघन माध्यम का अपवर्तनांक है।)

महत्वपूर्ण व्यावहारिक अनुप्रयोग:

  • ऑप्टिकल फाइबर (Optical Fibre): यह पूर्ण आंतरिक परावर्तन के सिद्धांत पर कार्य करने वाली कांच या प्लास्टिक से बनी अत्यंत पतली नली होती है, जिसका उपयोग बिना ऊर्जा ह्रास के उच्च गति डेटा और दूरसंचार संकेतों (Telecommunication) को भेजने में तथा चिकित्सा में एंडोस्कोपी (Endoscopy) में किया जाता है।
  • मृगतृष्णा या मरीचिका (Mirage): गर्मियों के दिनों में मरुस्थल या डामर की सड़क पर जल होने का भ्रम होना।
  • हीरे का अत्यधिक चमकना: हीरे को इस प्रकार तराशा जाता है कि उसका क्रांतिक कोण बहुत कम ($24.4^\circ$) हो जाता है, जिससे अंदर प्रवेश करने वाला प्रकाश बार-बार पूर्ण आंतरिक परावर्तित होकर बाहर आता है।
  • पानी में परखनली का चमकीला दिखाई देना तथा जल में हवा के बुलबुले का चमकना।

वर्ण-विक्षेपण (Dispersion of Light)

जब सूर्य का श्वेत प्रकाश (White Light) किसी पारदर्शी प्रिज्म से होकर गुजरता है, तो वह अपने सात अवयवी रंगों की पट्टियों में विभक्त हो जाता है। प्रकाश की इस घटना को वर्ण-विक्षेपण कहते हैं और प्राप्त रंगों के समूह को स्पेक्ट्रम (Spectrum) कहा जाता है।

रंगों का निश्चित क्रम नीचे से ऊपर की ओर VIBGYOR होता है:

  • बैंगनी (Violet): इसका अपवर्तनांक और विचलन (Deviation) सर्वाधिक होता है, क्योंकि इसकी तरंगदैर्घ्य न्यूनतम होती है।
  • लाल (Red): इसका अपवर्तनांक और विचलन सबसे कम होता है, क्योंकि इसकी तरंगदैर्घ्य अधिकतम होती है। यही कारण है कि दूर तक स्पष्ट दिखने के कारण ट्रैफिक सिग्नल में लाल रंग का प्रयोग किया जाता है।

दर्पण (Mirrors)

1. समतल दर्पण (Plane Mirror):

  • इसकी फोकस दूरी अनंत ($\infty$) तथा क्षमता/शक्ति शून्य ($0$) होती है। इसका रेखीय आवर्धन (Magnification) हमेशा $+1$ होता है।
  • इसके द्वारा बना प्रतिबिंब हमेशा आभासी (Virtual), सीधा (Upright) तथा वस्तु के आकार के बराबर होता है।
  • प्रतिबिंब दर्पण के पीछे उतनी ही दूरी पर बनता है जितनी दूरी पर वस्तु आगे रखी होती है। वस्तु और प्रतिबिंब के बीच की सापेक्ष दूरी $= 2 \times $ दर्पण से वस्तु की दूरी होती है। इसमें पार्श्व परिवर्तन (Lateral Inversion) होता है (दायाँ भाग बायाँ दिखता है)।

2. गोलीय दर्पण (Spherical Mirrors):

दर्पण सूत्र: $$\mathbf{\frac{1}{f} = \frac{1}{u} + \frac{1}{v}}$$ रेखीय आवर्धन: $$\mathbf{m = -\frac{v}{u} = \frac{h'}{h}}$$ (जहाँ $f = $ फोकस दूरी, $u = $ दर्पण से वस्तु की दूरी, $v = $ प्रतिबिंब की दूरी, $h' = $ प्रतिबिंब की ऊंचाई, $h = $ वस्तु की ऊंचाई)

गोलीय दर्पण प्रकार चिन्ह परिपाटी व विशेषता प्रतिबिंब की प्रकृति मुख्य व्यावहारिक उपयोग
उत्तल दर्पण (Convex Mirror)
उभरा हुआ परावर्तक पृष्ठ
फोकस दूरी हमेशा धनात्मक ($+f$) होती है। यह किरणों को फैलाता है (अपसारी)। सदैव आभासी, सीधा और वस्तु से छोटा प्रतिबिंब बनाता है (चाहे वस्तु कहीं भी हो)। • वाहनों में पीछे का दृश्य देखने हेतु (Rear View Mirror) क्योंकि इसका दृष्टि-क्षेत्र (Field of View) बहुत बड़ा होता है।
• सोडियम स्ट्रीट लाइट के परावर्तक लैंप में।
अवतल दर्पण (Concave Mirror)
धंसा हुआ परावर्तक पृष्ठ
फोकस दूरी हमेशा ऋणात्मक ($-f$) होती है। यह किरणों को सिकोड़ता है (अभिसारी)। वस्तु की स्थिति के अनुसार वास्तविक व उल्टा (बड़ा, छोटा या बराबर) तथा विशेष स्थिति में (P और F के बीच) आभासी, सीधा व बड़ा • दाढ़ी/शेविंग बनाने वाले दर्पण में (चेहरे का बड़ा रूप देखने)।
• टॉर्च, सर्चलाइट तथा वाहनों की हेडलाइट (Headlights) में समांतर किरण पुंज प्राप्त करने।
• दंत चिकित्सकों (Dentists) द्वारा दांतों का बड़ा प्रतिबिंब देखने हेतु।
• सौर भट्टियों (Solar Cookers) में सूर्य के प्रकाश को केंद्रित करने।

लेंस (Lenses)

दो पृष्ठों से घिरा हुआ वह पारदर्शी माध्यम जिसका कम से कम एक पृष्ठ गोलीय हो, लेंस कहलाता है।
लेंस सूत्र (Lens Formula): $$\mathbf{\frac{1}{f} = \frac{1}{v} - \frac{1}{u}}$$
लेंस मेकर सूत्र (Lens Maker's Formula): $$\mathbf{\frac{1}{f} = (n - 1) \left(\frac{1}{R_1} - \frac{1}{R_2}\right)}$$
लेंस का आवर्धन (m): $$\mathbf{m = \frac{v}{u} = \frac{h'}{h}}$$

1. उत्तल लेंस (Convex / Converging Lens):

  • यह मध्य में से मोटा तथा किनारों से पतला होता है। इसकी फोकस दूरी हमेशा धनात्मक ($+f$) होती है।
  • यह प्रकाश की किरणों को एक बिंदु पर एकत्रित (अभिसरित) करता है। इसके द्वारा वास्तविक व आभासी दोनों प्रकार के प्रतिबिंब बन सकते हैं।
  • उपयोग: मानव नेत्र का लेंस, कैमरा, सूक्ष्मदर्शी (Microscope), दूरबीन (Telescope) तथा दूर-दृष्टि दोष के निवारण में।

2. अवतल लेंस (Concave / Diverging Lens):

  • यह मध्य में से पतला तथा किनारों से मोटा होता है। इसकी फोकस दूरी हमेशा ऋणात्मक ($-f$) होती है।
  • यह आने वाली समांतर प्रकाश किरणों को फैला (अपसरित कर) देता है। इसके द्वारा बना प्रतिबिंब हमेशा आभासी, सीधा तथा छोटा होता है।
  • उपयोग: गैलीलियो दूरबीन में, मायोपिया या निकट-दृष्टि दोष के निवारण हेतु चश्मों में।

लेंस की क्षमता / शक्ति (Power of Lens - P):

लेंस द्वारा प्रकाश किरणों को अभिसरण या अपसरण करने की मात्रा को लेंस की क्षमता कहते हैं। यह मीटर में मापी गई फोकस दूरी का व्युत्क्रम होती है।
$$\mathbf{P = \frac{1}{f \text{ (मीटर में)}}}$$ इसका एसआई (SI) मात्रक डायऑप्टर (Dioptre - D) होता है। उत्तल लेंस की क्षमता धनात्मक ($+D$) तथा अवतल लेंस की क्षमता ऋणात्मक ($-D$) होती है।

मानव नेत्र दोष एवं उनका निवारण (Human Eye Defects)

मानव नेत्र में समंजन क्षमता (Accommodation Power) कम होने या नेत्रगोलक के आकार में परिवर्तन के कारण मुख्य रूप से निम्नलिखित दृष्टि दोष उत्पन्न होते हैं:

दृष्टि दोष का प्रकार लक्षण व स्थिति उत्पन्न होने का मुख्य कारण निवारण / उपचार (Remedy)
निकट दृष्टि दोष
(Myopia)
पास की वस्तु स्पष्ट दिखाई देती है, परंतु दूर की वस्तु धुंधली दिखती है। प्रतिबिंब रेटिना के पहले (आगे) ही बन जाता है। • लेंस की वक्रता या मोटाई का बढ़ना (फोकस दूरी कम होना)।
नेत्रगोलक (Eye Ball) का लंबा हो जाना।
उचित फोकस दूरी का अवतल लेंस (Concave Lens) युक्त चश्मा।
दूर दृष्टि दोष
(Hypermetropia)
दूर की वस्तु स्पष्ट दिखाई देती है, परंतु पास की वस्तु धुंधली दिखती है। प्रतिबिंब रेटिना के पीछे बनता है। • लेंस का पतला होना (फोकस दूरी बढ़ना)।
नेत्रगोलक का छोटा या चपटा हो जाना।
उचित फोकस दूरी का उत्तल लेंस (Convex Lens) युक्त चश्मा।
जरा दृष्टि दोष
(Presbyopia)
वृद्धावस्था में होने वाला दोष, जिसमें व्यक्ति को निकट और दूर दोनों ही स्थानों की वस्तुएं स्पष्ट नहीं दिखाई देतीं। सैलियरी मांसपेशियों (Ciliary Muscles) की कमजोरी तथा नेत्र लेंस के लचीलेपन (Elasticity) में अत्यधिक कमी आना। द्विफोकसी लेंस (Bifocal Lens) का उपयोग, जिसमें ऊपरी भाग अवतल (दूर हेतु) तथा निचला भाग उत्तल (पास हेतु) होता है।
अबिन्दुकता
(Astigmatism)
एक ही दूरी पर स्थित क्षैतिज (Horizontal) और ऊर्ध्वाधर (Vertical) रेखाएं एक साथ स्पष्ट दिखाई नहीं देतीं। कॉर्निया (Cornea) की गोलाई या आकृति का असमान व अनियमित हो जाना। बेलनाकार लेंस (Cylindrical Lens) का प्रयोग।

महत्वपूर्ण सूत्र एवं परीक्षा उपयोगी नियतांक सारांश:

  • परावर्तन का नियम: $\angle i = \angle r$
  • स्नेल का नियम (अपवर्तन): $n_1 \sin \theta_1 = n_2 \sin \theta_2 \implies \frac{\sin i}{\sin r} = \frac{n_2}{n_1} = n_{21}$
  • निरपेक्ष अपवर्तनांक: $n = \frac{c}{v}$
  • पूर्ण आंतरिक परावर्तन (क्रांतिक कोण): $\sin C = \frac{1}{n}$
  • गोलीय दर्पण सूत्र: $\frac{1}{f} = \frac{1}{u} + \frac{1}{v}$ (गोलीय दर्पण की फोकस दूरी वक्रता त्रिज्या की आधी होती है: $f = \frac{R}{2}$)
  • गोलीय लेंस सूत्र: $\frac{1}{f} = \frac{1}{v} - \frac{1}{u}$
  • लेंस मेकर सूत्र: $\frac{1}{f} = (n-1)\left(\frac{1}{R_1} - \frac{1}{R_2}\right)$
  • रेखीय आवर्धन ($m$): दर्पण के लिए $m = -\frac{v}{u}$ ; लेंस के लिए $m = \frac{v}{u}$
  • लेंस की क्षमता: $P = \frac{1}{f \text{ (मीटर में)}} = \frac{100}{f \text{ (सेमी में)}}$ डायऑप्टर ($D$)
  • स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी (Near Point of Normal Eye) 25 सेंटीमीटर ($25\text{ cm}$) होती है तथा अधिकतम दूरी (Far Point) अनंत ($\infty$) होती है।
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