आनुवंशिकी (Genetics), DNA एवं RNA संरचना सम्पूर्ण सार नोट्स
Table of Contents
- आनुवंशिकता (Genetics) का परिचय
- मेंडल के आनुवंशिकता के नियम
- ग्रेगर जॉन मेंडल (1822-1884)
- मेंडल द्वारा मटर के पौधे को चुनने के कारण एवं विपरीत लक्षण:
- 1. मेंडल का प्रथम नियम - प्रभावशीलता का नियम (Law of Dominance)
- 2. मेंडल का द्वितीय नियम - पृथक्करण का नियम (Law of Segregation)
- 3. मेंडल का तृतीय नियम - स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment)
- मेंडलीय अनुपात
- गुणसूत्र संरचना (Chromosome Structure)
- गुणसूत्र की परिभाषा एवं खोज:
- गुणसूत्र के मुख्य भाग:
- सेंट्रोमीयर की स्थिति के आधार पर गुणसूत्रों के प्रकार:
- डीएनए (DNA) की मूल बातें
- डीएनए की संरचना (Watson and Crick Model):
- डीएनए के रासायनिक घटक (Chemical Components):
- चार्गाफ का नियम (Chargaff's Rule):
- आरएनए (RNA) की मूल बातें
- आरएनए की संरचना:
- आरएनए के कार्यात्मक प्रकार:
- DNA और RNA में तुलनात्मक अंतर:
- आनुवंशिकता की आधुनिक संकल्पनाएं
- परीक्षा की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण तथ्य:
Key Points
- मेंडल के तीन नियम: प्रभावशीलता, पृथक्करण और स्वतंत्र अपव्यूहन के नियम
- गुणसूत्र में सेंट्रोमीयर, क्रोमैटिड, टेलोमीयर और किनेटोकोर मुख्य भाग हैं
- DNA द्विसूत्रीय और RNA एकसूत्रीय न्यूक्लिक अम्ल है
- चार्गाफ के नियम के अनुसार A=T और G=C होता है
- mRNA, tRNA और rRNA आरएनए के तीन मुख्य प्रकार हैं
आनुवंशिकता (Genetics) का परिचय
आनुवंशिकी (Genetics) जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसके अंतर्गत लक्षणों के माता-पिता से संतति में पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानांतरण (आनुवंशिकता) तथा जीवों के मध्य उत्पन्न होने वाले अंतरों (विविधताओं) का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। यह जैविक विकास, जैव प्रौद्योगिकी और चिकित्सा विज्ञान का मुख्य आधार है। 'जेनेटिक्स' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग विलियम बेटसन (1906) ने किया था।
मेंडल के आनुवंशिकता के नियम
ग्रेगर जॉन मेंडल (1822-1884)
ऑस्ट्रियाई पादरी व वैज्ञानिक ग्रेगर जॉन मेंडल को 'आनुवंशिकता का जनक' (Father of Genetics) कहा जाता है। उन्होंने उद्यान मटर के पौधे (वैज्ञानिक नाम: Pisum sativum) पर लगातार 7 वर्षों तक संकरण के ऐतिहासिक प्रयोग किए और आनुवंशिकता के मूलभूत सिद्धांतों का प्रतिपादन किया, जिन्हें 'मेंडल के नियम' कहा जाता है।
मेंडल द्वारा मटर के पौधे को चुनने के कारण एवं विपरीत लक्षण:
मटर का पौधा एकवर्षीय, द्विलिंगी और आसानी से कृत्रिम पर-परागण के योग्य था। मेंडल ने अध्ययन के लिए मटर के 7 जोड़ी विपरीत (Contrasting) लक्षणों का चयन किया:
- पौधे की ऊंचाई: लंबा (Dominant - प्रभावी) / बौना (Recessive - अप्रभावी)
- फूल का रंग: बैंगनी (प्रभावी) / सफेद (अप्रभावी)
- फूल की स्थिति: अक्षीय (Axial - प्रभावी) / अंतिम (Terminal - अप्रभावी)
- बीज का आकार: गोल (Round - प्रभावी) / झुर्रीदार (Wrinkled - अप्रभावी)
- बीज का रंग: पीला (प्रभावी) / हरा (अप्रभावी)
- फली का आकार: फूला हुआ (प्रभावी) / सिकुड़ा हुआ (अप्रभावी)
- फली का रंग: हरा (प्रभावी) / पीला (अप्रभावी)
1. मेंडल का प्रथम नियम - प्रभावशीलता का नियम (Law of Dominance)
जब एक जोड़ी विपरीत लक्षणों वाले शुद्ध जनक पौधों (जैसे शुद्ध लंबा TT और शुद्ध बौना tt) के मध्य संकरण कराया जाता है, तो प्रथम पीढ़ी ($F_1$) में केवल वही लक्षण प्रकट होता है जो प्रभावी (Dominant) होता है। दूसरा लक्षण (अप्रभावी) उपस्थित होने के बावजूद छुप जाता है। $F_1$ पीढ़ी के सभी पौधे विषमयुग्मजी लंबे (Tt) होते हैं।
2. मेंडल का द्वितीय नियम - पृथक्करण का नियम (Law of Segregation)
इसे 'युग्मकों की शुद्धता का नियम' (Law of Purity of Gametes) भी कहते हैं। इस नियम के अनुसार, $F_1$ पीढ़ी के विषमयुग्मजी (Tt) पौधों में दोनों एलील एक साथ रहने के बावजूद एक-दूसरे को संदूषित नहीं करते। युग्मक निर्माण (Meiosis) के समय ये दोनों कारक पृथक-पृथक हो जाते हैं और प्रत्येक युग्मक में केवल एक ही कारक जाता है। यही कारण है कि द्वितीय पीढ़ी ($F_2$) में अप्रभावी लक्षण (बौनापन) पुनः शुद्ध रूप में प्रकट हो जाता है।
3. मेंडल का तृतीय नियम - स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment)
यह नियम द्विसंकर संकरण (Dihybrid Cross) पर आधारित है। जब दो या दो से अधिक जोड़ी विपरीत लक्षणों वाले पौधों के बीच संकरण कराया जाता है, तो किसी एक लक्षण की वंशागति का दूसरे लक्षण की वंशागति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। अर्थात्, बीजों के पीले रंग का पृथक्करण उनके गोल आकार के पृथक्करण से पूर्णतः स्वतंत्र होता है। इसके कारण $F_2$ पीढ़ी में नए आनुवंशिक संयोग बनते हैं।
मेंडलीय अनुपात
मेंडल के संकरण प्रयोगों के बाद प्राप्त संततियों के बाह्य स्वरूप (Phenotype) और आनुवंशिक संगठन (Genotype) के निश्चित गणितीय अनुपात निम्नलिखित हैं:
| संकरण का प्रकार | F₁ पीढ़ी का स्वरूप | F₂ पीढ़ी का लक्षणप्ररूपी अनुपात (Phenotype) | F₂ पीढ़ी का जीनप्ररूपी अनुपात (Genotype) |
|---|---|---|---|
| एक संकर संकरण (Monohybrid) एक जोड़ी लक्षणों का अध्ययन |
सभी पौधे प्रभावी (विषमयुग्मजी लंबे - Tt) | 3 : 1 (3 लंबे : 1 बौना) |
1 : 2 : 1 (1 शुद्ध लंबा : 2 अशुद्ध लंबे : 1 शुद्ध बौना) |
| द्विसंकर संकरण (Dihybrid) दो जोड़ी लक्षणों का अध्ययन |
सभी प्रभावी (पीले और गोल बीज) | 9 : 3 : 3 : 1 (9 पीले-गोल, 3 पीले-झुर्रीदार, 3 हरे-गोल, 1 हरा-झुर्रीदार) |
1:2:1:2:4:2:1:2:1 (नौ प्रकार के विशिष्ट जीनोटाइप) |
| परीक्षण संकरण (Test Cross) $F_1$ विषमयुग्मजी $\times$ शुद्ध अप्रभावी जनक |
- | 1 : 1 (एक संकर में) 1 : 1 : 1 : 1 (द्विसंकर में) |
लक्षणप्ररूप और जीनप्ररूप दोनों का अनुपात समान (1:1) होता है। |
गुणसूत्र संरचना (Chromosome Structure)
गुणसूत्र की परिभाषा एवं खोज:
गुणसूत्र (Chromosomes) जीवों की कोशिकाओं के केंद्रक (Nucleus) में पाए जाने वाले क्रोमेटिन धागों के संघनित रूप हैं, जो मुख्य रूप से आनुवंशिक पदार्थ DNA और हिस्टोन प्रोटीन से निर्मित होते हैं। ये जीनों के भौतिक वाहक हैं। गुणसूत्रों की खोज सर्वप्रथम स्ट्रासबर्गर (1875) ने की थी तथा इन्हें 'क्रौमोसोम' नाम वॉल्डेयर (1888) ने दिया था।
गुणसूत्र के मुख्य भाग:
- सेंट्रोमीयर (Centromere): यह गुणसूत्र का प्राथमिक संकीर्णन (Primary Constriction) भाग है, जो गुणसूत्र की दोनों भुजाओं को जोड़ता है। कोशिका विभाजन के समय तर्कु तंतु (Spindle Fibres) इसी भाग से जुड़ते हैं।
- क्रोमैटिड (Chromatid): मध्यावस्था (Metaphase) में प्रत्येक गुणसूत्र दो अनुदैर्ध्य समान भागों में बंटा दिखाई देता है, जिन्हें सिस्टर क्रोमेटिड्स कहते हैं।
- टेलोमीयर (Telomere): गुणसूत्र के दोनों शीर्ष या अंतिम सिरों को टेलोमीयर कहते हैं। ये गुणसूत्रों को आपस में चिपकने से रोकते हैं और इनकी स्थिरता बनाए रखते हैं।
- किनेटोकोर (Kinetochore): सेंट्रोमीयर की सतह पर स्थित एक डिस्क के आकार की प्रोटीन संरचना, जहाँ माइक्रोट्यूब्यूल्स आकर जुड़ते हैं।
सेंट्रोमीयर की स्थिति के आधार पर गुणसूत्रों के प्रकार:
- मेटासेंट्रिक (Metacentric): सेंट्रोमीयर गुणसूत्र के बिल्कुल मध्य में होता है, जिससे दोनों भुजाएं बराबर होती हैं। कोशिका विभाजन की एनाफेज अवस्था में यह 'V' आकार का दिखाई देता है।
- सबमेटासेंट्रिक (Sub-metacentric): सेंट्रोमीयर मध्य से थोड़ा हटकर होता है, जिससे एक भुजा थोड़ी छोटी और दूसरी बड़ी होती है। एनाफेज में यह 'L' या 'J' आकार का दिखता है।
- एक्रोसेंट्रिक (Acrocentric): सेंट्रोमीयर बिल्कुल सिरे के पास होता है, जिससे एक भुजा अत्यंत छोटी और दूसरी बहुत लंबी होती है। यह 'I' या छड़ के आकार का दिखता है।
- टेलोसेंट्रिक (Telocentric): सेंट्रोमीयर गुणसूत्र के बिल्कुल अंतिम शीर्ष पर स्थित होता है। इसमें केवल एक ही क्रियात्मक भुजा होती है।
डीएनए (DNA) की मूल बातें
डीएनए की संरचना (Watson and Crick Model):
डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल (DNA) अधिकांश सजीवों का मुख्य आनुवंशिक पदार्थ है, जो जैविक सूचनाओं को संचित और प्रेषित करता है। सन् 1953 में जेम्स वाटसन और फ्रांसिस क्रिक ने DNA का द्विकुंडलित मॉडल (Double Helix Model) प्रस्तुत किया, जिसके लिए उन्हें 1962 में नोबेल पुरस्कार मिला। यह मॉडल रोजालिंड फ्रैंकलिन के एक्स-रे विवर्तन (X-ray Diffraction) डेटा पर आधारित था।
डीएनए के रासायनिक घटक (Chemical Components):
DNA एक पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखला है। प्रत्येक न्यूक्लियोटाइड तीन घटकों से मिलकर बनता है:
- पेंटोज शर्करा: इसमें 5-कार्बन युक्त डीऑक्सीराइबोस (Deoxyribose) शर्करा पाई जाती है।
- फॉस्फेट समूह ($PO_4^{3-}$): यह न्यूक्लियोटाइड्स को आपस में फॉस्फोडाइइस्टर बंध (Phosphodiester Bond) द्वारा जोड़कर DNA की रीढ़ (Backbone) बनाता है।
- नाइट्रोजनी क्षार (Nitrogenous Bases): ये दो प्रकार के होते हैं:
• प्यूरिन (Purines): एडेनिन (A) और गुआनिन (G)
• पिरिमिडिन (Pyrimidines): साइटोसिन (C) और थाइमिन (T)
चार्गाफ का नियम (Chargaff's Rule):
इरविन चार्गाफ के अनुसार, किसी भी प्रजाति के डबल-स्ट्रेंडेड DNA में प्यूरिन की कुल मात्रा हमेशा पिरिमिडिन की कुल मात्रा के बराबर होती है।
• $[A] = [T]$ (एडेनिन हमेशा थाइमिन के साथ दो हाइड्रोजन बंध $A = T$ द्वारा जुड़ता है)
• $[G] = [C]$ (गुआनिन हमेशा साइटोसिन के साथ तीन हाइड्रोजन बंध $G \equiv C$ द्वारा जुड़ता है)
• अतः, $\frac{A+G}{T+C} = 1$
आरएनए (RNA) की मूल बातें
आरएनए की संरचना:
राइबोन्यूक्लिक अम्ल (RNA) सामान्यतः एकल सूत्रीय (Single-stranded) न्यूक्लिक अम्ल है। कुछ वायरसों (जैसे रीओवायरस) में यह आनुवंशिक पदार्थ होता है, परंतु मुख्य रूप से यह कोशिकाओं में प्रोटीन संश्लेषण (Protein Synthesis) का कार्य करता है। इसमें राइबोस शर्करा और थाइमिन के स्थान पर यूरैसिल (Uracil - U) नाइट्रोजनी क्षार पाया जाता है।
आरएनए के कार्यात्मक प्रकार:
- mRNA (Messenger RNA - संदेशवाहक): यह कुल कोशिकीय RNA का लगभग 3-5% होता है। यह DNA से आनुवंशिक कूट (Genetic Code) को लेकर राइबोसोम तक पहुँचता है, जहाँ प्रोटीन का निर्माण होना है।
- tRNA (Transfer RNA - स्थानांतरण): इसे विलेय (Soluble) RNA भी कहते हैं। यह कुल RNA का 15% होता है। इसका कार्य उपयुक्त अमीनो अम्लों को खोजकर प्रोटीन संश्लेषण स्थल (राइबोसोम) पर लाना है। इसकी संरचना क्लोवर-लीफ (Clover-leaf) जैसी होती है।
- rRNA (Ribosomal RNA): यह कोशिका में पाया जाने वाला सर्वाधिक प्रचुर (लगभग 80%) और स्थायी RNA है। यह राइबोसोम का संरचनात्मक घटक है और प्रोटीन संश्लेषण के दौरान उत्प्रेरक की भूमिका निभाता है।
DNA और RNA में तुलनात्मक अंतर:
| विशिष्ट विशेषता | डीएनए (DNA) | आरएनए (RNA) |
|---|---|---|
| सूत्र संख्या (Strands) | यह सामान्यतः द्विसूत्रीय (Double-stranded) सर्पिलाकार अणु है। | यह सामान्यतः एकल सूत्रीय (Single-stranded) रैखिक अणु है। |
| पेंटोज शर्करा (Sugar) | डीऑक्सीराइबोस शर्करा ($C_5H_{10}O_4$) - 2' कार्बन पर ऑक्सीजन अनुपस्थित। | राइबोस शर्करा ($C_5H_{10}O_5$) - 2' कार्बन पर हाइड्रॉक्सिल (-OH) समूह उपस्थित। |
| नाइट्रोजनी क्षार (Bases) | एडेनिन, गुआनिन, साइटोसिन और थाइमिन (T)। | एडेनिन, गुआनिन, साइटोसिन और थाइमिन के स्थान पर यूरैसिल (U)। |
| स्थायित्व (Stability) | अधिक स्थायी होता है, धीमी गति से उत्परिवर्तित होता है। | अस्थायी और अत्यधिक क्रियाशील होता है, तीव्र गति से उत्परिवर्तित होता है। |
| मुख्य कार्य (Functions) | आनुवंशिक सूचनाओं का दीर्घकालिक संग्रह और वंशागति। | सूचनाओं का स्थानांतरण और तीव्र प्रोटीन संश्लेषण। |
आनुवंशिकता की आधुनिक संकल्पनाएं
- जीन (Gene): जीन DNA का वह विशिष्ट कार्यात्मक खंड है, जिसमें किसी एक विशिष्ट पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला (प्रोटीन) या लक्षण को कोड करने की आनुवंशिक सूचना निहित होती है। यह वंशागति की मूल भौतिक व कार्यात्मक इकाई है। 'जीन' शब्द जोहान्सन (1909) ने दिया था।
- एलील (Allele / एलीलोमार्फ): एक ही जीन के दो या अधिक वैकल्पिक रूपों को एलील कहा जाता है, जो समजात गुणसूत्रों के समान स्थलों (Loci) पर स्थित होते हैं। उदाहरण के लिए, पौधे की लंबाई के जीन के दो रूप हैं: T (लंबा) और t (बौना)।
- समयुग्मजी (Homozygous): जब किसी लक्षण को नियंत्रित करने वाले जीन के दोनों एलील पूर्णतः समान हों (जैसे- शुद्ध लंबा TT या शुद्ध बौना tt)।
- विषमयुग्मजी (Heterozygous): जब किसी लक्षण के दोनों एलील भिन्न-भिन्न हों (जैसे- संकर लंबा Tt)। इसमें प्रभावी एलील ही अपना लक्षण प्रदर्शित करता है।
परीक्षा की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण तथ्य:
- मानव की प्रत्येक कायिक कोशिका (Somatic Cell) में 23 जोड़ी अर्थात् कुल 46 गुणसूत्र होते हैं, जिनमें 22 जोड़ी ऑटोसोम (कायिक) और 1 जोड़ी सेक्स क्रोमोसोम (XX या XY) होते हैं।
- DNA की खोज सर्वप्रथम 1869 में फ्रेडरिक मिशर (Friedrich Miescher) ने मवाद कोशिकाओं में की थी और इसे 'न्यूक्लिन' नाम दिया था।
- केंद्रीय सिद्धांत (Central Dogma): आनुवंशिक सूचनाओं का प्रवाह हमेशा $DNA \rightarrow RNA \rightarrow \text{Protein}$ की दिशा में होता है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन फ्रांसिस क्रिक ने किया था।
- आनुवंशिक कूट (Genetic Code): mRNA पर स्थित तीन न्यूक्लियोटाइड का वह समूह जो एक विशिष्ट अमीनो अम्ल को कोड करता है, ट्रिपलेट कोडॉन कहलाते हैं। कुल 64 कोडॉन होते हैं। भारतीय वैज्ञानिक डॉ. हरगोविंद खुराना को कृत्रिम जीन संश्लेषण और जेनेटिक कोड की व्याख्या के लिए 1968 में नोबेल पुरस्कार मिला था।
- प्रारंभक कोडॉन (Start Codon) हमेशा AUG होता है जो मिथियोनिन अमीनो अम्ल को कोड करता है, जबकि UAA, UAG और UGA को स्टॉप कोडॉन (Stop Codons) कहा जाता है।
- गुणसूत्रों की संख्या के कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण: मटर में 14 ($n=7$), घरेलू मक्खी में 12, चिंपांजी में 48 और मेंढक में 26 गुणसूत्र पाए जाते हैं।