ओजोन परत क्षरण: कारण, प्रभाव और मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल
Table of Contents
- ओजोन परत का परिचय एवं महत्व
- ओजोन परत की मोटाई का मापन:
- ओजोन परत क्षरण के मुख्य कारण (Causes of Ozone Depletion)
- प्रमुख ओजोन क्षयकारी पदार्थ (ODS):
- ओजोन क्षरण की रासायनिक प्रक्रिया (Mechanism):
- ओजोन परत क्षरण के प्रभाव (Effects of Ozone Depletion)
- 1. मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव:
- 2. पारिस्थितिकी तंत्र और वनस्पतियों पर प्रभाव:
- 3. वैश्विक तापन (Global Warming):
- ओजोन संरक्षण हेतु अंतर्राष्ट्रीय प्रयास: मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल
- 1. वियना कन्वेंशन (Vienna Convention - 1985):
- 2. मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (Montreal Protocol - 1987):
- 3. किगाली संशोधन (Kigali Amendment - 2016):
Key Points
- ओजोन परत वायुमंडल की दूसरी परत समतापमंडल (Stratosphere) में पाई जाती है, जो सूर्य की हानिकारक उच्च-ऊर्जा पराबैंगनी किरणों (UV-B) को अवशोषित करती है।
- ओजोन परत की मोटाई को 'डॉबसन यूनिट' (DU) में मापा जाता है। 220 DU से कम मोटाई होने पर उसे ओजोन छिद्र की संज्ञा दी जाती है।
- अंटार्कटिका के ऊपर पहले ओजोन छिद्र की खोज वर्ष 1985 में ब्रिटिश वैज्ञानिक जोसेफ फारमैन और उनकी टीम द्वारा की गई थी।
- क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) ओजोन परत को नष्ट करने वाली मुख्य गैस है, जिसका केवल एक क्लोरीन परमाणु लगभग 1 लाख ओजोन अणुओं को तोड़ सकता है।
- ओजोन परत के क्षरण से मानव में त्वचा का कैंसर, आँखों में मोतियाबिंद (स्नो ब्लाइंडनेस) और समुद्री पारिस्थितिकी में पादप प्लवकों (Phytoplankton) का भारी ह्रास होता है।
- ओजोन परत के संरक्षण के लिए 16 सितंबर 1987 को ऐतिहासिक 'मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल' संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे, इसी कारण प्रतिवर्ष 16 सितंबर को 'विश्व ओजोन दिवस' मनाया जाता है।
- वर्ष 2016 का 'किगाली संशोधन' शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) के उपयोग को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने से संबंधित है, जिसे मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत जोड़ा गया है।
ओजोन परत का परिचय एवं महत्व
ओजोन ($O_3$) ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिलकर बना एक गाढ़ा नीले रंग का गैसीय अणु है। पृथ्वी के वायुमंडल में ओजोन दो अलग-अलग परतों में पाई जाती है, जिसके आधार पर इसे 'अच्छी ओजोन' और 'बुरी ओजोन' में वर्गीकृत किया जाता है:
- समतापमंडलीय ओजोन (अच्छी ओजोन): कुल ओजोन का लगभग 90% भाग वायुमंडल की दूसरी परत समतापमंडल (Stratosphere) में धरातल से 15 से 35 किलोमीटर की ऊँचाई पर एक सघन आवरण के रूप में पाया जाता है। इसे ही 'ओजोन परत' (Ozone Layer) कहते हैं। यह परत सूर्य से आने वाली हानिकारक उच्च-ऊर्जा पराबैंगनी किरणों (मुख्यतः UV-B) को अवशोषित कर उन्हें पृथ्वी की सतह तक पहुँचने से रोकती है, जिससे यह पृथ्वी के लिए एक 'सुरक्षा कवच' (Shield) का कार्य करती है।
- क्षोभमंडलीय ओजोन (बुरी ओजोन): शेष 10% ओजोन वायुमंडल की सबसे निचली परत क्षोभमंडल (Troposphere) में पाई जाती है। यह मानव निर्मित प्रदूषण (नाइट्रोजन ऑक्साइड और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों की सूर्य के प्रकाश में क्रिया) से उत्पन्न होती है, जो एक अत्यंत हानिकारक प्रदूषक और 'स्मॉग' (Smog) का मुख्य घटक है।
ओजोन परत की मोटाई का मापन:
ओजोन परत की सांद्रता या मोटाई को मापने के लिए डॉबसन यूनिट (Dobson Unit - DU) का प्रयोग किया जाता है। सामान्य परिस्थितियों में ओजोन परत की मोटाई लगभग 300 DU होती है। यदि किसी क्षेत्र में ओजोन की मोटाई 220 DU से कम हो जाती है, तो उसे आधिकारिक रूप से 'ओजोन क्षरण' या 'ओजोन छिद्र' (Ozone Hole) माना जाता है। सर्वप्रथम वर्ष 1985 में जोसेफ फारमैन के नेतृत्व में ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे की टीम द्वारा अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन छिद्र की खोज की गई थी।
ओजोन परत क्षरण के मुख्य कारण (Causes of Ozone Depletion)
ओजोन परत के पतले होने का मुख्य कारण मानव निर्मित रासायनिक यौगिक हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से ओजोन क्षयकारी पदार्थ (Ozone Depleting Substances - ODS) कहा जाता है। ये रसायन अत्यधिक स्थिर होते हैं और क्षोभमंडल में नष्ट हुए बिना सीधे समतापमंडल में पहुँच जाते हैं।
प्रमुख ओजोन क्षयकारी पदार्थ (ODS):
- क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs): यह ओजोन क्षरण के लिए उत्तरदायी सबसे मुख्य गैस है। इसका उपयोग रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर (AC), कूलिंग एजेंट, विलायक और एयरोसोल स्प्रे में बड़े पैमाने पर किया जाता रहा है।
- हैलोन्स (Halons): इनका उपयोग मुख्य रूप से अग्निशामक संयंत्रों (Fire Extinguishers) में आग बुझाने के लिए किया जाता है। इनमें ब्रोमीन होता है, जो क्लोरीन की तुलना में ओजोन को कई गुना अधिक नुकसान पहुँचाता है।
- कार्बन टेट्राक्लोराइड ($CCl_4$) और मिथाइल क्लोरोफॉर्म: इनका उपयोग औद्योगिक विलायकों, ड्राई क्लीनिंग और कीटनाशकों में किया जाता है।
- हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (HCFCs): इन्हें CFC के अस्थायी विकल्प के रूप में लाया गया था, लेकिन इनमें भी ओजोन को नुकसान पहुँचाने की आंशिक क्षमता होती है।
- मिथाइल ब्रोमाइड: कृषि में व्यापक रूप से उपयोग किया जाने वाला एक अत्यधिक प्रभावी कीटनाशक (Fumigant)।
ओजोन क्षरण की रासायनिक प्रक्रिया (Mechanism):
जब CFCs के अणु समतापमंडल में पहुँचते हैं, तो सूर्य की उच्च-ऊर्जा पराबैंगनी (UV) किरणें इन्हें तोड़ देती हैं, जिससे मुक्त क्लोरीन परमाणु (Free Chlorine Radical) अलग हो जाता है। यह मुक्त क्लोरीन परमाणु ओजोन ($O_3$) के एक अणु पर हमला करता है, जिससे वह ऑक्सीजन ($O_2$) और क्लोरीन मोनोऑक्साइड ($ClO$) में टूट जाता है।
$$\text{Cl} + \text{O}_3 \rightarrow \text{ClO} + \text{O}_2$$
$$\text{ClO} + \text{O} \rightarrow \text{Cl} + \text{O}_2$$
इस प्रक्रिया में क्लोरीन का परमाणु अंत में पुनः मुक्त हो जाता है और दूसरे ओजोन अणु को तोड़ने के लिए आगे बढ़ता है। वैज्ञानिक गणना के अनुसार, क्लोरीन का केवल एक परमाणु समतापमंडल में लगभग 1,00,000 ओजोन अणुओं को नष्ट कर सकता है।
ओजोन परत क्षरण के प्रभाव (Effects of Ozone Depletion)
ओजोन परत के पतले होने से सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणें (विशेषकर UV-B) सीधे पृथ्वी की सतह तक पहुँचने लगती हैं, जिसके सजीवों और पर्यावरण पर अत्यंत घातक प्रभाव पड़ते हैं:
1. मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव:
- त्वचा का कैंसर (Skin Cancer): पराबैंगनी किरणों के सीधे संपर्क में आने से मानव कोशिकाओं का DNA क्षतिग्रस्त हो जाता है, जिससे त्वचा कैंसर (मेलानोमा) की संभावना अत्यधिक बढ़ जाती है।
- आँखों को नुकसान (Cataract): UV-B किरणों के प्रभाव से आँखों के लेंस को क्षति पहुँचती है, जिससे मोतियाबिंद (Cataract) और अंधापन होने का खतरा बढ़ जाता है। इसे 'स्नो ब्लाइंडनेस' भी कहते हैं।
- प्रतिरक्षा प्रणाली का कमजोर होना: यह मानव शरीर की संक्रामक रोगों से लड़ने की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immune System) को धीमा कर देता है।
2. पारिस्थितिकी तंत्र और वनस्पतियों पर प्रभाव:
- पादप प्लवकों (Phytoplankton) का ह्रास: महासागरों की खाद्य शृंखला का आधार माने जाने वाले सूक्ष्म जलीय पौधों (फाइटोप्लांकटन) की उत्पादकता UV किरणों के कारण तेजी से घटती है, जिससे संपूर्ण समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र संकट में आ जाता है।
- कृषि उत्पादन में कमी: फसलों (जैसे धान, सोयाबीन, गेहूँ) के शारीरिक और आनुवंशिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिससे पत्तियों का आकार छोटा हो जाता है और फसल की कुल पैदावार घट जाती है।
3. वैश्विक तापन (Global Warming):
- ओजोन क्षयकारी पदार्थ (जैसे CFCs) स्वयं में शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें भी हैं, जो वायुमंडल में ऊष्मा को रोककर वैश्विक तापन और जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया को तीव्र करती हैं।
ओजोन संरक्षण हेतु अंतर्राष्ट्रीय प्रयास: मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल
ओजोन परत के क्षरण की वैश्विक समस्या से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ठोस कूटनीतिक और वैज्ञानिक प्रयास किए गए, जिसके तहत दो ऐतिहासिक समझौते हुए:
1. वियना कन्वेंशन (Vienna Convention - 1985):
ओजोन परत के संरक्षण के लिए यह पहला अंतरराष्ट्रीय फ्रेमवर्क समझौता था, जिस पर वर्ष 1985 में वियना (ऑस्ट्रिया) में सहमति बनी। यह एक गैर-बाध्यकारी (Non-binding) समझौता था, जिसका मुख्य उद्देश्य ओजोन संरक्षण के लिए अनुसंधान और सहयोग को बढ़ावा देना था।
2. मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल (Montreal Protocol - 1987):
वियना कन्वेंशन को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाने के लिए 16 सितंबर 1987 को कनाडा के मॉन्ट्रियल शहर में एक ऐतिहासिक संधि पर हस्ताक्षर किए गए, जिसे 'मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल' कहा जाता है। यह 1 जनवरी 1989 से प्रभावी हुआ। यह पर्यावरण के इतिहास में विश्व की सबसे सफल अंतर्राष्ट्रीय संधि मानी जाती है, जिसे संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देशों द्वारा सार्वभौमिक रूप से अनुमोदित (Universally Ratified) किया गया है।
• मुख्य लक्ष्य: ओजोन परत को नुकसान पहुँचाने वाले पदार्थों (विशेषकर CFCs और हैलोन्स) के उत्पादन और उपभोग को चरणबद्ध तरीके से (Phase-out) पूरी तरह समाप्त करना।
• विश्व ओजोन दिवस: मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की याद में प्रतिवर्ष 16 सितंबर को 'विश्व ओजोन दिवस' (World Ozone Day) के रूप में मनाया जाता है।
3. किगाली संशोधन (Kigali Amendment - 2016):
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत विकसित देशों ने CFC के स्थान पर **हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs)** के उपयोग को बढ़ावा दिया था। HFCs ओजोन परत को तो नुकसान नहीं पहुँचाते, परंतु ये कार्बन डाइऑक्साइड से हजारों गुना अधिक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें (Greenhouse Gases) हैं, जो ग्लोबल वार्मिंग बढ़ा रही थीं।
• अक्टूबर 2016 में रवांडा की राजधानी किगाली में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल में एक ऐतिहासिक संशोधन किया गया, जिसे 'किगाली संशोधन' कहते हैं। यह 2019 से प्रभावी हुआ।
• लक्ष्य: इसके तहत वर्ष 2040 के दशक के अंत तक ग्लोबल वार्मिंग पैदा करने वाले HFCs के उपयोग को भी 80-85% तक चरणबद्ध तरीके से कम करना है। भारत ने भी इस संशोधन को मंजूरी दी है और वह वर्ष 2047 तक अपने HFC उपयोग को चरणबद्ध तरीके से कम करने के लक्ष्य पर कार्य कर रहा है।